क्या ज्ञानदत्तजी,समीरजी,भाटीयाजी,शास्त्रीजी,ताऊ, बैगाणीजी,मिश्राजी, फुरसतियाजी को मैने तेल लगाया ?

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"25 April 2009 हिन्दी ब्लोग जगत मे टीपणीकारो का भयकर अभाव :व्यग" नामक एक व्यग को मेने अपनी सोच के हीसाब से पिरोया था। मेरे चिठठा दोस्तो ने मेरे इस व्यग को सराह भी। परन्तु एक बेनामी भाईसाहब या बहनजी को मेरे व्यग मे जिन्ह प्रतिष्टीत लोगो का नाम मैने लिया वो उनके गले कि फॉस बन गया, या यू कहू कि उनका नाम नही देख ईर्ष्यावश अपना दिमागी सन्तुलन को सम्भाल नही पाये और बेनामी बनके आगऐ अपने मन कि भडास निकालने। देखे तो वो कैसे कुन्ठित मन से लिखते है। आप भी पढे।


"बेनामी ने कहा…

naam tiger kam gidad ka. ye jo nam likhe hain, inko tel lagane se behtar hai naye ane walo ka swagat karo. badiya parosoge to naye log judege. in namo ki chamachagiri karane se kuchh nahi milanewala.
April 26, 2009 11:47"


सबसे पहले तो आप जो भी है जान ले कि मैने आपकी टिपणी प्रसारित कर दी है, जो आप समझ ले की

"टाईगर" वाला कार्य तो मैने कर ही दिया है।

रही बात गिदड कि तो वो आपने बेनामी पृष्ट्भूमि से टिपणी कर अपने आपको गिदडो कि जम्मात मे शामिल करने से बच नही पाऐ।

और आप यह भी समझे ले कि तेल आप जैसो को नही लगाया जाता क्यो कि तेल कि भी कोई ईज्जत होती है और फिर महगा भी तो है ।

भाई नाम लिख देते तो हम आपकी भी चमचागिरी कर देते अब बिना नाम वाले आशिक के क्या हॉल हो वो तो आप जानते ही है।

रही बात नये चिठाकारो कि तो आप उनकि चिन्ता छोडेये वो काबिल है अपने बुते पर नाम कमाने के लिऐ।

भगवान आपको सद्धबुद्धी दे और क्या मागु आपके लिऐ ?

नोट- यह बेनामी जो होते है वो नामी गिरामी ही होते है। पर उनके बुरे कार्य, बुरे विचार, कुन्ठीत-मन, जलस, उन्हे बेनामी बना देते है- बेचारो के कर्म ही खराब होते है जो सुन्दर मानव जीवन को बेनामी होकर जीते है।

विशेष यह चिठ अगर आशिषजी खण्डेलवालजी पढ रहे है तो मेरा निवेदन इस बेनामी वायरस का कैसे पता लगाया जाये ? ब्लोग जगत के इस ऑतकवाद से निपटने के लिऐ क्या हमारी टेक्निकल टीम तैयार है। अगर नही तो भविष्य के लिऐ चिन्तनिय विषय है।

सभी बन्धु इस बात कि सज्ञान ले और बेनामी के इस कृत्य कि भरसना करे भर्त्सना ताकि भविष्य मे कोई भी हिन्दी चिठाकारा को इस तरह कि मानसिक परेशानीयो से नही झुजना पडे।

हिन्दी ब्लोग जगत मे टीपणीकारो का भयकर अभाव :व्यग

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दिनाक २४ अप्रेल,( खबरची)

ग्रीष्मलालिन अवकाश,एवम चुनावी धमाल के कारण कई दिनो से हिन्दी ब्लोग जगत मे टीपणीकारो का भयकर अभाव हो गया है। विश्वस सुत्रो के अनुशार कई दिग्ज चिठ्ठाकारो ने तो नया माल (पोस्ट) बजार मे उतराने के लिऐ घबराऐ हुऐ है। खबरची को पता चला है कि एक बडा ब्लोग घराना तो अपनी नियमित ब्लोग प्रोडेक्सन को कुछ दिन के लिऐ स्थिगित करने का मन बना लिया है।

कुछ दिनो पुर्व तक जिस ब्लोगर को थोक बन्द टिपणीया मिलती थी, वो आजा आधे पर आ गऐ है। और छोटे ब्लोगरो कि तो इस"टिपणीया अकाल" से कमर ही टुट गई है।

हमारे सवाददाता के अनुसार कई ब्लोगो पर, पाठको के पहुचने वाला मीटर तो १०० पाठको कि सख्या बताता है, पर टिपणी २-३-या ५ तक सीमीत हो गई है। छोटे ब्लोगरो के तो हप्तो से "पाठक-पहुच" मीटर के कॉटे रुके पडे है। ब्लोगरसरकार के प्रधानमन्त्री श्री ज्ञान दत्त जी पाण्डे ने पत्र्कारो से बात करते हुऐ कहा है की-" स्थिति चिन्ताजनक है समय रहते पीड़ित ब्लोगरो को टिपणियो कि साहयता नही पहुचाई गई तो कई ब्लोगर समय से पहले टीपण्णीयो के अभाव से उजड जाऐगे, इसलिऐ मैने टिपणियामिनिस्टर समिरजी को निर्देश दिया है कि ट्रको से हेलिकोपटर से कैसे भी हो ब्लोगरो को टिपणिया मुहैया कराई जाऐ। जरुरत पडे तो उनके ब्लोग 'उडन-तस्तरी" का ट्राफिक इस और मोडे।"

ब्लोगरसरकार टिपणियो कि कमी नही होने देगी। जरुरत पडी तो महानगरो मे कई महिनो से बन्द पडे

"कॉल सेन्ट्रस" के युवक युवतियो को टिपण्णीयॉ लिख भेजने के काम मे लगाया जाऐगा।" उधर् भारत दोरे पर गऐ टिपणियो के गृह राज्य मन्त्री राजीव भाटियाजी को तुरन्त नेट पर बैठकर गरीबी रेखा के निचे वाले ब्लोगो को तुरन्त टिपणिया साहयता भेजने को कहॉ गया है।

एवम ब्लोगेरिया के प्रतिपक्ष के नेता शास्त्रीजी से भी कहॉ है कि वे बाहर गॉवो कि यात्रा कम करे, एवम टिपणियो का फ्लो बडाऐ। उधर ब्लोगरो कि नई-नई नेता बनी घूम रही रामप्यारी ने मॉग कि

"पाठकपहुच मीटर", एवम 'हिचकी मीटर' ( हिचकी मीटर- किसने कितनी टिपणिया कि ) कि उच्च स्तरीय जॉस कि जाऐ।मीटरो मे लोचा लगता है। उधर चॉन्द को लुटने गऐ हरीयाणवी ताऊ ने आकाशवाणी करते हुऐ वादा किया है -"अब वो रोज कि दस कि जगह २० टिपणीया भेजेगे।" चोखोरबाली कि सुजाताजी पारुलजी, रचनाजी, लावण्याजी, भी इस त्रासदि से चिन्तित है। लवलीजी ने तो ब्लोग पर "फुल" हटाकर अपना छाया चित्र भी टॉग दिया है। ताकि टिपणीकार बिना टिपणी किऐ ना जाऐ खाली-पिली आवक-जावक ब्लोगमीटर फोकट मे ही चलता नही रहे। एकमात्र ब्लोगर अल्पनाजी के वहॉ टिपणियो कि आवाजाही अच्छी है। बैगाणीजी तो अपने मिडिया आफिस अहमदाबाद से कल इसके बारे मे वक्तव्य देने वाले है। कन्नुजी, ई गुरु राजीव ने बिहार के बिहड जग्लो से आदमी के हाथ चिठा लिख भेजा है उसमे उन्होने कहा-" भाई समय रहते लाईन चेन्ज करली-हम लोगो ने, नही तो अभी.................? उधर इस टिपण्णीयो कि त्रासदी कि मार झेल रहे अरविन्द मिश्राजी चाईना से टिपणीया इम्पोर्ट करने के फिराक मे, ब्लोग को और मसाले दार बनाने जा रहे। कोची केरला से शास्त्रीजी ने हमारे खबरी को बताया कि-" टिपणीयो का भारी अभाव् या मन्दी का मुझे पहले से अन्देशा था, मैने इस टिपणीया मन्दी से निपटने के लिऐ ब्लोग मे कई तरह के बदलाव किऐ है। पहला बदलाव मेरा जुना पुराना फोटु बदल डाला, ब्लोग का मुख्य पृष्ट नया डाला, उसी ब्लोग मे मेरा सिक्को के कलेक्शन से जोडा, और तो पिछले कैइ दिनो ऐसे ऐसे विषयो पर लिखता हु कि लोगो को हजम नही होता और गुस्से मे एक दो टीपणी लिख मारते है, और कभी- कभी टिपणीयो मे मै स्वय भी पहुच कर कोटा पुरा कर लेता हू।"

फुरसतिया जी ने लालकिले कि दीवार पर खडे हो कर बताते है - " भाई, हमे कोई चिता नही हमारी सेटिग्स थोडि अलग ढग कि है हमारी ग्राहकी जमी-जमाई है,फिक्स ग्रहाक है। अगर टिपणीयो का यह अभाव दो तीन साल तक भी रहे तो चिन्ता कि कोनोही बात नाही हमारे पासमा प्रयाप्त टिपणीकारो का कोटा है-राम राम।"

पाठको के लिऐ २४ अप्रेल २००९ सुबह से शाम सात बजे तक के टिपणियो के ऑकडे प्रस्तुत है :-


१ पूरी में समायी-कचौरी
आज 16 Comments: : वडनेकर जी!


२ शुक्र है शोभित ह

आज 7 Comments: दर्पण साह


३ छत्तीसगढ़ की नारी-सब पर भारी

आज 09Comment राजकुमार ग्वालानी


४ प्रवक्ता, ख्वाब का दर, हथौड़ा,- पाबला

आज0 1 Comment बी एस पाबला


५ एक खुली बहस uchcharan

आज 07Comment डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक


६ चुनावी बदलाव की -

आज 08 Comments: मोनिका गुप्ता


७ आठवें जनम की आशंकायें कस्‍बा

आज 6Comments: ravish kumar


८ अस्मत का सवाल -सारथी

आज 02Comments Shastri April 22/२००९ को 13Comments:


९ बाबा-दादी की कहानी -चोखेर बाली

आज 01Comments:सुजाता April23/२००९ को 05Comments:


१० कौन है तालीबान -पंगेबाज

आज 10 Comments:arun feb 01/2009 को 10 Comments:


११ जो "आज की पसन्द"-चिट्ठा चर्चा

आज 09 Comments चिट्ठा April23/2009 को 23Comments:


१२ मानसिक हलचल

आज 20 Comments: ज्ञानदत्त पाण्डेय April 21,को 36 Comments:


१३ जरा पक्षियों की भी सुनो : ताऊ

आज 28 comments: ताऊनामा ! April 23, को 57 comments:


१४ आम आदमी तो पापी -शिवकुमार

आज 13 commentsशिवकुमार! April 22, को 20 comments:


क्षमा करे व्यग के लिए ......क्षमा करे व्यग के लिए ......क्षमा करे व्यग के लिए ......

डा.रूपेशजी श्रीवास्तव ने यह क्या पुछा ? भारत के स्वाधीनता संग्राम से जुड़े दस जैन क्रान्तिकारियों के नाम बताइये

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भा रुपेश जी ने कल हे प्रभु यह तेरापंथ पर आकर जिज्ञासा जाताई थी जैन धर्म के बारे मे। लगता है डा.रूपेशजी श्रीवास्तव सात्विक मन से कुछ प्रशन रखे थे जैन परम्परा को एवम जैन क्रान्तिकारियों के बारे मे जानने को इच्छुक लगे।

चुकी जवाब लघु भी हो सकता था या प्रतिक्रया कल के कमेन्ट बोक्स मे भी दे सकते थे, किन्तु सोचा शायद यह उचित नही रहेग क्यो कि रुपेशजी के अलावा और भी सज्जन होगे जो पुर्णतया जानना चाहते होगे कि जैन धर्म क्या है ? उसके मत क्या है? यह सभी जानने के लिऐ आपको और हमको इतिहास के ज्ञान कि जरुरत पडेगी अथवा शास्त्रार्थ कि, और उसके लिऐ आपको और हमे महापुरुषो कि चरण मे जाना होगा।

"डा.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava) ने कहा…

तीन छोटे सवाल जो कि मुझसे करे गए थे परन्तु मेरे पास उत्तर नहीं था अब आपसे जान सकता हूं---
१. भारत के स्वाधीनता संग्राम से जुड़े दस जैन क्रान्तिकारियों के नाम बताइये।
२.मुसलमान कुरान शरीफ़,हिन्दू भगवदगीता, क्रिस्तान बाइबिल की अदालत में सत्य बोलने के लिये शपथ लेते हैं जैन किस ग्रन्थ की शपथ लेते हैं यदि भगवदगीता की ही शपथ लेते हैं तो क्यों हिंदुओं से अलग मानते हैं खुद को?
३.www.jagathitkarni.org नामक वेबसाइट चलाने वाले क्या कह् रहे हैं और कोई इनके विरुद्ध कानूनी कार्यवाही क्यों नहीं करवाता?
मेहरबानी करके इन शंकाओं का समाधान करें।"

१. पहली बात स्वाधीनता संग्राम से जुड़े दस जैन क्रान्तिकारियों के नाम जिसने आपसे पुछा उसके पिछे उनकी भावना क्या रही होगी ? यह मै नही जानता हू। ना ही इस बात से यह साबीत होता है कि जैन जाती में डरपोक किस्म के लोग है। और लोगो को ऐसा प्रशन करने कि आवश्यकता ही क्यो पडी ? समझ के परे है

चुकि मै जैन हू सत्य अहिसा, अस्तेय सयम्, सेवा के सिद्धान्तो कि पालना करता हू इसलिऐ मेरा फर्ज होता है जिन लोगी ने भी आपसे इसे सवाल किए उनको अच्छे मन से सन्तुष्ट करु।

सैकडो जैनी है जिन्होने स्वाधीनता संग्राम मे जेल भी गऐ और बलिदान भी दिया। गुजरात महाराष्ट्र्, राजस्थान्, मध्यप्रदेश अन्य क्षैत्रो से जैनी लोगो ने स्वाधीनता संग्राम मे हिस्सा लिया। पुरुषो को छोडो महिलाओ ने भी इस मे भाग लिया।

रिषब दास राकॉ ( कई जैल यात्राऐ एवम मात्मा गान्धी विनोबा के साथ कई वर्ष रहे,) रमणीक् मेहता, (तीन बार जैल) अमर शहिद हुकमिचन्द जैन ने (बिहार हिसार के कानुगा परिवार से ) १८५७ कि क्रान्ति मे तात्या टोपे के साथ कुद पडे। १८ जनवरी १८५८ को लालाजी को फॉसी पर लटका दिया। अग्रेजो कि कृरता तो देखिऐ लालाजी के भतिज फकिरचन्दजी जैन जिसे अदालत ने रिहा कर दिया था उसे भी पकडकर फॉसी दे दी गई। लाला हुकमिचन्द के नाम से हासी मे एक पार्क भी बनाया है।

अमर शहीद अमरचन्द बॉठीयॉ (तत्कालिन गवालियर राज्य के कोषा अध्यक्ष) रानी लक्ष्मीबाई कि क्रान्ति सेना मे शामिल हुऐ।२२ जून १८५८ को ग्वालियर मे ही अग्रेजो ने राष्ट्र द्रोह का सवाग रचके भिड भरे सर्फा बाजार मे पेड से लटकाकर अमरचन्द बॉठीयॉ को फॉसी दे दी। इस तरह मोहन राज जैन ( बाली पुर्व विधायक्) मुलचन्द डागा ( २ बार सॉसद पाली से ) सहीत हजारो जैन लोगो है से इस लडाई मे शामिल हुऐ थे। जैन ही क्यो पुरा देश ईस लडाई मे भाग लिया। जिन्होने किसी न किसी रुप मे स्वाधीनता संग्राम मे अपना योगदान दिया, जैल गये, फॉसी पर लटक गऐ, ऐसे महान सपुतो को मै और पुरा देश सलाम करता है ।

२.आपके दुसरे सवाल का जवाब इस तरह से दुगा- भारत का अन्य देश के साथ युद्ध हो रहा हो भारत कि जीत हो जाती है पुरा देश खुशी से झुमता है तब आप कहते हो आपभी ( जैन्, सिख, इसाई) खुश लगते हो, तो हिन्दु क्यो नही बन जाते । इस खुसी में अर्थ राष्ट्रीयता से है......

अरे भाई गीता जब रची गई उसमे कोई हिन्दु या जैन का उलेख नही है भगवतगीता मे जो कहा गया वो हे

"सर्वे जना: सुखिना भवन्तु" सभी सुख से रहे यही मुल मन्त्र का जैनो मे अर्थ दिया गया "जियो और जिने दो"

बाकी इसका सम्पुर्ण ज्ञान ससार के महान विदुषक, ज्ञाता धाता, महान सन्त ७८ वर्षो से साधुत्व का पालन करने वाले महान योगी पुरुष आचार्य महाप्रज्ञ जी के विचार भी लोगो को पढने चाहीऐ तब साफ हो जाता है

जैन कोन ?

प्रस्तुत है आचार्य महाप्रज्ञ जी के विचार

(पुस्तक लोकतन्त्र - नया व्यक्ती नया समाज }

"ज जिस भूख खण्ड का नाम हिन्दुस्थान है, प्राचीन काल मे उसे भारत या भारतवर्ष कहा जाता था। ऋषभपुत्र भरत के नाम पर भारत नामकरण हुआ। पारस (वर्तमान ईरान्) आदि मध्य एशियाई देशो के सम्पर्क के कारण इसका नाम हिन्दु देश प्रचलित हुआ।आचार्य कालक ने कहा-" आओ ! हम हिन्दु देश चले-

एहि हिन्दुकदेशम वच्चामो। यह निशीथ चूर्णि का प्रयोग है। भारतीय साहित्यो के उलेखो मे यह सबसे प्राचीन है। पारसी सम्राट द्वारा महान(छठी शताब्दी ई,पू,) के अभिलेखो मे सिन्धु प्रदेशो के लिऐ हिन्दु शब्दो का प्रयोग मिलता है। जैसे राजस्थान आदि कुछ प्रदेशो मे "स" का उच्चारण ह" किया जाता है वैसे प्राचीन फारसी बोली मे भी "स" का उच्चारण "ह्" होता था। फारसी लोग "सप्तसिन्धु" का उच्चारण हप्तहिन्दु" कहते थे।

मुल प्रकृति के अनुशार हिन्दु शब्द देश या राष्ट्र का वाचक है। वह किसी धर्म का वाचक नही है।

भारत मे धर्म की दो धाराये प्रवाहित रही - श्रमणऔर वैदिक। श्रमण परम्परा का तन्त्र क्षत्रियो के हाथ था, वैदिक परम्परा का सुत्र धार ब्राहृमणो वर्ग था। साख्य, जैन, बोद्ध और आजिवक- ये सभी श्रमण परम्परा के धर्म है। मीमास, वेदान्त-ये वैदिक परम्परा के धर्म है। हिन्दु नाम का कोई भी प्राचीन धर्म नही है। मुसलमानो के आगमन के बाद हिन्दु और मुसलमान पक्ष और प्रतिपक्ष बन गये। प्राचीन काल मे श्रमण ब्राहृण पक्ष प्रतिपक्ष हुआ करते थे। इसका उल्लेख सस्कृत व्याकरणकारो ने उल्लेखित किया है। एक श्रमण ब्राहृण धर्म मे दिक्षित हो जाता है और एक ब्राहृण श्रमण धर्म मे दिक्षित हो जाता, उसे कोई जाति परिवर्तन नही होता।

क्या जैन हिन्दु है?

धुनिक युग मे धर्म का वर्गीकरण सनातन, वैष्णव, जैन्, बोद्ध,शैव,शाक्त, आदि रुपो मे रहा। हिन्दु धर्म कि व्याख्या वैदिक धर्म के रुप मे की गई, तब जैन, बोद्ध्,शैव्,सिख आदि उस धारा से भिन्न हो गऐ। हिन्दु शब्द अगर राष्ट्र और जातिवाचक रहे तो जैन, बोद्ध,आदि सभी हिन्दु शब्द के द्वारा वाच्य हो सकते है। किसी के सामने कोई उलझन नही होनी चाहिए। आचार्य श्री तुलसी ने एक बार कहा था हिन्दुस्थान मे रहने वाला प्रत्येक नागरिक हिन्दु है। धर्म और महजब कि दृष्टि से भले ही वह ईसाई हो, इस्लाम का अनुयायी हो,पारसी अथवा और कोई भीहो।

"हिन्दु धर्म"इस शब्द ने हिन्दुत्व को सकुचित बना दिया है।

आचार्य श्री तुलसी से पुना के कुछ पण्डितो ने पुछा-जैन हिन्दु है या नही? आचार्य श्री ने उत्तर मे कहा-" यदि आप हिन्दु का अर्थ वैदिक परम्परा का अनुयायी से करते है तो जैन हिन्दु नही है और यदि आप हिन्दु का अर्थ राष्ट्रीयता से है तो जैन हिन्दु है।"

आपका ३. सवाल www.jagathitkarni.org नामक॥॥॥॥॥।

रुपेश जी, ससार मे गलत और सही सभी जगहो पर मिलता है। हमारे बच्चे स्कुल जाते है रास्ते मे शराब कि दुकान भी होती होगी या और कोई गलत कार्य होता होगा। हमे हमारे बच्चो को बताना फर्ज है कि बेटा यह सही है, यह गलत है। यह उसके उपर निर्भर करता है कि वो क्या ग्रहण करता है अर्थात कुछ तो कहने से मानते है ओर कुछ भुगतने के बाद सुधर जाते है।

www.jagathitkarni.org के बारे मे चर्चा करना हमारा लक्ष्य नही। आपका आभार रुपेशजी, जहॉ तक हो सका मेने समाधान कि कोशिश कि अगर भुल चुक हुई हो तो क्षमा करे।

इण्डियन इन्टरनेशनल फैशन ज्वेलरी और एक्ससरी शो कि झलक

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IIfjs.com इण्डियन इन्टरनेशनल फैशन ज्वेलरी और एक्ससरी शो कि झलक

IIfjs.com इण्डियन इन्टरनेशनल फैशन ज्वेलरी और एक्ससरी शो २२ से २५ जनवरी २००९ को मुम्बई एग्जिबिशन सैन्ट्रर मुम्बई मे किया था। यह देश विदेश का एक मात्र फैशन ज्वेलरी और एक्ससरी का एग्जिबिशन है जो प्रति वर्ष मेरी कम्पनी रेडीयन्ट इवेन्टस द्वारा आयोजत होता है। इसमे दुनिया भर के व्यापारी भाग लेते है। देशी- विदेशी करीब ८४०० ट्रेडर एवम २५ हजार विजिटर इस मेले मे खरीदारी मे आते है तीन दिन मे कुल कारोबार करोडो डोलर मे पहुचता है। इसमे भाग लेने वाले मुख्य देश है भारत्, इटली, अफ्रिका, आस्ट्रेलिया, दुबाई, श्री लका, पाकिस्थान्, अफगानिस्थान्, भुटान्, शिगापु‍र सहित अन्य देश है।

कम्पनी के चेयरमेन श्री देवराज सेमलानी के अनुसार २०१० मे और भी अधिक विदेसी ग्राहको को भारत लाने के हमारे प्रयास रहेगे। और ३५% अधिक यानी २००० करोड का व्यापार होने का अनुमान है।

इस शो मे भाग लेने वाले भारतीय व्यापारियो के तो होसले बुलन्द है । उन्हे विदेशीयो से वर्ष भर तक का आर्डर मिल गया है जिससे वो व्यस्त हो गऐ है।

कोई भी आर्ट ज्वेलरी का काम करता है और इस मे भाग लेना चाहता है या एग्जिबिशन सैन्ट्रर मे अपना स्टॉल बुक कर अपना प्रोडेक्ट् को दुनिया भर मे बेचना चाहता है तो इस मेल Email abhishek@radiantevents.in के माध्यम से सम्पर्क कर सकता है।

महावीर सेमलानी

चाह गई, चिन्ता मिटी

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सुख और दुख दिनो प्रचलित शब्द है। सभी सुख चाहते है, दु:ख कोई नही चाहता । प्रत्येक प्राणी सुख से जीना चाहता है, उसे दुख अप्रिय है।

प्रशन उठता है किसे सुख माने किसे दुख ? झोपडी और फुटपाथो पर जिन्दगी जीने वाले अगर दुखी है तो क्या महलो मे रहने वाले सुखी है ? जिन्हे भरपेट भोजन, तन ढकने को वस्त्र एवम सिर छुपाने के लिए जगह नही है वे इन भोतिक साधनो की प्राप्ती के अभाव मे दु:खी है। दुसरी और जिनके पास महल, नोकर-चाकर, धन-दोलत सब कुछ है, वे भी सुखी नही है। उनके घर मे पकवान बनते है किन्तु वे डॉक्टर के आदेशानुसार सुखी रोटी,बिन चक्कर चाय,का ही सेवन कर पाते है। भोग की प्रचुर सामग्री होते हुऐ भी उनमे भोगने की क्षमता न होने के कारण वे दु:खी है। रात को नीनंद नही आती, दिन को चैन नही मिलता।

कल जिसके पास कुछ नही था उसे यदि आज सब कुछ मिल जाऐ तो क्या वह सुखी हो जाएगा ? मेरी समझ मे उसका दु:ख मिटने की अपेक्षा तृष्णा के कारण और बढेगा। लालसा का अन्त नही है और ईच्छाऐ आकास के समान अनन्त है। यह मिला वह चाहीऐ और फिर वह, फिर वह । इस "ओर" का कही अन्त मुझे दिखाई नही देता।

कभी कभी मै सोचता हू कि अभाव मे दुख है और अति मे भी दु:ख ! समभाव मे सुख है। सन्तोष और सयम के बिना सुख सम्भव नही है। सुख का अकन मन करता है। पदार्थ अथवा भोतिक सामग्री अपने आप मे सुख दुख का कारण नही है बल्कि उनके उनके साथ जुडा हमारा मन ही सुख-दुख का भ्रम महसुस करता है।

बात सुख दु:ख की नही, बल्कि सुख्-दुख महसूस करने की है। जिनका दृष्टिकोण निराशावादी बन गया है, जो मन को सयमित नही कर पाते, उनके पास सब होते हुऐ भी दुख है। इसके विपरीत जो आशावादी है सयमी है और तृष्णा पर अकुश लगाने मे समर्थ है उनके पास कुछ नही होते हुऐ भी सब कुछ है।

हम चिन्तन करे। आत्म चिन्तन सुख का कारंण बनता है। इसलिऐ कवि कि एक पक्ति याद आ रही है -

"चाह गई,चिन्ता मिटी।" जिसने इच्छाओ पर अकुँश कर लिया वह सुखी है।हर परिस्थिति मे वह प्रसन्न है। मन के चचंल घोडे पर लगाम लगाकर जो आत्मा मे स्थिर है वह सदा सुखी है। दुनिया जिसे दुख मानती है वह उसे भी सुख मे बदल लेता है।


आप अपने मनुष्य जीवन का यापन बडे ही सरलता एवम शुद्धता पुर्वक कैसे करे ? इसके लिऐ महापुरुषो को पढना समझना पडेगा। उनके जिवन से सीख लेनी चाहिए। कैसे और कहॉ से? तो बस यहॉ पर-" हे प्रभु यह तेरापन्थ पर आचार्य महाप्रज्ञ", को पढने के लिऐ क्लिक करे।