लाइए दे दीजिए डॉलर!!!!!

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हे प्रभु ने सुना ओबामा और जरदारी मीट को।















धर जरदारी साहब अमेरिका पहुचे और ओबामा से मिले। पहली बार।
बोले-"लाईऐ डॉलर दीजिए।" ओबामाजी हैरान परेशान। बोले- डॉलर ?  डॉलर किसलिऐ ?
सयोग से वहॉ हिन्दुस्थानी हे प्रभु होते तो तो यही कहते कि जी,मुह दिखाई मान्ग रहे है। पर कायदे से मुह दिखाई तो जरदारी साहब को देनी चाहिये थी। पर खैर, वहॉ वह था नही। सो जरदारी साहब ने कहा-"परम्परा, रवायत।
जब भी कोई पाकिस्तानी-प्रधानमन्त्री, राष्ट्रपति अमेरिका आता है तो बातचीत होती है ,वादे होते है, जिसके बाद चलते हुऐ वह डालर मॉगता है। क्या-ओबामाजी कि समझ मे कुछ नही आया। जरदारी साहब ने कहा- डॉलर ओर क्या ?
ओबामा ने कहा-"देखिए, डॉलर तो अब हमे  भी चाहिऐ।" मन्दी का दोर है। अर्थव्यव्स्था को फिर से खडा करना है। जरदारी साहब ने कहा-" जी बिल्कुल।" मुझे भी पाकिस्थान को फिर से खडा करना है। लेकिन हमारी अर्थव्यवस्था तो बैठ गई है न-ओबामा ने कहा-इसलिये उसे फिर से खडा करने कि जरुरत है। और वह डॉलर के बिना नही हो सकती। पाकिस्थान भी तो बैठा हुआ है है जी-जरदारी साहब ने कहा- उसे भी फिर खडा करना है। वह भी डॉलर के बिना नही हो सकता।
ओबामा ने कहा-" मै कुछ समझा नही। जरा खुलकर समझाइए। जरदारी साहबको बडा आश्चर्य हुआ कि अमेरिका के राष्ट्रीपति को भी समझने की जरुरत पड रही है। पहले तो कभी नही पडी। बिना कुछ समझे बुझे डॉलर दे देते थे।
उन्होने समझाने कि कोशिस की-देखो जी, पहले तो मुझे ज्यादा समझ नही आता था। फिर बेनजीर के साथ मेरी शादी हो गई। फिर वो प्रधानमन्त्री बन गई। प्रधानमन्त्री बन गई तो, अमेरिका आना ही था। सो जब वे आने लगी तो, मैने यू ही पुछ लिया -"क्यो जा रही हो ?"उन्होने कहा -"डॉलर-लेने।" मेरे से पहले सब लाते रहे, मुझे भी लाने है। हमारे यहॉ सब यही करते रहे है। ओबामा-" ओहो, तो यह आपका धन्धा है-ओबामा को बडा आचर्य हुआ-पर मैने तो सुना है कि आपका धन्धा तो 20 % वाला है। ओह, तो आपने भी सुन रखा है कि लोग मुझे टूवेन्टी परसेन्ट कहते है-जरदारी साहब ने कहा- पर जी वो तो तब था, जब मै प्रधानमन्त्री का शोहर हुआ करता था। अब तो राष्ट्रीपती हू न। लाईए अब दीजिए डॉलर । 
लेकिन क्यो -  ओबामा फिर उसी सवाल पर लोट आऐ। जरदारी साहब को बडा आचर्य हुआ कि  इतना समझाने के बाद भी यह सवाल क्यो? सो उन्होने कहा-" अगर आप क्यो का सवाल उठा रहे है तो वह भी हम समझा देगे, पर पहले डॉलर तो दीजिए। नही। ओबामा ने कहा - पहले आप समझाइए। जरदारी साहब ने कहा-हमने मुशर्फसाहब को हटाकर पाकिस्तान मे डेमोक्रेसी कायम की। बताइए, बिना डालर के डेमोक्रेसी कैसे चलेगी।पर तब तो दिया था-ओबामा ने कहा-जब आपने
डेमोक्रेसी कायम की थी। ओह, हॉ!- जरदारी साहब ने कहा-" दिया तो था, पर मुझे लगा डेमोक्रेसी के नाम पर आप ओर दे देगे।

आखिर डेमोक्रेसी आपकी कमजोरी है न । नही, हमेशा नही-ओबामा ने कहा।
अच्छा-जरदारी साहब ने कहा-फिर मुम्बई पर हमला हुआ। सबने कहा पाकिस्थान से हुआ। हमने सोचा अच्छा मोका है-ऑतकवाद से लडने के लिऐ डॉलर चाहिए। पर तब दिये तो थे-ओबामा ने कहा-ओह हॉ,जरदारी साहब ने कहा- दिए तो थे,पर मुझे लगा और दे देगे। फिर हमने कहा तालिबान आ रही है। पकिस्तान को उनसे बचाना है तो डॉलर दीजिए

पर तब दीए तो थे-ओबामा ने कहा। ओह हॉ- दिए तो थे,पर लगा और दे देगे, आखिर तालिबान आपकी कमजोरी है। खैर, पर अब हमे डॉलर चाहिए। पर क्यो- ओबामा ने कहा। तालिबान से लडने के लिए-लाइए दीजिए डॉलर
अब जाकर करजाई साहब न भी अपनी चुपी तोडी। बोले- दे दीजिए न सर, और थोडे मुझे भी दे दीजिए। आखिर तालिबान से लडना है।
लेखक-सहिराम
नवभारत टाईम्स के सोजन्य से
१५ मई २००९













2 comments

Udan Tashtari 23 मई 2009 को 11:34 pm

परम्परा का ख्याल करके तो दे देना चाहिये..दे दो भई!!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 24 मई 2009 को 6:03 am

बहुत अच्छे.........
खरीदार और सौदागर के लेन-देन का लेख,
सुन्दर रहा।