आओ रंग ले हम तन-मन

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आओ रंग ले हम तन-मन,
रंग-रंगीली होली के संग में.
भूल कर भूत की भूलो को,
मिल ले गले आज सभी संग में..
ऐसा जीवंत कोई पर्व नही,
दुनिया जहांन में.
धन्य मानो अपने जीवन को-
कि तुम पैदा हुए हिन्दुस्थान में ..
भूल भाषा, धर्म, जाती,-
क्षेत्र ओर समाज के सवाल को .
टूटे दिलो को जोड़ लो,
उठा लो अबीर ओर गुलाल को.
आओ चले मिलकर फिर,
उसी पुराने रंग ओर ढंग में.
हम एक थे, हम एक है,
आती है आवाज यही होली में.
प्रस्तुति -: प्रेमलता एम्. सेमलानी

बैंगलोर से मेरा पुराना नाता, गार्डन सिटी" कब "पत्थरो की नगरी बन गई!!

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इन्ह दिनों बाहर  रहने का अवसर मेरे लिए कुछ अधिक था! मित्र के घर के मोहरत के सिलसिले में मुझे बैंगलोर जाना पडा . मेरे मित्र, रिश्ते में मेरी बहिन के देवर है . "राजाजी-नगर" में मित्र ने तीन मंजिला बिल्डिग बनाई जो सुन्दर एवं योजनाबद्ध ढंग से बनाई गई है.  बैंगलोर का यह क्षेत्र (राजाजी नगर) सुहाना, सुन्दर एवं साफ़   सुथरा लगा. हां इस क्षेत्र के ब्रिज के निचे ट्राफिक  जाम से मार्केट आने-जाने में बहुत अधिक समय जरुर लग जाता है  !

वैसे बैंगलोर से मेरा पुराना नाता है. गली-गली घूम चुका हु. दस-पन्द्रहा सालो में  बैंगलोर में काफी कुछ बदलाव आया है. विकास भी हुआ है. बहुत बढ़  सा गया है. कई किलोमीटर दूर तक लोगो ने अपना बसेरा बसा लिया है.  कुछ वर्ष  पूर्व बसंतगुडी, जयनगर जो चिकपेट एवं शहर से मात्र ५-६ किलोमीटर दुरी   पर स्थित है लोग दूर बताते थे आज वो ही स्थान बैंगलोर के बीचोबिच में विद्यमान हो गया है. समय कितना तेजी से चला पता ही नहीं चला. "गार्डन सिटी" कब "पत्थरो की नगरी" बन गई, पता ही नहीं चला!.

ट्राफिक समस्या से अभी तक लोगो को निजात नहीं मिल पाई है. जबकि सरकार ने बहुत सारे नए ब्रिज बनाए है. कई रास्तो को "वन वे" कर दिया है. फिर भी ट्राफिक  समस्या "सुर्पनका" की तरह मुह फैलाए खड़ी है.

हां! एयर पोर्ट रोड को काफी आधुनिक बना दिया है. एयरपोर्ट से सिटी आने के लिए मैसूर बैंक तक "ऐ,सी बसों" की अच्छी सुविधा होने की वजह से रिक्शा-टेक्शी वालो की मनमानी पर लगाम जरुर लगा गई है.
रेलवे के हालत भी बुरे ही है - "कंट्रोमेंट से बैगलोर" पहुचने के लिए ट्रेँन को ४५ मिनट लगते है. जबकि मुश्किल से यह रास्ता मिनट का है. वैसे प्लेट -फॉर्म खाली ना होने का बहना  बनाकर रेलवे मंडल क्या साबित करना चाहती है ?  समझ के परे है. कई मायनों में बैंगलोर विश्व स्तरीय माना जा सकता है पर नागरिक सुविधाओं कि कमी के कारण समय की अपव्यता चिंता का कारण है. इनफ़ोसिस , विप्रो , एच सी एल  जैसी  बड़ी कम्पनियों के कारण लाखो जॉबकर्ता देश-विदेश से बैंगलोर में निर्वासित है. इन्ही लोगो  की भारी तादाद ने बैंगलोर में प्रोपर्टी की कीमतों में उछाल लाने में साहयता की है तो सरकारी खजाने को  टेक्स  से लाबाबब कर दिया है. पर रात को ११=३० बजे के बाद उन्हें राहगीरों को खाने पिने को होटले या सड़क पर खुमचे नहीं लगे मिलते है क्यों कि यहाँ का प्रशासन एवं पुलिस इसके लिए तैयार नहीं है. हां फाइव स्टार होटल  रात भर खुला मिलेगा. पर लोग रात को १२ बजे के बाद घरो से निकल कर टहलते नहीं है बैंगलोर में शायद पुलिस्या डर ? हां रात को कभी जोरदार भूख लगा जाए तो घबराए नहीं रेलवे स्टेशन चले जाए वंहा की "केंटिन" में देर रात  तक स्वादिष्ट भोजन मिल जाएगा. "एमजी रोड " पर घूमने एवं शापिंग करने का आनंद कुछ ओर ही है. मुझे तो "सुखसागर" की पाँव भाजी बड़ी ही लजीज लगी. वैसे यह मुंबई "सुखसागर" की ही ब्रांच है.

आज मुंबई पहुचा ! लगे हाथो "रघुलिला शापिग  मोंल" में पत्नी के साथ "माई नेम इज खान" देखने बैठ गया ! पिच्चर से एक सन्देश जरुर मिलता है -
" दुनिया में दो ही तरह के इन्शान होते है - एक अच्छा इसान, दूसरा बुरा इंसान."
हिन्दू, मुश्लिम, जैन, सिख, इसाई यह सभी तो इंसानों कि इंसानों के लिए बनाई हुई खाई ! कुल मिलाकर फिल्म एक सामाजिक सन्देश देने में सक्षम हुई. शाहरुख खान को एवं काजोल को बधाई. वैसे करण जोहर भी इसके हकदार है.
बालासाहेब का आभार की वो "माई नेम खान" पर प्रतिबन्ध नहीं लगाते तो मै इतना उत्सुक नहीं होता यह पिक्चर देखने के लिए नही जाता .
कल  मेरे ब्लोगर मित्र विवेक रहस्तोगीजी की शादी की सालगिरह थी. फोन  मिलाया शुभाकामानो के लिए तो वो मद्रास में थे. काफी लम्बी बात चली.   मैंने उन्हें एवं भाभीजी को शुभ-कामनाए प्रेषित की.
वन्दना गुप्ताजी की १५ फरवरी को शादी की सालगिरह थी. वंदनाजी की कविताओं का मै बड़ा फैन हु एक बार चैट पर बात हुई थी.   वंदनाजी को हार्दिक शुभ कामनाए ....
वैसे अरविन्द जी मिश्रा की भी कल १८ फरवरी को  शादी की   सालगिरह मनाई गई उन्हें भी मै प्रणाम करते हुए मंगल कामनाए प्रेषित करता हु.
कल सुबह मै फिर कही नई  यात्रा पर निकल चुका होउगा जब आप यह पोस्ट पड़ेगे. नमस्ते....

वेलेंटाइन डे हिंदी में बोले तो प्रेमियों का दिन

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किसी कारण वश यह पोस्ट मै कल १४ फरवरी को प्रसारित नही कर पाया। कारण कि मै उन्ह दिनो बैन्गलोर मै हू। यह पोस्ट आज प्रसारित कर रहा हू। क्ष मा करे।


प्रेम एक ऐसी संपदा है जिसे कोई चुरा नही सकता! कोई छिन नही सकता! जब भय पूरा छुट जाता तब प्रेम का उदय होता है. मगर तुम्हारा प्रेम नही छीना जा सकता. जीवन जीने के लिए तीन शब्दों का मूल मन्त्र है - "लिव-लव-लाफ "
-जियो,प्रेम करो और हंसो. जो व्यक्ति परम का आलिगन कर लेता है, उसके जीवन में हंसी के फुल खिलते है.आओ आज हम सभी जीवन का प्रेम से आलिगन करे.

१४ फरवरी यानी "वेलेंटाइन डे" हिंदी में बोले तो प्रेमियों का दिन.प्रेम सूफियो का मार्ग है.सूफी, परमात्मा को "प्रेयसी" के रूप देखता है.
परमात्मा एक प्रेमिका है. और भक्त उसका प्रेमी है. पुरुष का चित्त ज्ञान के आसपास घूमता है. स्त्री का समग्र भाव प्रेम के आसपास घूमता है. पुरुष अगर प्रेम भी करता है, तो उसका एक अंश ही प्रेमी बन पाता है. स्त्री जब भी प्रेम करती है,तो उसका समग्र ह्रदय प्रेम बन जाता है.

प्रेम हो जाना निःसंदेह एक सुखद अनुभूति है। लेकिन वो सिर्फ दैहिक आकर्षण नहीं बल्कि एक दूसरे के सुख-दुःख का साझा निर्वहन है। प्रेम की परिणिति जब विवाह की वेदी तक जाती है तो दोनों की जिम्मेदारी है इसे सफल बनाना।

बुद्धिमानो को प्रेमी पागल जैसा मालुम पड़ता है.और है भी! प्रेम बुद्धि से नही "ह्रदय" से किया जाता है. और ह्रदय के पास कोई तर्क तो है ही नहीं, सिर्फ भाव है और भाव अंधा है. प्रेम की इन्ही कमियों की वजह से अहंकार पिघलता है. प्रेम की आग में अंहकार पूरी तरह जल कर ख़ाक हो जाता है. प्रेमी अपने आपको मिटाकर दुसरे को बचा लेता है. जिस दिन एक बच जाता है, उसी दिन सत्य उपलब्ध हो जाता है.

कुछ अप्रेमी (पर्दे के बाहर) , "वेलेंटाइन डे" को असभ्यता का घोतक एवं भारतीय संस्कृति के लिए विनाशकारी मानते है. किन्तु में उनके तर्को से सहमत नही हु. मेरा मानना है की प्रेंम दया नही कर सकता. क्रोध भले ही करे. दया तो तभी होती है, जब प्रेम "तिरोहित" हो जाता है. दया तो राख है. जब प्रेम जल चुका होता है, तब राख बचती है. जिसे तुम्ह प्रेम करते हो, उसे कुरूप अवस्था में भी प्रेंम कर पाओगे,तभी जीवन सफल है प्रेम सफल है.

इससे सर्जनात्मक शक्ति दुनिया में कोई नही है.प्रेम अम्रत है. जिसका ह्रदय प्रेम में बचा है,उसे प्रेम देना अच्छा लगता है. हमारे जीवन में यह ख़ुशी और आनंद की घटना जैसा बन जाती है. प्रेम सदा बिना शर्त का होता है. जंहा शर्त है,वहा सोदा है. प्रेम जितना गहरा जाता है, इस जगत में कोई और चीज इतनी गहरी नही जा सकती कोई व्यक्ति आपकी छाती में छुरा भोंके वंह इतना गहरा नही जाएगा जितना उसका प्यार- प्रेम आपके भीतर गहरा जाएगा...

सुश्री प्रेमलता एम्.सेमलानी को जन्म दिन के दिन "हेपी बर्थ डे" आज का दिन (१४ फरवरी) मेरे लिए आप सभी से कुछ ज्यादा ही "प्रेममय" है. आज
"वेलेंटाइन डे" यानी "प्रेम का दिन" और आज ही के दिन मेरी जीवन संगनी,साथी- "प्रेम", का "बर्थ डे" भी है. क्यों भाइयो....बहिनों.... है ना डबल आफर मेरे लिए ? तो आज के दिन इस डबल ख़ुशी के शुभअवसर पर मै मेरी जीवन साथी सुश्री प्रेमलता एम्.सेमलानी को जन्म दिन के दिन "हेपी बर्थ डे" बोलते हुए उन्हें जन्म दिन की मंगल कामानाए प्रेषित कर रहा हु. और "वेलेंटाइन डे के अवसर पर अपने प्रेंम का एक बार फिर से गुलाब के फुल से इजहार करता हु.

आपको याद होगा ... प्रेमलता एम् सेमलानी ने "ताऊ डोट इन" की साप्ताहिक पत्रिका में "नारी-लोक" कोलम के माध्यम से खाना खजाना की बाते लिखा करती थी.
आप सभी को भी "हेपी वेलेंटाइन डे"

मूल्य-परम्परा-संस्कार-प्रतिष्टा-कुल परम्परा

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मैंने इंशानी जीवन के कई पहलुओ को एक ही घटना मे तोलने का प्रयास किया. करीब से एक बाप बेटे के कई उलझनों को मैने समाज परिवार ओर व्यक्ति के वैज्ञानिक तथ्यों के करीब महसूस किया. शायद जीवन का यह फलसफा हमारे समझ में आ जाए तो आपसी कलह मनमुटाव परिवारिक चिंताए दूर हो सकती है.


किसी के चेतन मन तथा अवचेतन मन में भयंकर संघर्ष छिड़ा हुआ था. चेतन मन उसे लडकी की ओर खींच रहा था तथा अवचेतन मन अपनी कुल परम्परा की ओर .उसकी मनो दशा इतनी मोहग्रस्त हो गई थी कि उसे ना तो दूकान पर शान्ति मिलती न ही घर पर.

मूल्य-: मूल्य तो हमेशा ही सापेक्ष होते है. एक समय में जिस चीज का जो मूल्य होता है ,दुसरे समय में उसका इतना मूल्य नही होता है. एक व्यक्ति के लिए जिस चीज का मूल्य होता है दुसरे के लिए नही भी होता है!

परम्परा -: हमक कुलीन परम्परा को वहन कर रहे है. हम एक परिवार की सीमा में भी आबद्ध है. इस द्रष्टि से तुम्हारा निर्णय मुझे ओर मेरा निर्णय तुम्हे प्रभावित करता ही है.

संस्कार-: संस्कारों पर किसी वर्ग विशेष का अधिकार नही हो सकता! एक धनी ओर उच्च कुल में पैदा होने वाले व्यक्ति के संस्कार भी खोटे हो सकते है ओर एक गरीब तथा नीच माने जाने वाले कुल में पैदा होने वाले व्यक्ति के संस्कार भी अच्छे हो सकते है.

प्रतिष्टा -: मै यही सोच रहा हु कि परिवार की प्रतिष्ठा तथा व्यक्ति की प्रतिष्ठा में दुसरे शब्द में समाज की प्रतिष्ठा ओर व्यक्ति की प्रतिष्ठा में कोन ज्यादा मूल्यवान है ?
शायद समाज व्यक्ति की रक्षा करता है व्यक्ति को समाज की सुरक्षा रक्षा करनी चाहिए.दोनों मिलकर ही एक सुव्यवस्था को उजागर करते है.

क्षणिक -: शादी कोई ऐसा क्षणिक देह बंधन नही है जिसे व्यक्ति हडबडी में जोड़ ले .बल्कि यह तो एक ऐसा आत्मीय सम्बन्ध है जिसे बहुत सोच समझकर निर्धारित करना पड़ता है.

समाज सरचना का यह गहरा एवं गुढ़ रहस्य वैज्ञानिक आधार लिए हुए प्रतीत होता है.आजकल लव मैरिज आम बात हो गई है. हरेक समाज में यह प्रचलन चल पड़ा है. ऐसे में युवाजन जाती, धर्म, गोत्र, का पलायन कर अपने सुखी वैवाहिक जीवन क़ी अपेक्षा करते है. कुछ रिश्ते कामीयाबी के शिखर पर चढ़ भी जाते है कुछ रिस्तो में विराम सा आजाता है. घर परिवार एवं समाज के बनाए नियमो को हमारी भलाई एवं रक्षा हेतु बनाए गए थे पर आजकल धडल्ले से युवाजन उक्त नियमो को तोड़ मरोड़ रहे है. कारण बताते है-" हम शिक्षित है, २१वी शदी में रहते है, ओर हम हमारा भला बुरा समझते है." यह तर्क ही सही नही है ! जन्मदाता विवश है सामाजिक परम्पराओं क़ी अहवेलनाओ को देखने के लिए ...युवाजनो द्वारा ऐसी बातो को किसी दकियानूसी विचारों का वास्ता देना यह उनकी भूल साबित होने जैसा है.

अंत में एक पक्ति में अपनी बात खत्म करना चाहता हु
"सुधरे व्यक्ति, समाज व्यक्ति से,
राष्ट्र्य स्वयम सुधरेगा !!"

मुंबई मेरे ताऊ की

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यह सवाल ही बेकार है की मुंबई किसकी है ?  दुनिया में कैलफोर्निया से लेकर कालाहांडी तक ओर मुंबई से लेकर म्यूनिख तक हजारो ऐसी जगह है जिनका एक नाम है. और जंहा इंसानों की छोटी मोती आबादी बसती है.

यह सवाल आपके मन में भी होगा जैसा अब तक सब गलत फहमी के शिकार थे की मुंबई हम सब की किन्तु अफ़सोस हमारी सोच बेकार निकली. ऐसा सवाल हर जगह तो नहीं उठ रहा है.  यह सभी  जानते है की कोनसा गाव या शहर किसका है और किसका उस पर कितना अधिकार है. इसलिए मुद्दा यह है की यह सवाल कोंन उठा रहा है ?  जब यह सवाल एक बच्चे से पूछा गया की मुंबई किसकी तो उसने तपाक से कहा -" मेरे ताऊ की है मुंबई."

मुबई सिर्फ ओर सिर्फ मराठियों की है. यह बात कई मर्तबा दशको पूर्व से राग-अलापा जा रहा है. चव्हाण साहब यहा के मुख्यमत्री थे तब राजस्थानियों को बोम्बे छोड़ राजस्थान जाने की चेतावनी मिली थी. तब  राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री स्व. मोहनराज सुखाडिया महाराष्ट्र के राज्यपाल थे, श्रीमती  इंदरा गांघी के बिचबचाव से मामला शांत हुआ. अब ठाकरे  परिवार के सदस्य उसी बात को दोहरा रहे है.  यदि वो ऐसा कह रहे है की मुंबई महाराष्ट्रवालो की है तो मुंबई उन्हें दे देनी चाहिए. यह लेंन  देंन जवाबी ही होना चाहिए. कानूनी तोर पर यह हो नहीं सकता. अगर पिछले चुनाव में उन्हें सीटे ज्यादा मिली होती तो  सरकार भी दे दी जाती.

ओर यूपी-बिहार वासियों के प्रति वो ही  जहर उगला जा रहा है.  ठाकरे परिवार के सदस्य, अमिताभ,सचिन तेंदुलकर, मुकेश अम्बानी, शाहरुख खान पर इसलिए दहाड़ते  है की ये लोग मुबई को भारत का हिस्सा बताते है ओर कहते है की मुंबई आम भारतीयों की है. किसी एक जाती, भाषा रंग, में उसे नहीं बाटा जा सकता है. मुंबई पर ही नहीं पुरे देश के कोने-कोने पर भारत के आम नागरिक का बराबर का हिस्सा है. पर शिव-सेना, मनसे के नेता  मराठियों की हमदर्दी पाने की राजनीति के माध्यम से अपना अपना वोट बैंक तैयार करने में लगे हुए है. लगे हाथो राहुल बाबा भी बहती गंगा में (राजनीतिक कुंड) में हाथ घोने बैठ गए, ओर बिहारियों की हम दर्दी लुटने की फिराक में देश में प्रांतवाद की हवा को फुकने का काम किया है.  यह कैसी राजनीति ? मानवता ओर मानवीय भावनाओं का यह कैसा बलात्कार  ?  यह कैसा प्रातंवाद ?

रतन टाटा के उस कठोर निर्णायक फैसले से सभी प्रवासियों को एक सबक लेना  चाहिए जब शिन्गुर (कोलकत्ता) में नैनो के प्रोजेक्ट को लेकर गन्दी राजनीति शुरू हुई तो रतन टाटा ने करोडो की सम्पति को तिलांजलि देकर वहा से हट गए  तब केंद्र सरकार एवं राज्य सरकार की पेंट गीली हो गई. क्यों ना आत्मसमान से जिया जाए ? क्यों ना रतन टाटा के निर्णय को मुंबई में रहने वाले अप्रवासी सामूहिक रूप से फ़ॉलो करे ? करना चाहिए  तभी नानी याद आएगी ? यह राजनीतिज्ञो के लिए महत्वपूर्ण सवाल है वरना यह  बेकार बहस से ज्यादा कुछ नही है.
जय हिंद जय महाराष्ट्रा