भूर्ण-हत्या- कैसे बना दानव - मानव ?

✪ 10 comments
प्लिज मम्मा, मुझे मत मारो, मुझे भी भैया के साथ खेलना है।

भारत की संस्कृति विश्व की सर्वोच संस्कृति है. संस्कृति हमारी धरोहर है, विरासत है, अंहिसा की प्रतिध्वनी में फलने वाली इस देश की धरती पर आज चारो तरफ हिंसा का नाद है. कहते है यह इक्कस्वी सदी महिलाओं की है. प्रश्न उठाता है फैशन , नशा, भ्रूण हत्या, अनुशासनहीनता जीवन, अनावश्यक संग्रह की मनोवृति जैसी प्रवृतियो में तेजी से बढ़ती हुई महिलाये क्या अपनी  संस्कृति  का सम्यक निर्वाह कर रही है ?  भ्रूण-हत्या  इस सदी की सबसे बड़ी त्रासदी है.

उड़न तश्तरी .... समीर लालजी ने दो दिन पहले  एक पोस्ट लिखी थी , उसमे समीरजी ने लिखते हुए कहा - "शायद कहीं आपको छुए/ झकझोरे". पूरा का पूरा मनडा ही  खर-खर हिल गया . कविता के माध्यम से समीर जी ने भ्रूण हत्या पर जो त्रासदी बया की  आँसूओं की धार मेरी आँखों से भी निकल पडी और गंगा में समाहित हो गई. आप भी देखे समीरजी ने व्यथित  मन से जो भाव प्रकट  किये  और शब्दों के माध्यम से कन्याओ की भ्रूण हत्या पर समाज को जो फटकार लगाईं  वो प्रंसनीय तो है ही वर्तमान में इस ओर  कठोर रूप से अजन्मे बालको की हत्याओके विरोद्ध में जनचेतना के लिए बेहद मार्मिक और सशक्त अभिव्यक्ति अग्रषित की  है. 
बुजुर्ग बताते थे कि सपनों का आधार आपके दिमाग के कोने में पड़े वो विचार होते हैं जिन्हें आप पूरा होता देखना चाहते हैं किन्तु जागृत अवस्था में कुछ कर नहीं पाते. कह नहीं पाते और मूक दर्शक बने उन्हें अपने आसपास होता देखते रहते हैं. ऐसे विचार सपनों में आकर आपको झकझोरते हैं, जगाते हैं.
एक कविता, बिना किसी भूमिका के, प्रस्तुत करना चाह रहा था, इत्मिनान से पढ़ें और शायद कहीं आपको छुए/ झकझोरे, तो दाद दिजियेगा.
गंगा,
जो शंकर  की जटाओं से
नहीं निकली..
वो है
एक उस  क्न्या के 
आँसूओं की धार
जो जन्मीं ही नहीं..
सांस लेने के पहले
उसे मार दिया गया..
भ्रूण में ही..
शायद इसीलिये
गंगा के होते हुए भी
वो धरती
मरुस्थल है...........

पराया देश,  पर राज भाटिया जी ने भी भ्रूण हत्या जैसे  कृत्य  को कंस की संज्ञा दी . उन्होंने समाज से  अपने दर्द भरे दिल से  की प्रश्रन लिख छोड है, जो विचार करने योग्य है. बडे ही दुखी  मन से पर गुस्से  से समाज में भ्रूण हत्या जैसे जधन्य  अपराध  पर लिख मुझे यह पोस्ट लिखने  को प्रेरित  किया है.  आप सभी देखे राज भाटियाजी ने  समाज में भ्रूण हत्या को लेकर मानव कैसे बना  दानव  ? उन्होंने इसे एक  आन्दोलन के रूप में लिखा  है जो एक मानव एवं स्रष्टि  के हित की बात है.
जो मां बाप कोख मै ही बेटी को मारे, उसे आप क्या कहेगे ? जो ड्रा पेट मे किसी बच्ची को जन्म से पहले ही मार दे उसे आप क्या कहेगे ?
अजन्मे को मोत के मुंह मे धकेलना क्या अच्छा है, अगर वो बच्ची है तो क्या वो कलंक है ? अरे जिस के पेट मै है वो भी तो कभी बच्ची थी.... जो परिवार ऎसा करे उस परिवार से नाता तोड ले.... रहने दे उन्हे अकेला... उन के लडके को कोई बहू मत दो... आओ मिल कर इन गंदे कृत को रोके.... आओ मिल कर हम इस कंस को मारे..

भ्रूण हत्या यह मानव समाज में  ऐसा  कोढ है जो संक्रमण की तरह फ़ैलता जा रहा है, जो सभी समाज के भाल पर कलंक टीका है. आज एबोर्सन एक फैशन  बन गया है. जो माँ ममता की मूर्त होती है अपनी ममता के विस्तरत आंचल में बच्चे को दुलारने-सहलाने वाली माँ ऐसा जधन्य अपराध कर सकती है. कल्पना से परे की बात है. जिसके उर में बेपनाह ममत्व हिलोरे लेता है, कैसे  वह उस संतति की निर्मम ता से ह्त्या करवाकर "माँ"  कहलाना कितनी विडम्बना है.  इसमे पुरुष में बच  नहीं सकता क्यों की इस अपराध में वो भी बराबर का हिस्सेदार है.
आज हम सबको मिल बैठकर चिन्तन विचार विमर्श करना है की प्रक्रति ने सहज स्वाभाविक रूप में माँ की ममता के आंचल की ओर अग्रसर किया , उस पर तुषारापात ओर कुठाराधात क्यों ?
लोगो मुझे  "टाइगर" कहते है . आप मनुष्य मुझे जानवर की श्रेणी में गिनते है. पर हमारे जानवरों में अपने अजन्मे बच्चो को मारने की कोई रिवाज नहीं है. फिर यह सवाल आप के लिए जानवर कोन हुआ ? 
आप या हम  ?


आज हिंदी दिवस है कोई तरह से मै दकियानूसी वाली बात नहीं करुगा-मुंबई टाइगर

✪ 12 comments
आज हिंदी दिवस है कोई तरह से मै दकियानूसी वाली बात नहीं करुगा आज के हिंदी बर्थ डे कों बड़ी ही प्रसंता से मना रहा हू . आज मै ने यह निश्चय किया की कोई भी हाल में हिंदी भाषा कों बढावा मिले, सहजता से लोग 
अपनाए , अपनी प्रिय भाषा बनाए, इस और मेरे जंगल राज में प्रयास करुगा. हिंदी मेरी माँ  है  मै उसके लिए कुछ भी कर गुजरुगा......
मै हिदी ब्लोग जगत कों बधाई देना चाहाता हू की विगत वर्षो से हिंदी भाषा कों सरल, सुगम बनाया जिससे सैकडो लोगो ने अपनाया आप सभी इसी तरह इसे बढावा देते रहे. 

मै प्रससा करना चाहता हू हिंदी टेलीविजन मीडिया की जिसने हिंदी बोलने वालो कों शर्म से निजात दिलाई. अब लोग हवाई जहाज , ए. सी. रेलवे कोच, फाई स्टार सेवन स्टार होटलों में वेटर से लेकर ग्राहक तक बिना शर्म के हिंदी में बोलते हुए देखे गए. मै धन्यवाद देना चाहता हू अमिताब बच्चन  कों की उन्होंने "कोन बनेगा करोड़पति" कार्यक्रम से लोगो कों हिंदी में बोलने  पर गर्व करना सिखाया . 

आज हम कुछ कमियों का रोना नहीं रोये तो  अच्छा है, बस एक ही आवाज हो हिंदी है हम हिन्दुस्थान हमारा .

आप को भी हिदी दिवस पर हार्दीक शुभकामनाऍ।आपका मुंबई टाइगर 

पाकिस्तानी ब्लोगरिया कहे छु छु कर रिया है ?

✪ 12 comments
बहुत दिनो से सोच रहा था क्या लिखू ? कोई भी विषय हाथ नही लग रहा था। कहने का अर्थ है किसी विषय की पुछ हाथ मे नही आ रही है। चारो तरफ सन्नाटा है। लगता है दुनिया मे खबरे बनना बन्द सी हो गई। देश मे स्वाईन फ्लू के बाद जिन्ना/ जसवन्त फ्लू ने रफतार पकडने की कोशिस की पर साला बिच रास्ते ही दोनो कि टॉय-टॉय फिस हो गई। आडवाणी चुनाव क्या हारे समझो जिवन से सन्यास ही ले लिया। चुनाव के पहले प्रधानमन्त्री को अब तक का सबसे 'वीक' (कमजोर) बताने वाले खुद आडवाणी चुनाव हारने के बाद इतने कमजोर पड गऐ की बेचारे.... आर एस एस प्रमुख को विटामिन्स की डोज देने दिल्ली पहुचना पडा।आज पाकिस्थान के ब्लोगरो को पढ़ने निकल पडा . देखा तो अपने जसवन्तसिह जी  और जिन्ना से वहा के ब्लॉग अटे पडे है. बहुत से हिंदी वेब साइटों के हवाले से जसवंत सिह जी  को  जस्टीफाई करने की भरसक कोशिश की गई.  तो भारतीय ब्लोगर भी अपना मत रखने में पीछे नहीं रहे.

जसवन्तसिह की पुस्तक ने मानो  की बीजेपी को चकते में डाल दिया.  उधर इस विवाद में पाकिस्तानी ब्लोगरो ने बीजेपी द्वारा जसवन्तसिह की बर्खास्त गिरी (दादागिरी) की आलोचना की. एक पाकिस्तानी ब्लोगर ओवेस एहसन {Owais Ehsan, a Pakistani blogger.} ने -" बीजेपी एक असहिष्णु पार्टी है. और कभी सच  को स्वीकार नही करेगी. भले ही यह उसके अच्छे खासे पढे लिखे और प्रसिद्ध पार्टी सदस्यों की और से आए . " पार्टी से जसवन्तसिह के निष्कासन को लेकर भारत के खिलाफ बहुत टिप्पणिया आई है. एक अन्य पाकिस्तानी ब्लोगर सज्जाद आवं {Pakistani blogger, Sajjad Awan} ने कहा ," भारत को दुनिया को अच्छी सदभावना  दिखानी चाहिए की वह अपने लोगो के सूझवो, विचारों , चर्चाओं और सोक का स्वागत कर रहा है. "

एक अन्य ब्लोगर कलसुम {Kalsoom, yet another blogger.}  ने कहा-"हास्यास्पद बात यह है की सिह का वैचारिक सधर्ष बीजेपी के साथ उसी तरह का है, जैसा जिन्ना का काग्रेस पार्टी के साथ था. दोनों पार्टी विचारधारा के सक्रीय प्रस्तावक थे और दोनों ही बोद्धिक असहमति के बाद खुद को अलग कर लिया. अंतर सिर्फ इतना है की सिह ने राष्ट्रवादी दक्षिणपंथी पार्टी का समर्थन करने से अपना आधार बदलकर बोद्धिक उदारवाद की और कर लिया है. जबकि जिन्ना धर्मनिरपेक्ष थे, उदारवादी नीतियों का त्याग करकठोर  और साम्प्रदायिक नीति को अपनाकर  जनता को अपने पक्ष में किया . कुछ ब्लोगरो ने तो स्वतंत्रता सघर्ष के दोरान कांग्रेस की भूमिका की आलोचना की है. अपने भारतीय ब्लोगर सुभम {Shubham, an Indian blogger.} ने तो कहा -" जब भगत सिह , चन्द्रशेखर ,अश्फाक-उल्ला -खान, राम प्रसाद बिस्मिला देश को एक करने के लिए लड़ रहे थे  टीबी कांग्रेस  और मुस्लिमलीग दोनों समुदाय के बिच  खाई पैदा करने की कोशिस कर रही थी.

भारत में   धर्मनिरपेक्षता  और लोकतंत्र की आलोचना से जुड़े मुद्दे पर अपनी राय जाहिर करते हुए भारतीय ब्लोगर कपिल राजेश पांडव {Indian blogger, Kapil Rajesh Pandav } ने कहा "बीजेपी ने हमे बदनाम किया है. यह हमे कही का नही छोडेगी. इसके बावजूद हमे कांग्रेस का मुकाबला करने के लिए बीजेपी की जरूरत है.ताकि लोकतंत्र का अस्तित्व कायम रहे.

जसवन्तसिह को क्रांतिकारी बताते हुए संजीव मिगलानी ने कहा -" सिह को कुछ   आशर्यजनक समाधान मिल गया है  मेरा मानना है कीउन्होंने  न सिर्फ एक पुस्तक लिखी है बल्कि उन्होंने क्रान्ति सुरु कर दी है.

भाई मेरा ऐसा मानना है की यह सभी टाइम खोटी करने का समय नही है .  ना जसवन्तजी ने जिन्ना को देखा ना हमने तुमने  फिर काहे फ़ोख्ट में बजा रहे है ?  घडी दो घडी कुछ अच्छा काम कर ले देश याद करेगा. यह जसवंत सिह जी भी काहे टाइम पास करने जिन्ना पे लिखे, अरे भाई, हमार देस मा कोनोही सब्जेक्ट नाही  बचा का ?  लिखना हो तो लालू है हमार ताऊ है ताऊ का गयन भैसियंन है बावली बुच जितना चाहो लिखो कहे बाउंड्री पार गेंद फैक्त है . का ?  समज़े के नाही ? और यह पाकिस्तानी ब्लोगरिया कहे छु छु कर रिया है ? टोपी सभाल हवा तेज चलत है भाई! पा..... की..... स ...... था....... न........
 
गांधीजी के साथ जिन्ना 
                                                                              


कुछ पाकिस्तानी ब्लोगर कोदेखे 


मेरा फोटो
Sohaib Qureshi
Wednesday, August 19, 2009
                                     Jinnah: India- Partition- Independence by Jaswant Singh

                                                                         
Owais Ahsan
Owais Ahsan

Education

Sir Syed University of Engineering and Technology
Pakistan Islamia Higher Secondary School

स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं

✪ 12 comments
 

अदने से आदमी के ऊपर टनो शब्द उडेले जा रहे है किन्तु शब्दो के निचे दबा आदमी जिन्दा है

✪ 6 comments
शब्द-अविष्कार
मै आजकल शब्दो के महासमुन्द्र मे डूब रहा हू। कुछ समय से हिन्दी ब्लोग जगत के भिष्मपितामाह कहे जाने वाले श्री ज्ञानदत्तजी नये शब्द-अविष्कार करने की ठान बैठे है। कुछ शब्दो को आम जनता के लिए खोलकर पान्डेजी सुकुन भरी ब्लोगेरी कर रहे है। उनका यह इवेन्ट कब तक कम्पलिट होगा यह तो बहृमाजी को पत्ता है या स्वय पान्डेजी को।ज्ञान दतजी हमेसा नऍ शब्दो की जुगाड मे रहते है। वो नये शब्दो को भू-भाग पर लाना चाहते है।

उन्होने नई शब्द सरचना की कोशिस की । आप देखे वो अब तक कोन-कोन से नए शब्दो को पाठको को पेल चुके है।
* इण्टरनेटीय डोलची
* टंकियाटिक पोस्ट
* चिठेरे लुंगाड़े
* मैं नये शब्द तलाश रहा हूं – बड़े और गरुह शब्द नहीं; पर नयापन लिये सहज ग्राह्य शब्द। लगता है कि पुस्तकों की ओर लौटना होगा। हिन्दी पुस्तकों की ओर।
अगर आपको पाठक बांधने हैं तो मौलिकता युक्त लिखें या फिर अश्लील। दुन्नो नहीं है तो काहे टाइम खोटा किया जाये।
* साइबरित आप को नया शब्द लेना होगा उसके लिये। क्या है वह? साइबरित्य है?
खैर कोई बात नहीं अगर आपको "साइबरित्य" शब्द पसन्द नहीं आया। नया शब्द गढ़िये। असल में आपको नया शब्द गढ़ना ही होगा। एक नया फिनॉमिना पुराने शब्द से समझाया नहीं जा सकता!
* डिसिप्लिनाचार्यों
* चिरकुटई
* पिल
* ठेलिये

शब्दो के भवर मे आम आदमी इतना फ़स चुका है कि अब वो डरने लगा है। आदमी के आगे-पिछे, उपर निचे, दाए-बाए शब्द ही शब्द है।
सुबह उठते ही टीवी खोलो तो शब्द। आधी रात को निन्द उचट जाए, टीवी खोलो तो शब्द हाजिर। समाचार पत्र देखो तो वहा भी शब्द कुण्डली मार कर फ़ुफ़कार रहा है। ऎसा लगता है कि अदने से आदमी के ऊपर टनो शब्द उडेले जा रहे है। इतना शब्द वजन आदमी पर डाला जाए तो बेचारा आदमी घुटकर तडफ़ तडफ़ कर मर जाएगा। पर ताजुब है कि इतने इतने शब्दो के निचे दबा आदमी जिन्दा है। शब्द फ़ैकना लिखाडो की मजबुरी है झेलना आम आदमी की। आम आदमी को अर्थसयोजन से कुछ प्रयोजन नही है, न सन्दर्भ से, न शब्दो के प्रसग से मतलब है, न शब्दो के भाव से, नेता हो या कवि रेडियो जोकी हो या समाचार वाचक, चिठ्ठा लेखक हो या चिठ्ठी लिखने वाला नेता या मन्त्रि सबके पास केवल शब्द है।

एक दिन तो हद हो गई मेरा मोबाईल घनघनाया. मैने उठाया. उघर से एक युवक की आवाज (शब्द) आ रही थी- "हाय! आप बहुत क्यूट लग रहे हो . मुझसे दोस्ती करोगे ? ". *शब्द सुनते ही घबराहट मे मोबाईल छूटकर जमीन पर गिर गया। जमाना बडा खराब हुआ पडा है जी! आदमी से दोस्ती के नाकारात्मक अर्थ भी हो सकते है। शब्दो का क्या ठीकाना.

हर पल हर घडी इतने शब्द की मै निशब्द होना भूल रहा हू। मेरी भी मजबुरी है क्यो की मेरा धन्धा ही शब्दो का है। जिन्हे मै सलाह दे रहा हू वह भी शब्द प्रपच है। जिसे भाषण सा प्रवचन कहा जाता है वह शब्द की माया है। यहा तक कि कविता, कहानी, उपन्यास शब्दो की जादुगरी है।
यह जो मै लिख रहा हू शब्दो का करतब है। कोई पढे ना पढे मेरी बला से।
मेरे एक परिचित मेरा लेख कभी नही पढते। एक तो मै उनसे पुछता या पढने का आग्रह करता नही। पुछ लिया तो कहेगे- "सारी! मै व्यस्त था।" "किस दिन छपा था ?" हॉ, उनकी कोई किताब छप जाए तो जबरन थमा जाएगे, और फ़ोन कर पूछेगे भी-" कैसी लगी ?" मै उनसे कैसे कहू कि वहॉ मात्र शब्दो की बाजीगरी है। ताजुब होता है इतने-इतने शब्दो की जरुरत किसे है ?

एक दिन एक कार्यक्रम मे गया बोलने कि मेरी जरा भी ईच्छा नही थी। मै दो धण्टे ढेरो शब्द सुनता रहा। हद तो तब हो गई जब अन्त मे मुझसे कहा गया-"आप दो शब्द बोल दे!" शब्द की ऎसी खुजली मची की मै दो के बजाय दो हजार शब्द बोल गया। पाच-सात शब्द तोडको ने सैकडो शब्द ढाई घण्टे मे उडेल दिऎ। 100-125 सुनने वाले तो शब्दो के वजन तले इतना दब गऎ की बैठे-बैठे कुर्सी पर ही लुडक गऎ।
बाद मे सोचा, इन शब्दो की न मुझे जरुरत थी न श्रोताओ को। क्या शब्द के बिना जीवन, जीवन नही होता. ?
आजकल एक शोघ पत्र तैयार कर रहा हू शब्द की उत्पति कहा से हुई। प्रथम शब्द किसने बोला। यही शोघ का विषय है। इस शोघ के लिए मुझे लाखो शब्द की जरुरत पडेगी। शब्दो का भण्डार जमा करके मे समझाऊगा कि शब्द क्या है ?
हालाकि इसका यह अर्थ नही की मै शब्द समझ गया हू। मुजे केवल दुसरो को समझाना है।
अपने आपको  औरो से श्रेष्ट "शब्द-लिखाडीया" दिखाने के लिऎ शब्दो की कान खिचाई  करना फ़ैशन बन पडा है,मुह हिन्दी का-टाग अग्रेजी की,कभी मुह भोजपुरी का और टाग हिन्दी की और पुछ अगेजी की। भाई यह कोनसा शब्द सर्जन है ?
कहते है- बिटवा! (बेटा) इबे (अब) तु कन्फ़ियुजीया(भटकना) गया है। जी! मै शायद ऎसे हजारो नये शब्द सर्जना से डर गया हू ।
कैसे कैसे शब्द होते है। शब्दो मे भी कई जातिया है। रुलाने वाला शब्द, हसाने वाला शब्द, कोई डरानेवाला शब्द, कोई शरीर मे रन्ग तरन्ग रोमाचित करने वाला शब्द, सेक्सी शब्द। इसमे सबसे खतरनाक गाली-गलोज वाली शब्द-माला है। कुछ वर्षो से गालिया देने वाले शब्दो का जोर शोर से विस्तार और सर्जन दोनो एक साथ हुआ है।
सोचता हू शब्दो को विश्राम देकर मोन व्रत रहने के प्रयास करके देखु शायद लोग सुखी हो जाए.

नोट यह मेरी सोच है इस लेख को  मेने व्यगात्मक शैली मे लिखा है। आदरणीय ज्ञानदतजी की नई शब्द सजृना की सोच ने मुझे लिखने के लिऍ प्रेरित किया है। इसे पढते समय मन हल्का बनाए रखे। क्यो की इसमे जो भी नाम सन्दर्भ के तोर पर लिए गए है वो हमारे आदरणीय है। फिर भी कही कोई बात से कष्ट हो तो मै क्षमा चाहता हू।
मुम्बई टाईगर

राखी का राम मन का मोहन स्वयवर से भागा: दुल्हे ने कहा ना बाबा ना

✪ 14 comments




राम कि तलास मे सीता बनी राखी

वहा भाई वहा! कुछ दिनो से चर्चा मे रहा कलयुगी "स्वयवर" के एक दुल्हे ने राखी सावन्त को ना बोलकर रिजेक्ट कर दिया। प्रोग्राम के फोरमेट के अनुसार केवल राखी को ही वो अधिकार थे की किसी भी बनावटी "देवदास दुल्हे" को रद्दी की टोकरी मे फैक सकती है। किन्तु यहॉ उसके ठीक उल्टा  
"छोरा गगा किनारे वाला" पावन धाम "ऋषिकेश" के मनमोहऩ तिवारी ने तो आव देखा ना ताव दो दिन पुर्व ऋषिकेश कि हॉटल मे जहॉ राखी सावन्त ठहरी हुई थी रात मे जाकर राखी को "रिजेक्टवा" कर दिया, यानी शादी ना करने की बात कर राखी को  "जोर का झटका धिरे" से दे दिया। राखी हतप्रत थी कलयुगी राम बनेने चले मनमोहन के वकीलिया बुद्धि को लेकर। मनमोहन ने राखी को जहॉ ना बोला वहा स्वयवर आयोजित करने वालो की भुल हो गई की होटल मे कैमरे नही थे। बस वही मनमोहन ने वकीलिया बुद्धि यूज कर डाली और ऑफ द रिकार्ड राखी से बात कर आया। राखी ने बाद मे ऑन रिकार्ड टीवी मे मनमोहन को भलाबुरा कहा। राखी ने कहा-" मनमोहन मेरे ड्रायवर और सैक्रेटी से गया गुजरा है, राखी ने आगे कहा-" मुम्बई की सडको पर हजारो मनमोहन घुमते है।" कहने का अर्थ "खिचीयानी बिल्ली खम्बा नोचे।"
 इससे यह बात तो साफ हो जाती है शादी जैसे पवित्र बन्धन का कलयुग मे बाजारीकरण नही किया जा सकता। आजके युग मे जिस राम कि तलास मे सीता बनी राखी जिस रास्ते निकली पडी थी, उसी स्वयवर के सभी  उम्मेदवार प्रसिद्धि, नाम, गैलमर के चक्कर मे भारतीय सस्कृति का बन्टाधार करने को तुले थे। इसका अन्त क्या होगा यह तो पत्ता नही, पर क्या राखी ने चैनल से मिलनेवाले कुछ धन-बल के चक्कर मे,  
स्त्री धन {मर्यादओ- सस्कारो-और भारतीय सस्कारो-परिवारिक सामाजिक मर्यादाओ} को अरक्षित/ असुरक्षित नही किया ?

क्या प्यार ब्याह इतना बाजारु हो गया की खुल्ल्म खुल्ला सडको पर किया जाऍ ?  
राखी पुछती है -" मै आईटम गर्ल हू यह बात शादी मे रोडा तो नही बनगी ?"
अरे राखी जी !  आप "आईटम गर्ल" है तो यह लडके कोन से दुध के धुले हुऍ है सभी तो आईटम-बॉय है।
हम तो भगवान से दुआ ही करेगे की राखी इस स्वयवर मे एक पति को जीते व जीवन भर यह रिस्ता मजबूत रहे।

 सभी के लिए जितनी जिम्मेदार राखी है,  उतने ही उसके उम्मीदवार डायरेक्टर, निर्माता, स्टोरी लेखक, चैनल भी है। अब शो देखने वालो के लिए क्या कहू ? क्यो कि मै भी तो  देख रहा हू।
"पैसा फैक तमाशा देख," भाई! पब्लिक है यह सब जानती है।

धनचक्कर गुरु हम स्वय है।

✪ 14 comments


 GURU
फोन पर सारथी वाले शास्त्रीजी से बातचीत हो रही थी। शास्त्रीजी ने पुछा-" ओर धन्धा-पानी कैसे चल रहा है ? " 
मैने कहा-"गुरुदेव मन्दा है।"  
शास्त्रीजी ने राय दी क्यो ना आप किसी अदद ज्योतिष गुरु को पकडे, और कुण्डली बताए।" 
मैने विस्मय भाव से कहा- "गुरु! इसके लिए भी "गुरु" बनाना पडेगा ?" 
अक्सर टीवी मे ज्योतिषगण चोबिसो घण्टे कुछ ना कुछ समझाते ही मिलते है। मुझे लगा अब इन महाज्ञानीयो से बच पाना नामुमकिन ही है।
फलतः मै अपनी जन्म कुण्डली समेत एक लेपटॉपधारी पन्डितजी की दुकान पर गया तो वह उल्ट-पल्ट कर बोलते गए- " वत्स तुम्हारा फेस देखकर ही मालुम दे रहा है कि गुरु के प्रभाव का जातक होने के चलते मामला अत्यन्त धातक है, अगले माह से गुरु वक्रि है, आगे सकट ओ‍र भी प्रचन्ड है, आठ महिने के बाद गुरु फिर से अपनी मूलमार्गी चाल मे लोट आएगा, उसके बाद ही शुभ फल देगा, सब ग्रहो की चाल का परिणाम है बच्चा।" अगर अनिष्ट फल से बचना चाहते हो तो अपने घर पर पुजा रखवा लो।"
मै मन ही मन बोला,-" पण्डितजी महाराज! ग्रहो की चाल का तो मुझे पता नही, लेकिन आपकी चाल जरुर मेरी समझ मे आने लगी है।" 
बहराल, मै इतनी जटिल विधा पर शका करके पाप का भागीदार नही बनना चाहता था। सो चुप ही रहा। धर्म मै विश्वास जरुरी है। फिर भीतर भीतर कही यह डर था कि जब बडे बडे तक अपने गुरुओ की वक्रि चाल के लपेटे मे आ जाते है तो मेरी क्या ओकात?
कहा गया है प्रबल गुरु मिल जाए तो फलदायी है अन्तथा कष्ट ही कष्ट है। 
बहराल, ये पण्डितजी तो गुरुओ के भी गुरु निकले। 
झटपट उन्हे दक्षिणायित किया और मै वहॉ से फुट लिया।
पुनः घर आकर 29"  बुद्धु बक्से (टीवी ) का रिमोर्ट  लेकर चैनलो के मनके जपने लग गया हू। किसी नए गुरु की तलास मे  हू। 
ऐसा भी नही है कि मेरा "गुरु-चोट की चपेट मे आना पहळी बार हुआ है, विघाज्ञान का श्री गणेश गुरुजी के डन्डे से ही हुआ था। आज भी हाथ की हथेली पर तकदीर की लकीरो से ज्यादा सन्टी के निशान ज्यादा है।  
जब भी मेरे मित्र जयपुर वाले आशिषभाई खण्डेलवाल पुछते है कि -"कहो गुरु", का हाल है ?" मुझे तत्काल अपने स्कुल के गुरुदेवगणो की तुडाई याद आ जाती है। उस टाइम नारा लगाए करते थे -

"छत्रन गुरु की क्या पहचान, 
हाथ मे सोटा, मुह मे पान।"

इस गुरु गाथा मे वे नागपुर वाले गुरुजी भी आते है, जिनकी लाठी आज भी बीजेपी वालो को सियासत की वैतरणी फन्दवाने के काम आती है।

इस दुनिया मे एक से एक गुरु हुए है और एक से बढकर एक गुरुघन्टाल भी हुए है।
सच्चे भी कच्चे भी।  
धर्म गुरु भी।  
अधर्म गुरु भी।  
डान्स के गुर।  
रोमास के गुरु।  
म्यूजिक के गुरु।  
अखाडे के गुरु।


 खैर, मेरे ताजा-ताजा उपजे कनपुरिया धनचक्करगुरु ने मुझे  गुरुमन्त्र दिया है कि फसना ही चाहता हू तो "टेक्स गुरुओ" के चक्कर मे फसू अथवा शेयर गुरु की चरण मे जाऊ।

योग गुरु की बॉहे थामू। मैनेजमेन्ट गुरु से कला सीखू।  आज बाजार मे फैशन गुरु से लगाकर ई गुरु, 
ब्लोग गुरु, तमाम   ब्रान्ड के गुरु उपल्ब्ध है। 

 इस लेख को व्यग के रुप मे पिरोया गया है।
जाने अनजाने किसी को कष्ट हुआ हो तो मै  क्षमा मागता हू।

बाबा श्री समीरानन्दजी महाराज ने ताऊ को दिया निम्बु मिर्च

✪ 12 comments
ताऊ ने लगाया निम्बु मिर्च
स्वर्गलोक मे कल रात बाबा श्री समीरानन्दजी महाराज गहरी निद्रा मे सो रहे थे । बाबाजी ! सपना देखते है, कोई चिठ्ठाकार दोनो हाथ से धोती पकड कर व बाहो मे लठ लिए हाफता भागता स्वर्गलोक कि ओर आ रहा है।  पिछे लोगो का हुजुम उस पकडने के लिए भाग रहा है।  
बाबा श्री समीरानन्दजी महाराज ने अपनी दिव्यदृष्टि लगाकर देखा। अरे! यह तो अपना शिष्य  हिन्दी का चिठठाकार ताऊ है। ताऊ से बाबा श्री समीरानन्दजी महाराज ने पुछा -"क्या बात है ताऊजी ?" बडे ही चिन्ता के भाव लिए मेरे दरबार मे आऐ हो ?" और यह लोग कोन है जो तुम्हारे पिछे लगे है ? और क्यो?"
ताऊ ने अपने गले मे पडे गमचे से पसीना पुछा और बोला- "महाराजजी! यह सभी असन्तुष्ट प्राणी है।  मेरे तेरह महीने के ब्लोग कार्यकाल के प्रसिद्धि एवम सफलता को कुछ लोग पचा नही पा रहे है। इनकी बदहजमी यहॉ तक पहुच गई की मेरे एवम "ताऊ डाट इन" के खिलाफ मोर्चा खोल बैठे है। 
बाबाजी! आपने मुझे यह किस झमेले मे डाल कर आप स्वर्गधाम मे आराम फरमा रहे है।"
बाबा श्री समीरानन्दजी महाराज  ने चुटकि बजाई तभी अप्सराए हाजिर हुई। 
समीरानन्दजी महाराज-  अप्सराओ कि और मुख्खातिब होते हुऍ बोले -" यह हमारे सेले ताऊ है। बहुत दुर धरती-लोक से आऐ है। थके प्यासे है। पहले तो तुम एयरकन्डीशन (A/C) चालु कर दो,
फिर दो गिलास शरबत हाजिर करो।" अप्सराए शरबत लाने चली गई।
अब बाबा श्री समीरानन्दजी महाराज  ने अपने मुख से अमृताशब्दो कि बारिश करते  हुए ताउजी से कहते है-" देख ताऊ! तुमने "ताऊ डाट इन"  को एक साल चार महीने मे जिस बुलन्दियो पर पहुचाया है यह बात मुझे भी हजम नही हो रही है  ! तो इन तुच्छ मानवो कि क्या बिसात जो बिना जले रह सकते है। उन्हे जलना तो था ही। यह "जलशी" का किडा तो प्रत्येक मानव मे मैने फिट कर रखा है। और टेशन नही लेने का ताऊ! 

कोई रेडीमेड सफलता तो मिली नही तुम्हे , चिठठाजगत मे रात दिन कि कडी मेहनत, सकारात्मक, रचनात्मक सोच के बाद तूम्हे यह  मुकाम हासिल हुआ है। तेरी "सत्ता" स्वीकार करने मे ऐसे लोगो को कुछ वक्त लगेगा, तुम्हारी "बादशाहत" को एक ना एक दिन स्वीकार करना ही करना है ताऊ।" ताऊ इसका मुलकारण है तुमने कभी भी "चिठ्ठे" का बेजा फायदा नही उठाया, तुम्ह ने शब्दो का इस्तेमाल क्षिक्षा स्वरुप किया। छोटी छोटि आम मानवीय जीवन मे घटने वाळी  घटनाओ कुरितियो  को पात्रता के रुप मे अपनी आत्मा की  भाषा मे पिरोकर कुशल शिक्षाप्रद अपने ब्लोग पर अभिनय कहू या मचन कहू ताऊ वो तूमने किया है।" 
हुका पीते हुऐ ताऊ - बाबा श्री समीरानन्दजी महाराज से पुछते है- "महाराज! इब इसका इलाज किया और कब तक ? "
बाबा श्री समीरानन्दजी महाराज -"अरे ताऊ! कै बावली बूस कि तरह उतावाला होवे छे, यह सक्रमण काल छे समय पर ठीक हो जावेगा।" थोडा धिरज बान्ध ताऊ!  
समीरानन्दजी महाराज -"ताऊ!  फेम (प्रसिध्द् )बनने के बाद  व्यक्ती को अपने लिए नही पब्लिक के लिए जीना पडता है।  फेम (प्रसिध्द्)  व्यक्ती को यह छोटी सी किमत तो चुकानी ही पडती है। 
ताऊ-"महाराजजी! मै फैमस कब हुआ मुझे तो पता ही नही चला ?-" 
तभी एक अप्सरा शरबत लिए बाबा समीरानन्दजी महाराज के दरबार मे हाजिर होती है। ताऊ घटा-घट शरबत हलक के निचे उतार देता है।! 
मुस्कराते हुए अपने दिव्य एवम ओजस्वि शब्दो का इस्तेमाल करते हुए  बाबा श्री समीरानन्दजी महाराज फरमाते है-" ताऊ!  20 जून 2009 को आपने एवम मेरा प्रिय बालशिष्य आशीषजी खंडेलवाल ने   "ताऊ डाट इन" पर 1०,००० वीं टिपणी  की घोषणा ने तुम्हे नम्बर वन पर ला खडा कर दिया। बस लोगो कि ऑखो मे किरकिरी पैदा होने के कारणो मे यह भी एक मुख्य कारण है।"

ताऊ-" इस नजर टोकार के लिए कोई इलाज मन्त्र सन्त्र ?"

बाबा समीरानन्दजी महाराज -" मेरे प्रिय शिष्य मैने आजकल टोटके टाटके करना बन्द कर दिया है। पर तुम मेरे प्रिय हो ताऊ, इसलिए जाते समय बाहर के कक्ष मे   "हे प्रभु" ध्यानास्थ है  उन्ह से कहो वो तुम्हे मेरे द्वारा अभिमंत्रित "निम्बु- मिर्च देगे वो "ताऊ डाट इन" पर अगरबत्ती का धुप कर शुक्रवार को मेरा मनन कर टॉग देना। ताकी बुरी आत्माओ का छाया "ताऊ डाट इन" पर ना पडे।"
ताऊ -" बाबाजी आपने मुझे शान्त कर दिया अब मुझे जाने की आज्ञा प्रदान करे, मगल पाठ सुनाए। "
बाबा समीरानन्दजी महाराज  मगल पाठ देते हुऐ धरती-लोक के लिए निम्बु मिर्ची के साथ ताऊ को  रवाना करते है।
बाबा समीरानन्दजी महाराज का मगल पाठ

" मैं दीपक हो के बुझ जाऊँ, ऐसा हो नहीं सकता
मैं तूफानों से डर जाऊँ, ऐसा हो नहीं सकता
न मैने तैरना सीखा, मगर है हौसला दिल में
मैं दरिया पार न जाऊँ, ऐसा हो नहीं सकता.  "


ताऊडॉट इन कि कुछ खबरे
असली ताऊ कौन ?
आज साल 2008 का अंतिम दिन है ! आज मुझे हिंदी के सार्वजनिक ब्लागिन्ग में कुल 7 माह और 9 दिन हुये हैं. इस बीच  आज की पोस्ट सहित कुल 144 पोस्ट इस ब्लाग पर मेरे द्वारा लिखी गई ! और 56 पोस्ट मग्गा बाबा पर ! इस तरह कुल दो सौ पोस्ट इस अवधि में लिखी गई ! और दिसम्बर 08 मे पूरी 31 पोस्ट लिखी गई ! यानि प्रति दिन एक !
Wednesday, December 31, 2008 at 12:11 AM Posted by ताऊ रामपुरिया


महाबाबा ताऊआनंद : हे मेरे परम प्रिय ब्लागरों, अपना संपुर्ण ध्यान लगाकर सुनो कि हम कैसे ब्लागरत्व को प्राप्त हुये. बडा दुरुह और कठिन कार्य है. पर भक्त जनों जिसने एक बार ब्लागरत्व प्राप्त करने की ठान ली. वो भला बिना पाये विश्राम कैसे करेगा?
Saturday, June 6, 2009 at 8:00 AM Posted by ताऊ रामपुरिया


आज ताऊ के  ब्लाग की उम्र एक साल हो गई है यानि आज ताऊ की वर्षगांठ है…अरे नही….. नही……ताऊ की नही ..इस ब्लाग की वर्षगांठ है.  इस एक साल मे ताऊ ने  फ़ुल साईज 281 पोस्ट लिखी. जिन पर ताऊ को करीब 8450 कमेंट प्राप्त हुये.

आज मैं आपका हृदय से आभारी हूं कि २० जून २००९ को आपने इस ब्लाग पर १०,००० वीं टिपणी करके आपका स्नेह और आशिर्वाद मुझे दिया. मैं अभिभूत हूं. जिसने एक भी टिपणी दी है उनका भी मैं आभारी हूं. बिना उनकी एक टिपणी के भी यह अधुरा ही रहता.
Monday, June 22, 2009 at 2:09 PM Posted by ताऊ रामपुरिया

आशीष खण्डेलवाल (Ashish Khandelwal)
June 22, 2009 5:48 PM
@ Makrand, सभी चिट्ठों में से यह पता लगाना तो काफी श्रमसाध्य कार्य है कि किस-किस चिट्ठे पर दस हजार टिप्पणियां हो चुकी हैं। प्राप्त जानकारी के अनुसार उड़नतश्तरी वाले समीर लाल जी और मानसिक हलचल वाले ज्ञानदत्त जी अभी तक इस दस हजारी क्लब में शामिल थे और लेटेस्ट व धमाकेदार एंट्री ताऊजी की हुई है। अगर किसी साथी को दूसरे नाम पता हों तो बताने का कष्ट करें।

अब आपको बजट वाले दिन हिन्दी के धुरन्द्र चिट्ठा-लिखाकारो के पास लिए चलता हु।

✪ 14 comments
अर्थपूर्ण-अर्थहीन

हमारे देश मे बजट ने कुछ कुछ उत्सव का स्वरुप ले लिया है। लोग कयास लगाने लगते है। वे भले अर्थशास्त्र की बारीकियो मे न जाए पर वे इस विमर्श मे जरुर जुट जाते है कि  बजट उनके रोजमरा  के जीवन पर क्या असर डालेगा, उन्हे  कितना सुखी बनाएगा। वे एक विचित्र मनःस्थिति से गुजरने लगते है। बजट से लोगो का यह जुडाव आश्चर्यजनक है। एक तरफ तो लोग धर्न-कर्म और सस्कृति मे खुब आस्था जताते है, जिसमे 'धनसचय और भोतिकता को निषेद किया गया है। लेकिन  दूसरी तरफ वे इस बात को लेकर चिन्तातुर भी रहते है कि कही उनका स्तर कम ना हो जाए। वे इस होड मे पिछड न जाए। मिडल क्लास के जो लोग सत्सग मे रमे रहते है  वे भी इस बात को लेकर सतर्क रहते है कही उनका बजट न गडबडा जाए।
एक व्यगः अर्थपूर्ण-अर्थहीन बजट पर

अपने देश  मे ज्यादातर पढे लिखे लोग बजट के मामले मे विद्धवान ही होते है।  हॉलाकी उनको कोई सरकारी फार्म भरने या एप्लिकेशन लिखने मे पसीना छुट जाता है, फिर भी बजट पर वे अपनी कोई रॉय अवश्य रखते है।जैसे हर हिन्दुस्थानी बीमारी के मामले अपनी कोई न कोई राय जरुर रखता है। भले ही वह डाक्टर, कम्पाउन्डर ना हो।
इस बार बजट दो बार हो गया। आम तोर ब़जट एक बार ही होता है। लेकिन इसके विद्धवान कई किस्म के होते है।
अब आपको बजट वाले दिन हिन्दी के धुरन्द्र चिट्ठा-लिखाकारो के पास लिए चलता हु। 

ज्ञानदत्तजी, अपने दफ्फतर मे टीवी खोल बैठे है। उन्हे कल ऑफिस  अर्जेन्ट डिस्पैच रजिस्टर तैयार करना था ,लेकिन वे बजट सुन रहे थे। अब हम सभी जानते है कि उन्हे इस राष्ट्र कर्म के बीच टोका नही जा सकता।
मेरे एक ब्लोगर मित्र आशिष खण्डेलवालजी  घर से कह के जाते है कि आम बजट है देर से लोटूगा, और राजमन्दिर मे नाईट शो देखकर लोटते है।
ये सब बजट के विद्धवान है, जानते है कि इसे रोजमरा की जिन्दगी मे कैसे इतेमाल करना है।
कुछ लोग बजट  की तैयारी वित्तमन्त्री से भी पहले से करना शुरु कर देते है। वे सारे सम्पर्क टटोलते है, उस दिन कही कमेन्ट या लेख छप जाऍ, किसी पैनल-डिस्कशन मे नाम आ जाए। किसी टीवी चैनल पर कोई स्लॉट मिल जाऐ।
ताऊ! वितमन्त्री को बोलते हुऐ सुनते है कि कमॉडीटी ट्राजैक्शन पर टैक्स हटाया जाएगा। वह
राज भाटीयाजी की और मुह कर के गम्भीर स्वर मे बोलते है, इसमे मिडल क्लास को बहूत फायदा होगा। असल मे तो ताऊ को पता ही नही है कमॉडीटी ट्राजैक्शन  टैक्स चीज क्या है,  लेकीन सोचते है यह बाजु मे बैठा बन्दा क्या जानता होगा।
भाटिया़जी, सचमुच कमॉडीटी ट्राजैक्शन  टैक्स  के बारे मे नही जानते, पर ताऊ कि बात सुनकर चिढ जाते है, रोब गाढ रहे है । बडे आऐ है अर्थशास्त्र झाडने। भटियाजी और ध्यान से टीवी सुनने लगते है। अचानक सुनते है कि "इफ्रास्ट्रक्चर फॉइनैस कम्पनी" बनेगी। यह बढिया है भारी भरकम नाम है। 'इफ्रास्ट्रक्चर' मतलब ढॉचा-मतलब सडक-मतलब-बिजली,बन्दरगाह। वे सब भी जानते है अच्छा मोका है। वे ताऊ कि और मुह कर के बोलते है -' कमॉडीटी ट्राजैक्शन तो खैर ठीक है, मगर इफ्रास्ट्रक्चर फॉइनैस कम्पनी से ज्यादा लाभ होगा। शाम दोनो ही भुल जाते है कि  उन्हे बजट के किस हिस्से ने प्रभावित किया।
नेहरुवियन इकॉनमी के दिन बीते, इन्दिरा का समाजवाद पीछे छूट गया, आर्थिक उदारिकरण और वैश्वीकरण के भी लगभग दो दशक पुरे होने जा रहे है। लेकिन मध्यवर्ग का आदमी आज भी बजट मे अपनी वही दो पुरानी चीजे ढूढता है- इनकम टैक्स की स्लैब बढी या नही और ट्रेक्टर, टीवी,-टुथपेस्ट सस्ता हुआ या नही।
पिछले पचास सालो से अगर कोई निशिचत है तो वह है सिगरेट पिने वाला, तम्बाकु खाने वाला। क्यो कि उसे पता है कि बढेगा ही बढेगा ।


 
देश के हर नागरिक पर 1177 रुपयो का विदेशी कर्ज
देश के हर नागरिक पर लगभग 1177 रुपये का विदेशी कर्ज है। चाहे वह नवजात शिशु ही क्यो ना हो। यदि घरेलु कर्ज को जोड ले तो यह रकम हर भारतीय पर लगभग 29800 रुपए हो जाएगी।



 
पाकिस्थान से भारत को वसूलने है 3०० करोड
भारत पिछले ६० वर्षो मे पाकिस्थान से 3०० करोड नही वसुल पाया। दिलचस्प बात है कि इस राशि का भुगतान 1950-51 से ही लम्बित है।
इस बात की एक रपट गत वर्ष सुरेसजी चपलुनकर जी ने अपने ब्लोग पर भी दी थी।



विशेष-:यह एक व्यगात्मक सोच थी इसमे जिस किसी का भी नाम उल्लेखित है वे भारतिय जनमानस की भुमिका मे मेर हिरो है जो आदरणिय है।
कही भी आपका दिल दुखाया हो तो क्षमा चाहता हू,
आभर जी
हे प्रभु यह तेरापन्थ
मुम्बई टाईगर

हिन्दी का कच्चा चिट्ठा: नवभारत टाइम्स के पन्नो मे। ताऊ उड़नतश्तरी, मानसिक हलचल, व्योम के पार, शिवकुमार मिश्र के बिना कोई लेख हिन्दि चिट्ठा जगत के लिऐ पुर्ण नही ।

✪ 29 comments
ताऊ ,
उड़नतश्तरी, 
मानसिक हलचल, 
व्योम के पार, 
शिवकुमार मिश्र, 
डॉ, अमरकुमारजी, 
के बिना  कोई लेख हिन्दि चिट्ठा जगत के लिऐ पुर्ण नही ।
नवभारत टाईम्स मुम्बई आज 59 वी वर्ष गाठ मना रहा है 'हिन्दी है हम' विशेषाक मे हिन्दी जगत कि वो तमाम बाते आज चर्चा का विषय बनी। हिन्दी  चिट्ठा जगत ने आज खास स्थान पाया नवभारत के ईन्ही पन्नो मे। हमारी सहयोगी कचन श्री वास्तव ने हिन्दी  चिट्ठा जगत कि तमाम वो सख्सतियो पर चर्चा की जो ब्लोग मे आने के बाद चमक उठे है।  
भडास,मोहल्ल,नुक्ताचीनी, चोखेर बाली,पोलखोली, चव्वनीछाप,धर्म ससद,बाल सजग, सारथी,हिन्दी ब्लोग टीप्स, फुरसतियाजी इत्यादि कि चर्चा की  तो साथ ही साथ भडास के यशवन्त की हिन्दी  चिट्ठा जगत से एक लाख की कमाई का भी उल्लेख किया।  आलेख मे बताया गया है बीते 2 सालो मे 25000 हजार हिन्दी ब्लोग नेट पर आगऐ। यह बात कुछ हजम नही हुई। चुकि हिन्दी बोलने लिखने वालो कि सख्या दुनिया भर मे 68 करोड हो गई है ,वेसे मे 25000 हजार हिन्दी ब्लोग तो जन्म ले ही लेने चाहिऐ।
कचनश्री वास्तव ने शायद कोई खास जानकारी लेकर उपरोक्त आलेख नही लिखा ऐसा मुझे लगा। नही तो
ताऊ डॉट इन, उड़नतश्तरी ...., मानसिक हलचल,  शिवकुमार मिश्र और ज्ञानदत्त पाण्डेय का ब्लॉग
Vyom ke Paar....व्योम के पार....,  पंगेबाज,   कवि योगेन्द्र मौदगिल ,  कुश की कलम ,   घुघूतीबासूती ,  तीसरा खंबा ,  पराया देश,  और मेरा नाम भी जोड दु तो कोई नारजगी नही होनी चाहीऐ, हे प्रभु यह तेरा-पथ;  के नामो का उल्लेख किये बिना हिन्दि चिट्ठा जगत कि बात आपुर्णिय है। पर शायद स्पेज कम पड गया होगा ? फिर भी उनकी यह कोशिस रन्ग लाई, क्यो कि
सारथी एवम फुरसतियाजी एवम हिन्दी ब्लोग टीप्स को याद रखा।

नवभारत पर प्रकाशित लेख को देखे। बहुत ही सुन्दर लिखा है- कचनजी ने, जो बधाई की पात्र है। आप यहॉ उन्हे बधाई शुभकामना दे जो उन तक पहुचाई जा सके।

तैनसिग और हैलेरी को जरुर बहुत गर्मी लगी होगी। इसिलिऐ एवरेस्ट कि चोटी चढ गऐ होगे।

✪ 6 comments



भारत एक ऋतु प्रधान देश है।यहॉ तीन ऋतुऐ होती है। सर्दी, गर्मी और वर्षा। ठिक उसी तरह, जिस तरह यहॉ तीन प्रकार के लोग होते है। अमिर गरिब एवम मध्यम वर्गीय। गर्मियो मे अमिरो को खुब गर्मी लगती है, तो ये ठण्डे प्रदेशो मे चले जाते है। लेकिन मैने आज तक किसी अमिर को सर्दियो मे गर्म प्रदेश जाते हुऐ नही सुना। ठण्डी का मजा लेने ये पहाडो पर जाते है। मुझे लगता है तैनसिग और हैलेरी को जरुर बहुत गर्मी लगी होगी। इसिलिऐ एवरेस्ट कि चोटी चढ गऐ होगे। गर्मी पता नही इन्शान को कहॉ-कहॉ चढा देती है।
 
गर्मीयो मे हिलस्टेशन का आनन्द कुछ और ही होता है। और उसमे सबसे बडा मजा होता "स्वतन्त्रता"।मोटी-मोटी पत्नियो को भी हिल स्टेशन पर सलवार सुट,जिन्स एवम बरमुड  और ना जाने क्या-क्या पहना कर पति घुमते है। यह देखकर यू लगता है जैसे कोई बुझी हुई राख मे शोले ढूढ रहा हो। खुद पति भी एक अदधा (शराब) खरीदकर मधपान करते है। पत्निया हिलस्टेशन पर मधपान कि मनाई नही करती है। इसबिच पत्निया भी आमलेट खाने एवम चुसकियो लेने कि असफल कोशिश करते देखा गया। हिलस्टेशन पर पहली बार यह महसुस होता है कि -यह ही जिन्दगी है। शहरो मे तो कोल्हु के बैले की तरह हॉलत होती है।
कभी-कभी हालत उस समय खराब होती है जब हिल स्टेशन पर रुम फुल होते है। उस समय वहॉ के ड्राईवरलोगो को महसुस होता होगा कि वे यात्रियो के लिऐ सकटमोचक हनुमान है। जब ड्राइवर अन्दर कमरे की पुछताछ करने जाते है तो टैक्सी मे बेठे हम इस तरह इन्तजार करते है, 'जैसे कोई बाप अपने विलायत से लोट रहे डाक्टर बेटे का।' पर जब खबर मिलती है, वह वहॉ से डाक्टरी भी करके नही आया लेकिन वहॉ से कोई मेमे को ले आया है। वही हॉलात इनकी होती है। जब ड्राईवर मुह लटकाकर आता है। जब तक कही जगह नही मिलती वहॉ तक सबकी हलात सरकस के पिजरो मे पकडे गऐ जानवरो की तरह होती है, जिन्हे एक जगह से दूसरी जगह पकडकर ले जाया जा रहा हो। जब कही छोटे मोटे कमरे का बन्दोवस्त हो जाता है, तो पहली बार ड्राईवर भी इन्शान दिखाई देने लगता है।
 
जिस तरह लोग फोटुजनिक होते है और कई लोग नही, ठीक उसी तरह हिलस्टेशन का खाना भी बडा फोटुजनिक होता है। वहा पर इटली,वडा,साम्बर फोटु मे ही इटली,वडा,साम्भर दिखते है। पर जैसे ही उन्हे मुह मे रखते है तो 'जिन्दगी कटु सत्य है', उसका आभास होता है।

हर पत्नि की फरमाईशो मे एक और बडोतरी होती है। हमे भी किसी हिल स्टेशन पर अपना एक छोटा सा मकान बनाना चाहिऐ, पति को पहली बार पत्नि की यह फरमाईश कानो को मजा देती है। पर वह भी वापसी की ट्रेन मे बैठने के पुर्व उसे हिलस्टेशन पर ही छोड आता है। पत्नि को दो चार बार रंमी मे हराने के बाद पति को अपने पर तुरन्त ही 'ग्रेट गेम्बलर' होने का अभास होने लगता है। पहली बार पत्नि पति को पर-स्त्री से बात करने देती है,और जलती नही है। क्यो कि आखिर दोनो कितनी बाते करते रहेगे ? तो वे पास के रुम वाले से पहचान बनाते है। फिर रस ले लेकर दोनो जोडे खुब बाते करते है। बेचारे पतियो के लिये यह सब बाते बाद मे मधुर स्मृतिया बनकर रह जाती है। गोगल्स एवम टोपिया पहनकर खुब फोटु खिचवाते है। पर दोनो अपना फोटु साथ खिचवाने के लिऐ भले पुरुष को ढुढते है। जो सिर्फ तिन चार फोटु खीचे पर लेकिन लन्च के वक्त कुर्सी खसकाकर डाइनिग टेबल पर साथ नही बैठ जाऐ। घनिष्टता बढाने कि कोशिस ना करे। मैने यहॉ देखा है - फोटु खीचवाना हो तो हमेशा लोग पुरुषो से रिक्वेशट करते है, स्त्रियो से नही, जैसे हमे कभी माचीस की जरुरत होती है तो हम हमेशा किसी पुरुष से पुछते है,किसी स्त्री से नही। 












 शादि के फेरो के बाद हिल स्टेशन पर ही पति-पत्नि का फिर एक बार हाथ पकडने का सुअवसर प्राप्त करता है। एक सख्त टिचर हिल स्टेशन पर आकर एक साधारणा एवम रोमाटिक महिला बन जाती है। बच्चो को खुब खेलने देती है, लेट उठने, नाहने पर वह गुस्से कि बजाऐ खुश होती है,ठिक उसी तरह जिस तरह पडोसी का बच्चे का परिक्षा मे फैल होने का समाचार सुनने पर। पति को बडी ही परेशानी होती है जब उअसे अखबार न मिलने नित्यक्रम मे बाधा पडती है। उअस पर पति पेट पकडकर यह जरुर कहता है रात के खाने मे कुछ गडबड आया दिखता है, जबकि सबने वही खाया होता है,  
पकोडीवालो-चाटवालो को पति बदनाम करता है। 

पहली बार चारो तरफ सुख-शान्ति दिखाई देती है। सबके चहरो पर प्रसन्नता दिखाई देती है। ठीक रामराज्य कि तरह। मुझे तो लगता है, अयोध्या जरुर किसी हिलस्टेशन पर ही रहा होगा। यात्रा की वापसी मे, वही पत्नि जो हिल स्टेशन पर मेनका (प्रेमिका/अप्सरा) बन गई थी। अब वापस पत्नि दिखाई देने लगी है। बच्चो का चुलबूलापन अब 'बेवकुफी' दिखाई पडती है। सच तो यह है ट्रेन भी जबरदस्ती शादी होने वाली डोली की तरह दिखाई देती है। पर क्या करे अखिर कर्म भुमि मे तो जाना ही होगा। कर्म करने। भले वह सुकर्म हो या कुकर्म।

प्रवीणजी त्रिवेदी के इस प्रयास को सफल बनाने मे अपना योगदान यह फार्म भरकर जरुर दे।

✪ 7 comments
श्री प्रवीणजी त्रिवेदी  
आपका सर्वे हिन्दि ब्लोग जगत के  आर्थिक सामाजिक एवम परिवारिक आकाडो को सुचारु रुप से एकत्र करने मे कामयाब होगा। मेने हमेसा ही इस बात पर हमेशा बल दिया है जब तक हमारा आर्थिक पक्ष मजबुत नही होगा तब तक हिन्दी ब्लोग जगत के विकास मे धिमापन रहेगा। हमे इस और भी ध्यान देना चाहिऐ कि एक राष्ट्र स्तर पर हमारी तकनिकि टीम या कार्यबल हो जो इस तरह के व्यवाहारिक मुद्दो पर चिठठाकारो को मदद पहुचाऐ। हमे गुगल सहीत लोकल विज्ञापन ऐजेन्सीयो को इस ओर प्रोत्साहीत करना चाहीऐ। यह काम व्यक्तीगत स्तर कि बजाय सगठीत होकर करने मे हमे आधिक फायदे मिलेगे। इसमे हमे सरकारी एवम गैर सरकारी एजेसियो से मदद कि भी उम्मिद है. पर कोई ठोस कार्यबल एवम रुपरेखा कि जरुरत है। शायद आपके सर्वेक्षण से हम उस लक्ष्य के कुछ हिस्से तक पहुच पाने मे सफल होगे। मै बडा ही प्रसन्न हू कि आपने अपना कुछ सहयोग के रुप मे पहल कि । मै सभी  ६००० हिन्दी चिठाकारो से अपिल करता हू कि  प्रवीणजी त्रिवेदी   के इस प्रयास को सफल बनाने मे अपना योगदान यह फार्म भरकर जरुर दे। एवम इस मुद्दे पर अपनी स्पष्ट रॉय व्यक्त करे। जिससे  कुछ हिन्दी चिठाकारो के आर्थिक सामाजिक विकास के दरवाजे खुले। मेरी हार्दिक शुभकामनाऐ  प्रवीणजी त्रिवेदी को......एवम 


मुम्बई टाईगर, एवम हे प्रभु यह तेरापन्थ हमेशा ही इस तरह के कार्यो मे हाथ बटॉने को तेयार है।
प्रवीणजी की अपील

हिन्दी चिट्ठाकारों का आर्थिक सर्वेक्षण - शामिल होने का आमंत्रण

प्रिय ब्लॉगर बन्धु !!
सादर नमस्कार और अभिवादन स्वीकार  करें

पिछले दिनों हिन्दी चिट्ठाकारों के रूप में मन में उनकी आर्थिक हैसियत का आंकलन करने की तमन्ना थी .
मन में भाव यह था कि देखा जाए कि किस आर्थिक परिधि से जुड़े हुए लोग हिंदी ब्लॉग्गिंग का हिस्सा बन रहे हैं .
जाहिर है कि यदि हम ब्लॉग्गिंग को अधिकतम जान मानस तक पहुँचाने के आकांक्षी हैं तो यह सर्वेक्षण महत्वपूर्ण परिणाम दे  सकता है .
तो आइये एक पर्व के रूप में शामिल हो इस सर्वेक्षण के निष्कर्षों का इन्तजार करें
जाहिर है यह कहने कि आवश्यकता नहीं होनी चाहिए कि यह सर्वेक्षण एक रुझान जानने का ही एक मात्र प्रयास है .......इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं?
एक निवेदन और कि इस  सर्वेक्षण का प्रत्येक स्तर से प्रचार करके इसमें अधिकतम लोगों की भागीदारी ही
सच्चे परिणामो को सुनिश्चित कर सकती है . चलते चलते एक निवेदन और कि लक्ष्य ज्यादा बडे डाटाबेस का है अतः इसे प्राइमरी के मास्टर से बड़े  परिदृश्य की आवश्यकता है 
सर्वेक्षण को अपने वेब-पेज में दिखाने का link है 
सर्वेक्षण का इ-मेल link है

लाइए दे दीजिए डॉलर!!!!!

✪ 2 comments
हे प्रभु ने सुना ओबामा और जरदारी मीट को।















इधर जरदारी साहब अमेरिका पहुचे और ओबामा से मिले। पहली बार।
बोले-"लाईऐ डॉलर दीजिए।" ओबामाजी हैरान परेशान। बोले- डॉलर ?  डॉलर किसलिऐ ?
सयोग से वहॉ हिन्दुस्थानी हे प्रभु होते तो तो यही कहते कि जी,मुह दिखाई मान्ग रहे है। पर कायदे से मुह दिखाई तो जरदारी साहब को देनी चाहिये थी। पर खैर, वहॉ वह था नही। सो जरदारी साहब ने कहा-"परम्परा, रवायत।
जब भी कोई पाकिस्तानी-प्रधानमन्त्री, राष्ट्रपति अमेरिका आता है तो बातचीत होती है ,वादे होते है, जिसके बाद चलते हुऐ वह डालर मॉगता है। क्या-ओबामाजी कि समझ मे कुछ नही आया। जरदारी साहब ने कहा- डॉलर ओर क्या ?
ओबामा ने कहा-"देखिए, डॉलर तो अब हमे  भी चाहिऐ।" मन्दी का दोर है। अर्थव्यव्स्था को फिर से खडा करना है। जरदारी साहब ने कहा-" जी बिल्कुल।" मुझे भी पाकिस्थान को फिर से खडा करना है। लेकिन हमारी अर्थव्यवस्था तो बैठ गई है न-ओबामा ने कहा-इसलिये उसे फिर से खडा करने कि जरुरत है। और वह डॉलर के बिना नही हो सकती। पाकिस्थान भी तो बैठा हुआ है है जी-जरदारी साहब ने कहा- उसे भी फिर खडा करना है। वह भी डॉलर के बिना नही हो सकता।
ओबामा ने कहा-" मै कुछ समझा नही। जरा खुलकर समझाइए। जरदारी साहबको बडा आश्चर्य हुआ कि अमेरिका के राष्ट्रीपति को भी समझने की जरुरत पड रही है। पहले तो कभी नही पडी। बिना कुछ समझे बुझे डॉलर दे देते थे।
उन्होने समझाने कि कोशिस की-देखो जी, पहले तो मुझे ज्यादा समझ नही आता था। फिर बेनजीर के साथ मेरी शादी हो गई। फिर वो प्रधानमन्त्री बन गई। प्रधानमन्त्री बन गई तो, अमेरिका आना ही था। सो जब वे आने लगी तो, मैने यू ही पुछ लिया -"क्यो जा रही हो ?"उन्होने कहा -"डॉलर-लेने।" मेरे से पहले सब लाते रहे, मुझे भी लाने है। हमारे यहॉ सब यही करते रहे है। ओबामा-" ओहो, तो यह आपका धन्धा है-ओबामा को बडा आचर्य हुआ-पर मैने तो सुना है कि आपका धन्धा तो 20 % वाला है। ओह, तो आपने भी सुन रखा है कि लोग मुझे टूवेन्टी परसेन्ट कहते है-जरदारी साहब ने कहा- पर जी वो तो तब था, जब मै प्रधानमन्त्री का शोहर हुआ करता था। अब तो राष्ट्रीपती हू न। लाईए अब दीजिए डॉलर । 
लेकिन क्यो -  ओबामा फिर उसी सवाल पर लोट आऐ। जरदारी साहब को बडा आचर्य हुआ कि  इतना समझाने के बाद भी यह सवाल क्यो? सो उन्होने कहा-" अगर आप क्यो का सवाल उठा रहे है तो वह भी हम समझा देगे, पर पहले डॉलर तो दीजिए। नही। ओबामा ने कहा - पहले आप समझाइए। जरदारी साहब ने कहा-हमने मुशर्फसाहब को हटाकर पाकिस्तान मे डेमोक्रेसी कायम की। बताइए, बिना डालर के डेमोक्रेसी कैसे चलेगी।पर तब तो दिया था-ओबामा ने कहा-जब आपने
डेमोक्रेसी कायम की थी। ओह, हॉ!- जरदारी साहब ने कहा-" दिया तो था, पर मुझे लगा डेमोक्रेसी के नाम पर आप ओर दे देगे।

आखिर डेमोक्रेसी आपकी कमजोरी है न । नही, हमेशा नही-ओबामा ने कहा।
अच्छा-जरदारी साहब ने कहा-फिर मुम्बई पर हमला हुआ। सबने कहा पाकिस्थान से हुआ। हमने सोचा अच्छा मोका है-ऑतकवाद से लडने के लिऐ डॉलर चाहिए। पर तब दिये तो थे-ओबामा ने कहा-ओह हॉ,जरदारी साहब ने कहा- दिए तो थे,पर मुझे लगा और दे देगे। फिर हमने कहा तालिबान आ रही है। पकिस्तान को उनसे बचाना है तो डॉलर दीजिए।

पर तब दीए तो थे-ओबामा ने कहा। ओह हॉ- दिए तो थे,पर लगा और दे देगे, आखिर तालिबान आपकी कमजोरी है। खैर, पर अब हमे डॉलर चाहिए। पर क्यो- ओबामा ने कहा। तालिबान से लडने के लिए-लाइए दीजिए डॉलर।
अब जाकर करजाई साहब न भी अपनी चुपी तोडी। बोले- दे दीजिए न सर, और थोडे मुझे भी दे दीजिए। आखिर तालिबान से लडना है।
लेखक-सहिराम
नवभारत टाईम्स के सोजन्य से
१५ मई २००९













मेरे मम्मी पापा की wedding anniversary है तो लिखना तो पडेगा

✪ 16 comments

आपको पता तो है मै लिखने मे आलसी हू। पर चुकी मेरे मम्मी पापा की wedding anniversary है तो लिखना तो पडेगा ही क्यो कि मिताली जिद्द कर रही थी। सबसे पहले आपको सभी को मेरा प्रणाम एवम आप सभी का आभार कि हमारी खुशी मे आप सामिल हुऐ और हमे बर्दास्त किया।
चुकी पापा कि यह नई ब्लोगिग दुनिया घर परिवार जैसी ही लग रही है। आप सभी का एक दुसरो के प्रति स्नेह, लगाव, देख अच्छा लगता है। आप सभी ब्लोगवासी एक दुसरो के दुख सुख मे भागीदार बनते है यह भी एक नई व्यव्स्था का सुत्रपात  है।
पापा मम्मी के बारे मे मेरी छोटी  बहन मिताली ने पापा के ब्लोग "हे प्रभु यह तेरापन्थ" पर बाते कर गई है। उसे कुछ ज्यादा ही बोलने का शोक है कुछ बोल गई हो तो उसे बच्चा समझ क्षमा कर देना। 
पापा कि शादी बडी ही मुश्किल धडी मे हुई थी जैसा की मेरे बडे पापा बताते है - २० मई १९९१ रात्री ११:३५ मुम्बई वी टी से २५० बराती के साथ ट्रेन द्वारा मद्रास के लिऐ रवाना हुऐ। सभी बडे ही खुश थे। २० कि रात २१ कि सुबह शाम ट्रेन मे मोज मस्ती से गुजरी। सभी बराती भी खुश थे। पापा तो होगे ही क्यो कि वो मम्मी को लेने जा रहे थे। यह ट्रेन मुम्बई से मद्रास पहुचने मे ३० घन्टा लेती है। यानी २२ मई को सुबह ५ बजे मद्रास सैन्ट्रल पर पहुचने वाली थी। २१ मई रात्री ११:१५ कोई अन्तरक्षी खेल रहा था , पापा के दोस्त ताश खेल रहे थे। बच्चे सो गऐ थे।  तभी बडे पापा को सुचना मिली कि चन्नैई मे राजीव गान्घी की हत्या हो गई।  कल २२ मई कि शादी है । बरात कडप्पा स्टेशन के आसपास चल रही थी। सभी के चेहेरे तनाव ग्रस्त थे। क्या होगा कैसे होगा। कैटरिग व्यव्स्था का खाना पिना भी यहॉ अन्तिम था. क्यो कि २१ मई रात का खाना तो हो चुका था। २२ मई सुबह ५ बजे तो बरात मद्रास पहुचने ही वाली थी। रात्री का समय था ज्यादातर लोगो को राजीवजी कि हत्या कि खबर देर- सवेर लगी हो इसलिऐ ट्रेन चलती रही कही रुकी नही। सभी लोग भगवान का नाम ले रहे थे । बडे पापा ओम भिक्षु जय भिक्षु कि माला गिन रहे थे। मद्रास से ठिक तीन धन्टे पुर्व तिर्थनी स्टेशन पर ट्रेन रात्री २ बजे आकर रुकी। रुकी तो ऐसी रुकी की सुबह हो गई दोपहर हो गई शाम हो गई ट्रेन चलने का नाम नही ले रही है। प्लेट फार्म खाली पडे है। दुकाने बन्द। कुछ लोगो के टोले चिल्लाते भागते हुऐ देखे जा सकते है। हमारी खाने पिने कि व्यवस्था भी खत्म हो गई थी। स्टेशन पर ना बिस्किट पानी कुछ नही। बच्चे भुख प्यास से रो रहे थे। पुरे के पुरे बराती भयन्कर टेशन मे, अब क्या होगा ? शादी होगी के नही ? बरात मद्रास पहुचेगी के नही। खाने-पिने का क्या ? २५० आदमीयो कि क्या व्यव्स्था ?  बडी ही दुविधा लग गई। फोन बन्द हो गऐ थे। लडकि वालो से सम्पर्क नही हो रहा था। मद्रास के क्या हालात है ? सभी बाते अन्धेरीगलियो कि तरह लग रही थी। आखिर भुख प्यास से बिलखते बच्चो के लिऐ बैगलोर वाले भुरोसा कुछ कैटरि वालो के साथ  तिर्थनी गॉव मे जाने का फैसला किया। सभी मे घबराहट थी। स्टेशन के बहार पहुचे सामने दुकानो मे से धुआ निकल रहा था। सडके सुन सान थी। सामने गली मे से आतकियो का झुन्ड दिखा , भुरोसा एक हाथ गाडी के सहारे छुप गऐ। छुपके छुपाते आखिर गॉव मे एक स्थानिय राजस्थानी परिवार के मुख्या से मिले जो वहॉ के तलेवर (नेता) भी थे, उन्को बताया कि किस तरह २५० बराती उनके गॉव के स्टेशन पर कल रात से फसे हुऐ पडे है भुखे प्यासे है। बच्चो के लिऐ दुध बिसिकट तक नही है । स्थानिय भाई ने कहा आप चिन्ता मत करो अब आप हमारे मेहमान हो। उनके घर पर २५० बरातियो के लिऐ चावल दाल एवम  बच्चो के लिऐ ३-४ लिटर दुध बिस्किट पानी का इन्तजाम किया एवम अपने १० कार्यकर्ताऔ को साथ लेकर बरातीयो को खाना खिलाया। ऐसे महान लोगो को मै प्रणाम करता हू। भुरोसा ने उनको खाने के पैसे भी देने कि कोशिश की पर वो नारज हो गऐ। यह हमारा सोभाग्य है कि आप ने हमे सेवा का मोका दिया।

कैसे भी करके २२ मई को शाम ५-६ कि बिच ट्रेन चन्नैई सैन्ट्रल पहुची। तीन चार एम्बुलेन्स के माध्यम से बरातीयो को  पापा  के साथ लडकी वाले ट्रिपलिकेन तेरापन्थ भवन ले गऐ। हेमामालिनी शत्रम (वाडी)  को रात मे ही खाली करना पडा। लाखो रुपऐ नानाजी के वेस्ट हो गऐ। पुरा डेकोरेशन, भोजन नास्ता, मिठाईया बसो, बेन्ड पार्टी, घोडी, VGP  खाना सभी तो बरबाद हो गया था। जैसे तैसे बिना घोडी चढे पापा का विवाह हुआ। २३ मई को पापा मम्मी को लेकर बरातीयो के साथ सकुशल मुम्बई पहुचे। उस दिन मद्रास मुम्बई सहित कई जगहो पर शादीया रद्द हुई, बराते वापिस गई पर पापा मम्मी के साथ ऐसा नही हुआ। इसलिऐ आज मम्मी पापा को happy wedding anniversar॥
आप सभी को मैने बोर किया होगा॥॥॥॥।प्लिस माफ कर देना. tankx
फिर मिलेगे जी
प्रणाम
जयेश



































यह वो ही ट्रेन है जिसमे पापा की बरात गई थी {२} मेरे फोटू मम्मी के साथ

रामप्यारी जिद कर रही है.. ताई दस रुपया दो ना, चाउमीन वाली नैनो आई है।

✪ 10 comments
चुनाव मे नोट कि जगह नैनो बॉटी जाएगी।

नेता नोट के बदले नैनो कि चॉबियॉ बॉटते हुए पकडे जाएगे।
वे गरीब के झोपडे कि बजाय गरीब कि नैनो मे बैठकर फोटू खिचवाएगे। 
समाज , नैनो और गैर नैनो वालो मे बट जाऐगा। 
"बिलो पॉवर्टी लाइन" कि तरज पर बिलो नैनो लाइन कहा जाएगा।

व्यग के लिए क्षमा


एक रात को आया सपना, नैनो हुई अपनी-हे प्रभु

गहरी निन्द्रा मे थे "हे प्रभु"। नैनो का ओपचारिक लॉन्स देखते हुऐ हे "प्रभु", गम्भीरता से सोच  रहे थे कि नैनो के बाद की दुनिया यानी हिन्दुस्थान कैसा होगा? "हे प्रभु के" सपने मे आई कुछ आशन्काए मुलाहिजा फरमाऐ।

(1) हे प्रभू घर से निकल सामने वाली सडक पर पहुचते है,यहॉ वहा देखा। कोई नजर नही आ रहा। अरे...यही तो रहता thaa....कहॉ चला गया? तभी नजर अपने दाई तरफ पेड के नीचे पडती है। एक साथ छह-सात नैनो खडी है। मै गाडी के नजदीक पहुचता हू, उसके अन्दर झॉकता हू। एक शख्स गले मे गमछा डाले, दोनो पॉव सीट पर रख, खैनी लगा रहॉ है। मैने इसे पहले कई बार देखा है पहचानने की कोशिश करता हु। अरे तुम भइया तुम...? जी बाऊजी! मै..। और तुम्हारा रिक्शा....? वो तो मैने बेच दिया ये गाडी कल ही खरीदी है।

(2) ताऊ के घर का दृश्य चल रहा है मेरे सपने मै- ताई ताऊ को कन्जूसी के लिऐ ताने दे रही। ताऊ वर्तमान के खर्चो  और भविष्य की जिम्मेदारीयॉ गिना अपनी कन्जूसी को जस्टिफाई कर रहा है। इस बीच ताऊ के घर के दरवाजे कि कुण्डी बजती है। अरे गन्गूबाई (कामवाली) तुम..आज इतनी जल्दी कैसे? ताई वो क्या है ना...आज मेरा घरवाला (पति) मुझे ड्राप कर गया...वो कल ही गाडी खरीदी है...। इसीलिए मै जल्दी आई। ये सुन कन्जूस ताऊ के मन मे खतरे कि धन्टी बजती है इससे पहले ताई मुझे ड्राप कर दे, मुझे नैनो खरीद लेनी चाहिऐ। ताई भी खुश हो जाऐगी, रामप्यारी को स्कुल छोडने के काम भी आ जाऐगी, साथ ही साथ भाटियाजी कि शैखी भी खत्म हो जाऐगी।
(3)  दिल्ली के एक मार्केट मे चॉइनिज नैनो पचास हजार मै मिल रही है, शैलस भारतवासी बखान कर रहे थे-असली नैनो के मुकाबले इसमे कई दिलचस्प फिचर है। पैट्रोल डालने का झझट नही बैटरी से चलने वाली नैनो। किसी भी मोबाईल चार्जर से चार्ज होने वाली नैनो।
शैलश भारतवासी खरीद लेते है। एक दिन दिल्ली ब्लोगर-मिटस मे शिवकुमारजी, लवलीजी, अरविन्दजी मिश्रा, सजय सैन सागर को बैठा कर इण्डिया गेट के दर्शन कराने ले जा रहे थे तभी दरवाजा टुटने कि आवाज सुनाई पडती है तभी लवलीजी बोलती है अरे यह क्या....? इसमे तो थर्माकॉल का दरवाजा है।



(4) ताई का पल्लू पकड कर  रामप्यारी जिद कर रही है..
ताई दस रुपया दो ना, चाउमीन वाली नैनो आई है।

सडक पर नैनो की तादाद बढने लगेगी। जाहिर है हादसे भी बढेगे। जिस तरह ट्र्क से ट्रक भिड जाते है उसी तरह नैनो से नैनो भी भिडेगी। ऐसे मे शास्त्रीजी के "सारथी" पर हेडलाईन आम होगी-  
"नैनो से नैनो लडी.....
दिल तो नही मिले,
दो कि टॉग जरुर टूट गई,
नैनो कि टक्कर मे दो ने नैन गवाऐ।"
सभी ब्लोगरो मे नैनो की होड मची हुई थी। ऐसे मे "हे प्रभु" के  सपने मे आकर श्यामलजी सुमन (मनोरमा) (प्रशासनिक पदाधिकारी टाटा स्टील, जमशेदपुर) ने तो अपने ब्लोगर दोस्तो को जो उनके दिऐ मोबाईल नम्बर पर उनकी कविता सुनेगा उन्हे एक नैनो पार्सल करवाने की स्कीम भी बताई (सुमनजी की टिपणीयो के साथा मोबाईल नम्बर लटका हुआ है आप चाहे तो सुमनजी से


"मोबाईल पर कविता सुनो और नैनो ले जाओ"वाली स्कीम मे भाग ले सकते है।

सडको पर चेतावनी लिखी हुई पढ रहे थे हे प्रभु,-
"सडक पर चलते हुऐ अपने नैनो का इस्तेमाल करे वरना नैनो के नीचे आ जाएगे।"
पुराने कपडो के बदले  बरतन देने वाले भी नैनो रखने लगेगे।
पति कि दो पुरानी पैन्ट के बदले नैनो मिल जाएगी।
घरो मे गेस्ट रुम कि तरह ही गेस्ट नैनो रखेगे।