मुंबई मेरे ताऊ की

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यह सवाल ही बेकार है की मुंबई किसकी है ?  दुनिया में कैलफोर्निया से लेकर कालाहांडी तक ओर मुंबई से लेकर म्यूनिख तक हजारो ऐसी जगह है जिनका एक नाम है. और जंहा इंसानों की छोटी मोती आबादी बसती है.

यह सवाल आपके मन में भी होगा जैसा अब तक सब गलत फहमी के शिकार थे की मुंबई हम सब की किन्तु अफ़सोस हमारी सोच बेकार निकली. ऐसा सवाल हर जगह तो नहीं उठ रहा है.  यह सभी  जानते है की कोनसा गाव या शहर किसका है और किसका उस पर कितना अधिकार है. इसलिए मुद्दा यह है की यह सवाल कोंन उठा रहा है ?  जब यह सवाल एक बच्चे से पूछा गया की मुंबई किसकी तो उसने तपाक से कहा -" मेरे ताऊ की है मुंबई."

मुबई सिर्फ ओर सिर्फ मराठियों की है. यह बात कई मर्तबा दशको पूर्व से राग-अलापा जा रहा है. चव्हाण साहब यहा के मुख्यमत्री थे तब राजस्थानियों को बोम्बे छोड़ राजस्थान जाने की चेतावनी मिली थी. तब  राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री स्व. मोहनराज सुखाडिया महाराष्ट्र के राज्यपाल थे, श्रीमती  इंदरा गांघी के बिचबचाव से मामला शांत हुआ. अब ठाकरे  परिवार के सदस्य उसी बात को दोहरा रहे है.  यदि वो ऐसा कह रहे है की मुंबई महाराष्ट्रवालो की है तो मुंबई उन्हें दे देनी चाहिए. यह लेंन  देंन जवाबी ही होना चाहिए. कानूनी तोर पर यह हो नहीं सकता. अगर पिछले चुनाव में उन्हें सीटे ज्यादा मिली होती तो  सरकार भी दे दी जाती.

ओर यूपी-बिहार वासियों के प्रति वो ही  जहर उगला जा रहा है.  ठाकरे परिवार के सदस्य, अमिताभ,सचिन तेंदुलकर, मुकेश अम्बानी, शाहरुख खान पर इसलिए दहाड़ते  है की ये लोग मुबई को भारत का हिस्सा बताते है ओर कहते है की मुंबई आम भारतीयों की है. किसी एक जाती, भाषा रंग, में उसे नहीं बाटा जा सकता है. मुंबई पर ही नहीं पुरे देश के कोने-कोने पर भारत के आम नागरिक का बराबर का हिस्सा है. पर शिव-सेना, मनसे के नेता  मराठियों की हमदर्दी पाने की राजनीति के माध्यम से अपना अपना वोट बैंक तैयार करने में लगे हुए है. लगे हाथो राहुल बाबा भी बहती गंगा में (राजनीतिक कुंड) में हाथ घोने बैठ गए, ओर बिहारियों की हम दर्दी लुटने की फिराक में देश में प्रांतवाद की हवा को फुकने का काम किया है.  यह कैसी राजनीति ? मानवता ओर मानवीय भावनाओं का यह कैसा बलात्कार  ?  यह कैसा प्रातंवाद ?

रतन टाटा के उस कठोर निर्णायक फैसले से सभी प्रवासियों को एक सबक लेना  चाहिए जब शिन्गुर (कोलकत्ता) में नैनो के प्रोजेक्ट को लेकर गन्दी राजनीति शुरू हुई तो रतन टाटा ने करोडो की सम्पति को तिलांजलि देकर वहा से हट गए  तब केंद्र सरकार एवं राज्य सरकार की पेंट गीली हो गई. क्यों ना आत्मसमान से जिया जाए ? क्यों ना रतन टाटा के निर्णय को मुंबई में रहने वाले अप्रवासी सामूहिक रूप से फ़ॉलो करे ? करना चाहिए  तभी नानी याद आएगी ? यह राजनीतिज्ञो के लिए महत्वपूर्ण सवाल है वरना यह  बेकार बहस से ज्यादा कुछ नही है.
जय हिंद जय महाराष्ट्रा

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ताऊ रामपुरिया 4 फ़रवरी 2010 को 1:22 pm

सही कहा आपने . अगर मुंबई ताऊ की है तब तो कोई समस्या ही नही है. ताऊ की यानि सबकी.

रामराम.

संजय बेंगाणी 4 फ़रवरी 2010 को 1:44 pm

अगर मुम्बई छोड़ने की बात है तो कौन तैयार होगा? कोई नहीं. क्या दुसरी जगहों पर रहने वाले मराठी वापस महाराष्ट्र लौटेंगे?

दिगम्बर नासवा 4 फ़रवरी 2010 को 6:05 pm

ऐसा नही हो सकता इन सब की बातों को मीडीया वाले दिखाए ही नही ............ पर वो भी तो बिके हुवे हैं .....

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 4 फ़रवरी 2010 को 9:38 pm

ताऊ और भतीजे का दुराग्रह ज्यादा नही चलेगा!

Udan Tashtari 5 फ़रवरी 2010 को 7:54 am

अब ताऊ का लट्ठ काम करेगा.