ऐसी माँ ओ को मै कुख्यात कहू तो आपको इतराज है कै ?

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"वक्त से पहले फिसलता बच्च्पन..  अगर गुलाब क़ी अधखिली कली को जबरदस्ती खिलाया जाएगा तो वह फुल बनने से पहले ही अपना  वास्तविक प्राक्रतिक रूप खो देगी. यही हाल आधुनिक माँ बाप क़ी फिंजा में सांस ले रहे उन बच्चो का है जो समय से पहले ही प्रोढ़ बनने क़ी चाह में उनका बच्चपन क़ी मासूमियत को कुर्बान कर रहे है."

 माता पिता "स्टारबॉय"  ओर "सुपर गर्ल" की फोज तैयार करने के प्रयास में बच्चो पर अपनी महत्वाकांक्षाओ को थोप रहे है ओर इसके लिए उनकी जमकर आलोचना होनी ही चाहिए!

मिसाल के तोर पर  "वाक्सवैगन" विज्ञापन को लिजिए जिसमे एक  बच्चा  डराने की हद तक हत्यारा स्वभाव दिखाता है ! "मैक्स न्यूयार्क लाइफ" विज्ञापन में बच्चे के अव्वल आने का श्रेय लेने के लिए माता पिता झगड़ते दिखते है, " रचना" के विज्ञापन में लडकी बैटरी से चलने वाले भालू ओर मिख ममी से जूझती दिखती है .  इसके अलावा बॉक्स ऑफिस पर धूम मचाने वाली "वेक अप सिड" ओर "३, इडियट्स" जैसी फिल्मो को ले जिसमे माता-पिता की छवि अच्छी नही दिखाई गई है ! वे या तो अपने बच्चो की संवेदनाओ को नजर अंदाज कर रहे है या फिर जान बुझकर दबा रहे है .
इसका सबसे अतिवादी रूप मैंने टेलीविजन के पर्दे पर देखा, जहा किसी रियलटी शो में कोई बच्चा वयस्कों की तरह डांस करने के लिए अपने शरीर को नियंत्रित करता है या फिर किसी धारावाहिक की टी आर प़ी बढाने के लिए ज्यादती की जाती है. कभी परिवार के लिए निर्विवाद आदर्श , परिवार की खातिर सब कुछ त्याग देनी वाली माँ ओर गर्वीले पापा अब पहले की तरह परहितवादी नही रहे , अब वे अपने बच्चो की नजरो में खलनायक बन रहे है. आज उन्हें जिस तरह पेश किया जा रहा जैसे वे अपने बच्चो के दुश्मन हो गए है. ओर अपनी महत्वाकांक्षा ओ को पूरा करने के लिए अपनी संतानों पर जुल्म ढ़ा रहे है!

८ वर्षीय सलोनी देनी को लिजिए, जो कोमेडी शो "छोटे मिया" की सबसे कम उम्र की प्रतियोगी है. सलोनी को शो बिजनेस में उसकी ३७ वर्षीय माँ संयोगिता ने ४ वर्ष की उम्र में अपनी बेटी का पोर्टफोलियो तैयार कराया, ओर एक विज्ञापन फिल्म में काम करवाया था. "देनी परिवार" के लिए कोल्हापुर से मुंबई में जा बसने के लिए इतना प्रलोभन काफी था! आपकी जानकारी के लिए बता देता हु कि यह चाइल्ड स्टार प्रति दिन ३००० से ५००० कमाती है . दुसरे लोकप्रिय बाल कलाकार(बाल  मजदूर ) हर रोज १० से १५ हजार कमा लेते है.
 आजके माँ बाप अपने बच्चो को इस तरह मुकम्मल इंसान का प्रतीक बनाना चाहता है ?
वे चाहते है कि उनका बच्चा रातोरात स्टार बन जाए ओर छोटी सी उम्र में ही नाम के साथ पैसा भी भी कमाए भले ही इससे उनका सामन्य बच्चपन प्रभावित होता हो.
वे उनके भविष्य की खातिर उनके वर्तमान को सिरे से भुलाने में कुछ भी गलत नही मानती है.
 
मसलन, दिल्ली की २७ वर्षीय शिल्पा बुद्धराजा ने रियलटी शो "पति पत्नी ओर वो" के लिए अपने एक वर्षीय बेटे ज्यादित्या को राखी सावंत को सोप दिया. राखी व् इलीश परुजान्वाला को सोप जाने के बाद जयादित्य दो घंटे तक रोता रहा, उनसे पूछेए की क्या आपने कभी अपने बेटे को शो से हटाने के बारे में सोचा था तो चट से जबाब मिला-" नही! मैंने उसे कुछ समय दिया !" वहा माँ तुझे सलाम !!! कैसी व्यापारिन माँ है ?  यह सभी बाते यह दर्शाती है की माँ बाप किस कदर  सवेदनहीन  होकर कच्ची उम्र में ही उनसे भारी अपेक्षाए रखने लगे है!
 ऐसी माँ ओ को मै कुख्यात  कहू तो आपको इतराज है  कै ?     

कई बार रियलटी शो में जजों क़ी आलोचनाओं एवं गेम शो से बाहर होने का  डर इस कदर बच्चो को मानसिक रूप से प्रताड़ित करता है की उनकी अविकसित शारीरिक मानसिक स्थति डावाडोल हो जाती है! अवसादग्रस्त हो जाते है ये बच्चे!  ऐसी घटनाओं से यह प्रमाणित होता है की माँ बाप किस तरह अपने बच्चो के साथ ज्यादती कर रहे है , वे शायद इस बात पर ध्यान नही देते है की उनके बच्चे पर इस तरह क़ी अपेक्षाओं से कितना दबाव पड़ता है .... हम सभी का दायित्व है क़ी हम अपने बच्चो का बचपन चंद रुपयों के टुकडो क़ी लालसा में ना खोने दे ! एवं ऐसी महत्वकांक्षी माताओं को सरे आम टोकना चाहिए !!!

हर दुसरे दिन हिलाते रहना...

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घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूं कर लें। 
किसी रोते हुये बच्चे को हंसाया जाए॥
(बच्चा यानी पाठक, हमारे संदर्भ में तो... हर उम्र का।) 


"सूरज भाई" (सूर्य)  मै तेरी गर्मी से परेशान नही हु.  मै परेशान हु तेरे नाम से पड़ने वाली छुटियो से. क्यों की हर साल तेरे नाम से पड़ने वाली "ग्रीष्म-अवकास" मे पत्नियों का मायके जाना हम पतियों के लिए परेशानी का सबब बन जाता है !  

गर्मियों में कोन पति  काम करता है - कोन नही ? यह समझना जरा मुश्किल हो रहा है . क्यों  की "पसीना" 
मेहनत की निशानी है तेरी इस तपस भरे स्वभाव से यह पता लगाना मुश्किल है की आरामी से आरामी पति  पसीने से नहाया  हुआ लगता है! पति  के  माथे पर पसीने की बुँदे चमक रही होती है  - समझो खदानों में पत्थर तोड़ आए हो बेचारा ! पति तरस रहे है पत्नी के लिए कि वो कब आए और कब छुटकारा  मिले चूल्हे-चोके से..

गर्मी वास्तव में व्याम का मोसम है. जब पत्नी और बच्चे  ननिहाल चले जाते है तो पति सुबह सवेरे आम और दूध पी कर दंड बैठक लगाता है.- बेचारा और करे भी क्या ? यह गर्मी की सीजन है.  खिचड़ी नही तो आलू की सब्जी बनाने की असफल प्रयास करता है. कुछ नही तो "मैगी" बनाकर जरुर खा लेता है बेचारा पति ...
 

इसका मतलब यह हुआ की गर्मी इंसान  को विद्धवान और अच्छा कुक बनने का अवसर प्रदान करता है.  जवानी के समय की यादे ताजा होती है, पति एक बार फिर "यूथ होस्टल"  का मजा लेते है . आसपास के होटल वाले जो साल भर मुस्कान देते थे उन्हें, अब  ये (पति) और बड़ी मुस्कान देने लगते है.  जब इनसे आमलेट नही बनती तो पहली बार "एलबर्ट एनस्टाईन"  को मानते है . हम आमलेट नही बना सकते है - और उसने अणुबम बना दिया.  थोड़ी हीन भावना उभरती है. पर पत्नी न होने के कारण अपने को पूरा पुरुष समझने की पुरानी आदत इन जख्मो पर मरहम का काम करती है. 

पतियों के पीछे पत्नी सदा भूत की तरह रहती है . वे अपने पीहर जाने के पूर्व आचार भी चार -पांच किस्म के डालकर जाती है और बेचारे पति को कहकर जाती है- " हर दुसरे दिन हिलाते रहना - हाथ मत लगाना ." बेचारा!! पत्नी के जाने के बाद हिलाने के सिवाय क्या रास्ता है ....? अचार को हिलाते -हिलाते  बेचारे की एक महीने में तो खुद ही हिल जाता है.
 

पीहर से पत्नी दिन भर मोबाइल द्वारा अपने पति को सचालित करती रहती है - "देखो, वो अचार के डिब्बे के उपर स्टील के डिब्बे मे नमकीन रखी हुए है भूख लगे तो खा लेना ", नास्ता कर लिया ? अब कहा पर हो ? तुम्हारे पीछे गानों की आवाज आ रही है ?  इस तरह के हजारो सवालों से बेचारा पति का तो "गर्मी  की छुटियो" के नाम पर शोषण हो रहा है!
जवानी की ढलान भी इसी मोसम में महसूस होती है.  जब पत्नी की अनुउपस्थिति मे सब्जीवाली से रोज सब्जी लेने पर भी कोई काम नही बैठता तो जवान बनने के लिए मेहँदी लगाते है . लोगो के पूछने पर मेहँदी क्यों लगाई ?  तो बेचारे कहते है -"ठंडक  भाई , ठण्डक!!!  के लिए! अब इस पगलाए पति को कोण समझाए की मेहँदी लगाने से ठंडक  मिलती हो तो पंजाब के सभी लोगो को मेहँदी लगा दे! पर इंसान अपनी कमियों को सदा खासीयतो का रूप देता रहा है!

गर्मी को अलविदा कहने का ज्यो ज्यो समय नजदीक आ रहा है सूरज का गुस्सा ठंडा होता जाता है. पतियों का भी ... पर इस बार तो बाप रे बाप छपर फाड़ के गर्मी पड़ी . मानो सूरज भंयकर कोप में है. ४८ से ४९ डिग्री  तापमान तवे पर  रोटी सेकने जैसा है! गुस्सैया सूरज बिगडेल हाथी की भाति लोगो में त्राहिमाम-त्राहिमाम, जैसा माहोल बना रखा है. लोग तरस रहे  है पानी की एक बूंद के लिए , बरसात की एक फुहार के लिए , पेड़ की ठंडी पवन के लिए , एक छोटी सी छाव के लिए ! हे सूरज ! अपने इस गुस्से को और अधिक लाल पिला मत करना नही तो घरती पर तुम्हे जल चढाने  वाला कोई नही बचेगा ! और पतियों को खाना देने वाली भी .....
बेचारे पति......................!!!! 


यही हास-परिहास, कहीं  उपहास न बन जाए, यह एक व्यंग्यकार की बड़ी जिम्मेदारी होती है। ध्यान न दिया जाए तो  आक्रामक या बेहद करुण या कठोर  होते हुए भी इसे देर नहीं लगती ...  कभी-न-कभी  कुछ पढ़ते-लिखते, आम जिन्दगी से जीते- गुजरते हम सभी ने यह महसूस  किया ही होगा...?
प्रतिक्रिया देना मत भूलिएगा। सदैव की भांति ही,  पत्र और प्रतिक्रियाओं का...  आपके स्नेह,सहयोग व सुझाव का, बेसब्री से इन्तजार रहता है!
- मुंबई टाइगर

पांडेजी ! मै ठीक ठाक व्यख्यान कर रहा हु ना रेलवे का !!!

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 रेल हमारे देश का दर्पण है. जिस तरह में रेल में बैठने की जगह नही मिलती है, ठीक उसी तर्ज पर हिन्दुस्थान की सरजमी पर रहने को घर नही मिलता है. शायद हम रेलों की इस भीड़ में शामिल होकर अपने अस्तित्व को ही खो दिया है.
 

रेल गाडी  में हर आदमी एक दुसरे पर अविश्वास करता दिखता है.समान चोर भी मन ही मन में शंका करता है. 

फैंसी ड्रेस की तरह नाईट सूट का कम्पीटेंशन  भी ट्रेनों में खूब दिखने को मिलता है. लुंगी-पजामा अब तो 
थ्रीफ़ोर्त, जांगिया, या बरमुडा वगैहरा .....वगैहरा, बेचारी  नाईट सूट भी शर्मा जाती होगी क्यों की --  सब कुछ दिखता है उसमे .....बस जो नही दिखता है- वो है लाज,शर्म और हया...!!!

कम्पीटेंशन  से याद आया "कम्पटीटिव" माइंडेड" आज की कला एवं फैशन है. हर एक अपनी मोनोपली में रहना चाहता है . यात्रीयो के विभिन्न प्रकारों के खर्राटे, रेल चलाने में बड़े मददगार होते है ऐसा हमारे ब्लॉग गुरु एवं रेलवे के ताने-बाने  से वाफिक रेलवे के वरिष्ठ अफसर ज्ञानदतजी पांडे  का भी मानना है. खर्राटो की  आवाज सुनकर इंजन  के कान खड़े हो जाते है और पहियों में तेजी आ जाती है  और दोनों मिश्रित ध्वनी एक नया ही अलाप पैदा करती.  यात्रियों को रात में जगाए रखने के लिए एवं चोरो से बचाव का रेलवे का कुदरती खर्राटे एक  यंत्र बन पड़ा!


 रेल में जगह मिलने पर बड़ा प्रेम जग जाता है जैसे कुदरत की फितरत में हजरत नजर आती है. यदि कोई मार्डन माडल सामने की सीट पर बैठी होती है तो शराफत की मिसाले पेश करते थकते नही है, और अत्ते-पत्तो का अदान-प्रदान करते है, आने के न्योता दे डालते है. जबकि सच तो यह है की न उसे जाना है और न बुलाने वाले के भाव होते है, बस! केवल ओपचारिकता !

बेचारे रेल यात्री करे भी तो क्या ? मांगने वालो की ऊँची चढ़ी हुयी भोंये और हावभाव देखकर अच्छे-अच्छे अभिनेता भी बोने लगते !
 वे गाना अपनी ओरिजनल आवाज में गाकर लोक संगीत में नये प्राण फुकने का आभास करा जाते है! 

छोटे छोटे बच्चे, नंगे तन से पर  स्वच्छ दिल से अपने शर्ट से रेल के डिब्बो में झाड़ू लगाकर रेलवे की काफी हद तक स्वचछाता बनाये रखने में मदद करते है !पांडेजी ! मै ठीक ठाक व्यख्यान कर रहा हु ना रेलवे का !!!
 
रेल एक प्रकार का  मन्दिर है . यहा पर हर यात्री के मन में  श्रद्दा जागती है! रेल से नदी में अथवा समुन्द्र में सिक्के फेकना कोई नयीं बात नही है!  ये इसका ज्वलंत उदाहरण  है की नदी या समुन्द्र आने पर वे (यात्री) भी कुबेर की तरह अपने सिक्को के खजाने को खोल देते है , जब सिक्का ठीक नदी में गिरता है तो आनंद का अनुभव होता है, और जब नही गिरता है तो आसपास के मुसाफिरों को पत्ता नही चला होगा यह सोचना शुरू कर देता है बेचारा मुसाफिर !!! मेरा ताऊ कहता है -" हमारे जमाने में सिक्के ठीक जगह गिरते थे,"  अब ताऊ, तुम्हे कोण समझाये ?  तुम्हारे जमाने में सिक्क्के वजनदार होते थे अब हल्के फुल्के एलिमिन्युम की तरह हवा का रुख देख कर दूसरी तरफ उड़ जाते है. जिसका सिक्का नदी में गिर जाता है वह गंगामाई की जय जयकार अवश्य करता है पर जिसका सिक्का ठीक पानी में नही गिरता है वह खंखार कर उसे कोरस जरुर देता है! मानो सिक्के उछालने के विश्व कप से बाहर हो गया हो! इसे यात्रियों को  रेलवेवाले भी अपना  हारा हुआ खिलाड़ी समझते है. पर बेचारे, रेलवे के भोलेभक्त यात्री यह भूल जाते है की आजकल मछली पकड़ने के अलावा सिक्के पकड़ने के जाल भी होते है.


स्टेशन पर रुकना रेल की बड़ी पुरानी आदत है . पर जब रेल रूकती है तो सोये यात्रियों को जाग जाने की आदत है ! जब उपर की बर्थ से निचे उतरते है तो यू लगता है जैसे बेकाबू जंगली घोड़े पर से उतर रहे हो! 

यात्रा में "कंहा उतरना है ?" यह सबका फेवरेट सवाल होता है.  सुबह-सुबह बाथरूम के बाहर लगी लम्बी कतार रेल यात्री को यह आभास दिलाता है की  उसने केवल रेल में  सीट का आरक्षण करवाया  है बाथरूम की सीट  का नही .......
रेल की यात्रा करना कोई आसान काम नही है . इसी कारण सुखद एवं मंगलमय  यात्रा की  कामना रेल विभाग बार बार खुद ही करती है.
 

हवा पसंद लोग दरवाजे का सहारा लेते है और "ममता - लालू" उनका विषय होता है . वहा पर जी भी खूब लगता है . क्यों की टायलेट भी वही पास में होता है.
 

जिस तरह घोड़ा गाडी, घोड़े के बिना अघुरी है ठीक उसी तरह रेल भी ताश और घर के आचारों की सुगंध के बिना अधूरी है. 
ठेलेवाले  भी बड़े कलाकर होते है वह भी रेल का ऐसे इन्तजार करते है जैसे ममताबेन (रेलमंत्री) स्वय उनके ठेले की पानीदार चाय पीने या चार पाच घंटे पूर्व बनाई आलू सब्जी  एवं पूरी को फिर से घटिया तेल में गर्म कर खाने वाली हो !
 

रेल में जब टी टी घूमता है तो यू लगता है , जैसे गजराज जंगल में घूमता है अथवा किसी अखाड़े का गुरु अपने शिष्य को भरपूर दंड करवा कर आया हो ! पर आता है  अकसर आती हुई नींद के वक्त !
 

रेलवे पुलिस भी जो रेल में होकर भी दिखाई नही देती है . दिखाई देती भी तब है जब सब लुट पुट गया हो ! 

सब जगह कुली एक रंग के है ! इन्तजार से भरे हर स्टेशन पर नया यात्री यू लगता है जैसे मेरे पडोस में लडकी देखने आया हो ! सच में तो कुलियों को देख कर यू लगता है जैसे काशी या मथुरा में पण्डे , जहा  पर कोई अपने बाप का श्राद्ध  करने आया हो . पण्डो के सिवाय यह हो नही सकता. ठीक उसी तरह कुली के सिवाय सीट मिलनी  भी मुशिकल होती है. जिस तरह भगवान, घर्मगुरुओ की ज्यादा मानता है ठीक उसी प्रकार टीसी कुली की ज्यादा मानता है. 

लाल,  पीले, नीले  गांघीजी का चलन रेल में खुलम खुला होता है .
 

मेरे हिसाब से भारत में सर्वोतम देखने लायक स्थान ताजमहल है तो करने लायक सर्वोतम काम रेल का सफर करना है ! विनोबा भावे कह गये  है की सच्चा हिन्दुस्थान गावो में है . पर मै दावे के साथ कह सकताहू की सच्चा हिन्दुस्थान रेलों में है!
अपने आप में इतराती घमंड करती हुई राजधानी एक्सप्रेस, (सिंधिया का आविष्कार) - मेरी रेल को पीछे छोड़ पटरियों  पर दोड़ रही थी ! लालू की पैदाइस गरीबरथ में आमिर लोग गरीब बन कर यात्रा करते है तो ममता बेन की "दुरन्तो" एक्सप्रेस  आम लोग की पहुच से ही दूर है !!!!

सोचते हैं क्या मांगे आपसे? चलो तलाक तलाक तलाक मागते है!

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रब से आपकी ख़ुशी मांगते हैं
दुआओं में आपकी हंसी मांगते हैं
सोचते हैं क्या मांगे आपसे?
चलो तलाक तलाक तलाक मागते है!

आज मेरे यार की शादी है..........लगता है जैसे सारे संसार की शादी है..........

शर्किट! यह क्या बक रहा है ? ..तेरी भाभी से अपुन की शादी तो हो गयेला है, तो फिर काई कू और किस वास्ते गारयेला है ? 

मुन्ना भाई! अपुन आपके लिए नही गारयेला है - अबी, ये तो ठहरा फिल्मी गाना ! और, फिलम में तो अतिश्योक्ति का इस्तेमाल होता इच है भाई!
भाई हिन्दुस्थान में बिच-बिच में ऐसा शादी होता है जिसकू देख ऐसा लगता है जैसे पुरे संसार की शादी है. ऐसा ईच एक शादी अभी-अभी हुआ है, लेकिन अख्खा देश में उसका चर्चा होने लगा है . बरात आया भी नही कि बैंड पहले से ईच बजने लग गया था भाई! आतिशबाजी चल रहा है रोज बयानबाजी का बम फुट रहा है. जब भी ऐसा शादी होता है सडक पर वीडियो कैमरा और माइक्रोफोन घुमने लगता है.

अरे सर्किट! तू क्या बक रहिया है, अपुन के भेजे में तेरी कोई बात नही घुसता ईच नही भिडू !

भाई! इस बार दो खिलाड़ी लोग [सानिया+सोयब] का शादी १५ अप्रेल कों होने वाले था पर दो दिन पहलू ईच बेचारों का "मुल्ला-मोल्वियो" ने बैंड बजवा डाला .ये कोई पहला शादी नही होएंगा , जिसमे कोई अडंगा डालने कू एक "फटाकड़ी" {आयशा} पैदा हुई है ? ओर भाई सोयब मिया ने आयशा बेगम कों तीन इजी इन्सटोलमेंट में (पांच-पांच हजार तीन महीना देंगे) तलाक-तलाक-तलाक का गेम बजा डाला !

टेशन लेने का नही देने का - भाई अपुन का ईच फोर्मुले पर सोयब मिया फुदक रिया है.

भाई! जब तुम्हारा शादी मान्यता भाभी के से पक्का होरिया था तभी ईच कोई उलटी खोपड़ी का "मिराज" पैदा हुआ था और भाभी का पहला पति होने का दावा कर रहा था! भाई! उस मिराज के बच्चे को खोपचे में लेकर अपुन ने ऐसा धोया की वापिस दिखा ईच नही ! और दिखता काइकू... मान्यता भाभी ने पहले ईच तीन बार इजी इन्सटोलमेंट में तलाक-तलाक-तलाक बोल उसके हार्ट की तो वाट लगा ....डाली .

भाई, तुमको तो मालुम ईच है जो शादी अख्खा संसार का शादी लगता है , उसमे संसार का रूचि शादी के बाद भी बना रहता है! जैसा की एक हिरोइन का मामला में हुआ! हिरोइन गर्भवती हुआ तो लगा जैसे अख्खा दुनिया गर्भवती हो गया ! हिरोइन को उबकाई आता था तो अख्खा दुनिया कू उबकाई आता था! वो चैक- अप का वास्ते जाता था, तो अख्खा दुनिया चैक- अप का वास्ते जाता था! जच्चा बच्चा का सेहत राष्ट्राय मुदा बन गयेला था भाई! जब तक उसका बच्चा का जन्म नही हुआ वीडियो कैमरा भी ढीला कपड़ा पहने नजर आता था.

अबी हिन्दुस्थान में एक और एइचा ईच शादी हुयेला    है जैसे अक्खा संसार की शादी हुएला है . दुल्हा मिया पाकिस्थान से कलटी मारके बरात के पहले ईच दुल्हन के घर पहुच गयेला था ! सडक पर वीडियो कैमरा और माइक्रोफोन लोग घूम रिया था . किसम-किसम का लोग का राय पुछा जा रहा है! भाई! हिन्दुस्थान में आज तक कोई आदमी नही देखा गया की जो ये बोल देवे की "मेरे कू कुछ नही बोलना है इसमें मेरा कुछ लेना देना नही है!

भाई! अबी, कल सानिया मलीक के रिशेप्सन में सूट बुट में जाने का है...... कैमरा और माइक्रोफोन लोग आने वाला है.

सर्किट! कमाल है ! ये "अल्हा" भी गजब की चीज है किघर किघर शादी करवा देता है हिन्दुस्थान और पाकिस्थान में दोस्ती तो होती नही , पर शादी हो जाता है !" ...एक बात और जो शादी सारा दुनिया का होता है, उसमे लफडा भी दुनिया भर का होता है! ऐ! सर्किट , टेशन लेने का नही देने का..........रे.....



नोट - धर्म रीती रिवाजो क़ी आड़ में महिलाओं के जीवन के साथ हो रही खिलवाड़ के विरोध में यह व्यंग लिखा है.... क्या मुस्लिम महिला महिला नही होती है ? सिर्फ तीन बार तलाक बोल देने मात्र से व्यक्ति सांसारिक कर्तव्यो से विमुख हो जाता है ? ये कैसी प्रथा ? ये कैसा नियम ?

भाई - विनम्रता बोले तो ...?

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मुन्नाभाई ओर सर्किट दोनों ही पिछेले दिनों दुनिया भर की पार्लियामेंट के दोरे पर  थे. कई देशो की पार्लियामेंट में जाकर मुन्नाभाई ने जो देखा वो भारतीय ससंद एवं विधान सभाओं में अक्शर देखने को मिलता. है. राजनिक  बहसों में गांघीवादी  विचार धारा  को मिलाने का उनका सपना साकार ना हो सका.
-सर्किट! साला ये नेता तो सभी एक दुसरे की ठुकाई करने में लगे है ? भाई!  बोले तो एक-एक के कान की पिछु राफसिक लगाना मंगता है. सर्किट अपुन शिष्टाचार के दोरे पर है विनम्रता का प्रयोग करने का ! भाई - विनम्रता बोले तो ----- ?????  विनम्रता बोले तो सुट-बुट पहनकर भाई-गिरी करनेका .....
How Different Countries Debate in Parliaments/ Congress




उक्रेन  








तुर्की








ताइवान







साउथ कोरिया






रशिया








मेक्सिको






जापान






इटली





भारत



see what happens during political meetings in people's republic of china...





PEACEFUL,





HARMONIOUS





AND





NO DISTURBANCE.


आप कोन है यह कोई सवाल नहीं है.

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आप कोन है यह कोई सवाल नहीं है।
It does not matter Who you are........


May be you are king of world


May be you are most dangerous in वर्ल्ड

May be you are an independent one...
May be you can rule other or rule the world
May be you are most lovable by others...
Either you are a Gentleman...
or most DANGEROUS killer of the world...
But the fact is this..........












When you are at home........











Wife is wife...



Dose not matter who the Hell are you...

आओ रंग ले हम तन-मन

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आओ रंग ले हम तन-मन,
रंग-रंगीली होली के संग में.
भूल कर भूत की भूलो को,
मिल ले गले आज सभी संग में..
ऐसा जीवंत कोई पर्व नही,
दुनिया जहांन में.
धन्य मानो अपने जीवन को-
कि तुम पैदा हुए हिन्दुस्थान में ..
भूल भाषा, धर्म, जाती,-
क्षेत्र ओर समाज के सवाल को .
टूटे दिलो को जोड़ लो,
उठा लो अबीर ओर गुलाल को.
आओ चले मिलकर फिर,
उसी पुराने रंग ओर ढंग में.
हम एक थे, हम एक है,
आती है आवाज यही होली में.
प्रस्तुति -: प्रेमलता एम्. सेमलानी

बैंगलोर से मेरा पुराना नाता, गार्डन सिटी" कब "पत्थरो की नगरी बन गई!!

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इन्ह दिनों बाहर  रहने का अवसर मेरे लिए कुछ अधिक था! मित्र के घर के मोहरत के सिलसिले में मुझे बैंगलोर जाना पडा . मेरे मित्र, रिश्ते में मेरी बहिन के देवर है . "राजाजी-नगर" में मित्र ने तीन मंजिला बिल्डिग बनाई जो सुन्दर एवं योजनाबद्ध ढंग से बनाई गई है.  बैंगलोर का यह क्षेत्र (राजाजी नगर) सुहाना, सुन्दर एवं साफ़   सुथरा लगा. हां इस क्षेत्र के ब्रिज के निचे ट्राफिक  जाम से मार्केट आने-जाने में बहुत अधिक समय जरुर लग जाता है  !

वैसे बैंगलोर से मेरा पुराना नाता है. गली-गली घूम चुका हु. दस-पन्द्रहा सालो में  बैंगलोर में काफी कुछ बदलाव आया है. विकास भी हुआ है. बहुत बढ़  सा गया है. कई किलोमीटर दूर तक लोगो ने अपना बसेरा बसा लिया है.  कुछ वर्ष  पूर्व बसंतगुडी, जयनगर जो चिकपेट एवं शहर से मात्र ५-६ किलोमीटर दुरी   पर स्थित है लोग दूर बताते थे आज वो ही स्थान बैंगलोर के बीचोबिच में विद्यमान हो गया है. समय कितना तेजी से चला पता ही नहीं चला. "गार्डन सिटी" कब "पत्थरो की नगरी" बन गई, पता ही नहीं चला!.

ट्राफिक समस्या से अभी तक लोगो को निजात नहीं मिल पाई है. जबकि सरकार ने बहुत सारे नए ब्रिज बनाए है. कई रास्तो को "वन वे" कर दिया है. फिर भी ट्राफिक  समस्या "सुर्पनका" की तरह मुह फैलाए खड़ी है.

हां! एयर पोर्ट रोड को काफी आधुनिक बना दिया है. एयरपोर्ट से सिटी आने के लिए मैसूर बैंक तक "ऐ,सी बसों" की अच्छी सुविधा होने की वजह से रिक्शा-टेक्शी वालो की मनमानी पर लगाम जरुर लगा गई है.
रेलवे के हालत भी बुरे ही है - "कंट्रोमेंट से बैगलोर" पहुचने के लिए ट्रेँन को ४५ मिनट लगते है. जबकि मुश्किल से यह रास्ता मिनट का है. वैसे प्लेट -फॉर्म खाली ना होने का बहना  बनाकर रेलवे मंडल क्या साबित करना चाहती है ?  समझ के परे है. कई मायनों में बैंगलोर विश्व स्तरीय माना जा सकता है पर नागरिक सुविधाओं कि कमी के कारण समय की अपव्यता चिंता का कारण है. इनफ़ोसिस , विप्रो , एच सी एल  जैसी  बड़ी कम्पनियों के कारण लाखो जॉबकर्ता देश-विदेश से बैंगलोर में निर्वासित है. इन्ही लोगो  की भारी तादाद ने बैंगलोर में प्रोपर्टी की कीमतों में उछाल लाने में साहयता की है तो सरकारी खजाने को  टेक्स  से लाबाबब कर दिया है. पर रात को ११=३० बजे के बाद उन्हें राहगीरों को खाने पिने को होटले या सड़क पर खुमचे नहीं लगे मिलते है क्यों कि यहाँ का प्रशासन एवं पुलिस इसके लिए तैयार नहीं है. हां फाइव स्टार होटल  रात भर खुला मिलेगा. पर लोग रात को १२ बजे के बाद घरो से निकल कर टहलते नहीं है बैंगलोर में शायद पुलिस्या डर ? हां रात को कभी जोरदार भूख लगा जाए तो घबराए नहीं रेलवे स्टेशन चले जाए वंहा की "केंटिन" में देर रात  तक स्वादिष्ट भोजन मिल जाएगा. "एमजी रोड " पर घूमने एवं शापिंग करने का आनंद कुछ ओर ही है. मुझे तो "सुखसागर" की पाँव भाजी बड़ी ही लजीज लगी. वैसे यह मुंबई "सुखसागर" की ही ब्रांच है.

आज मुंबई पहुचा ! लगे हाथो "रघुलिला शापिग  मोंल" में पत्नी के साथ "माई नेम इज खान" देखने बैठ गया ! पिच्चर से एक सन्देश जरुर मिलता है -
" दुनिया में दो ही तरह के इन्शान होते है - एक अच्छा इसान, दूसरा बुरा इंसान."
हिन्दू, मुश्लिम, जैन, सिख, इसाई यह सभी तो इंसानों कि इंसानों के लिए बनाई हुई खाई ! कुल मिलाकर फिल्म एक सामाजिक सन्देश देने में सक्षम हुई. शाहरुख खान को एवं काजोल को बधाई. वैसे करण जोहर भी इसके हकदार है.
बालासाहेब का आभार की वो "माई नेम खान" पर प्रतिबन्ध नहीं लगाते तो मै इतना उत्सुक नहीं होता यह पिक्चर देखने के लिए नही जाता .
कल  मेरे ब्लोगर मित्र विवेक रहस्तोगीजी की शादी की सालगिरह थी. फोन  मिलाया शुभाकामानो के लिए तो वो मद्रास में थे. काफी लम्बी बात चली.   मैंने उन्हें एवं भाभीजी को शुभ-कामनाए प्रेषित की.
वन्दना गुप्ताजी की १५ फरवरी को शादी की सालगिरह थी. वंदनाजी की कविताओं का मै बड़ा फैन हु एक बार चैट पर बात हुई थी.   वंदनाजी को हार्दिक शुभ कामनाए ....
वैसे अरविन्द जी मिश्रा की भी कल १८ फरवरी को  शादी की   सालगिरह मनाई गई उन्हें भी मै प्रणाम करते हुए मंगल कामनाए प्रेषित करता हु.
कल सुबह मै फिर कही नई  यात्रा पर निकल चुका होउगा जब आप यह पोस्ट पड़ेगे. नमस्ते....

वेलेंटाइन डे हिंदी में बोले तो प्रेमियों का दिन

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किसी कारण वश यह पोस्ट मै कल १४ फरवरी को प्रसारित नही कर पाया। कारण कि मै उन्ह दिनो बैन्गलोर मै हू। यह पोस्ट आज प्रसारित कर रहा हू। क्ष मा करे।


प्रेम एक ऐसी संपदा है जिसे कोई चुरा नही सकता! कोई छिन नही सकता! जब भय पूरा छुट जाता तब प्रेम का उदय होता है. मगर तुम्हारा प्रेम नही छीना जा सकता. जीवन जीने के लिए तीन शब्दों का मूल मन्त्र है - "लिव-लव-लाफ "
-जियो,प्रेम करो और हंसो. जो व्यक्ति परम का आलिगन कर लेता है, उसके जीवन में हंसी के फुल खिलते है.आओ आज हम सभी जीवन का प्रेम से आलिगन करे.

१४ फरवरी यानी "वेलेंटाइन डे" हिंदी में बोले तो प्रेमियों का दिन.प्रेम सूफियो का मार्ग है.सूफी, परमात्मा को "प्रेयसी" के रूप देखता है.
परमात्मा एक प्रेमिका है. और भक्त उसका प्रेमी है. पुरुष का चित्त ज्ञान के आसपास घूमता है. स्त्री का समग्र भाव प्रेम के आसपास घूमता है. पुरुष अगर प्रेम भी करता है, तो उसका एक अंश ही प्रेमी बन पाता है. स्त्री जब भी प्रेम करती है,तो उसका समग्र ह्रदय प्रेम बन जाता है.

प्रेम हो जाना निःसंदेह एक सुखद अनुभूति है। लेकिन वो सिर्फ दैहिक आकर्षण नहीं बल्कि एक दूसरे के सुख-दुःख का साझा निर्वहन है। प्रेम की परिणिति जब विवाह की वेदी तक जाती है तो दोनों की जिम्मेदारी है इसे सफल बनाना।

बुद्धिमानो को प्रेमी पागल जैसा मालुम पड़ता है.और है भी! प्रेम बुद्धि से नही "ह्रदय" से किया जाता है. और ह्रदय के पास कोई तर्क तो है ही नहीं, सिर्फ भाव है और भाव अंधा है. प्रेम की इन्ही कमियों की वजह से अहंकार पिघलता है. प्रेम की आग में अंहकार पूरी तरह जल कर ख़ाक हो जाता है. प्रेमी अपने आपको मिटाकर दुसरे को बचा लेता है. जिस दिन एक बच जाता है, उसी दिन सत्य उपलब्ध हो जाता है.

कुछ अप्रेमी (पर्दे के बाहर) , "वेलेंटाइन डे" को असभ्यता का घोतक एवं भारतीय संस्कृति के लिए विनाशकारी मानते है. किन्तु में उनके तर्को से सहमत नही हु. मेरा मानना है की प्रेंम दया नही कर सकता. क्रोध भले ही करे. दया तो तभी होती है, जब प्रेम "तिरोहित" हो जाता है. दया तो राख है. जब प्रेम जल चुका होता है, तब राख बचती है. जिसे तुम्ह प्रेम करते हो, उसे कुरूप अवस्था में भी प्रेंम कर पाओगे,तभी जीवन सफल है प्रेम सफल है.

इससे सर्जनात्मक शक्ति दुनिया में कोई नही है.प्रेम अम्रत है. जिसका ह्रदय प्रेम में बचा है,उसे प्रेम देना अच्छा लगता है. हमारे जीवन में यह ख़ुशी और आनंद की घटना जैसा बन जाती है. प्रेम सदा बिना शर्त का होता है. जंहा शर्त है,वहा सोदा है. प्रेम जितना गहरा जाता है, इस जगत में कोई और चीज इतनी गहरी नही जा सकती कोई व्यक्ति आपकी छाती में छुरा भोंके वंह इतना गहरा नही जाएगा जितना उसका प्यार- प्रेम आपके भीतर गहरा जाएगा...

सुश्री प्रेमलता एम्.सेमलानी को जन्म दिन के दिन "हेपी बर्थ डे" आज का दिन (१४ फरवरी) मेरे लिए आप सभी से कुछ ज्यादा ही "प्रेममय" है. आज
"वेलेंटाइन डे" यानी "प्रेम का दिन" और आज ही के दिन मेरी जीवन संगनी,साथी- "प्रेम", का "बर्थ डे" भी है. क्यों भाइयो....बहिनों.... है ना डबल आफर मेरे लिए ? तो आज के दिन इस डबल ख़ुशी के शुभअवसर पर मै मेरी जीवन साथी सुश्री प्रेमलता एम्.सेमलानी को जन्म दिन के दिन "हेपी बर्थ डे" बोलते हुए उन्हें जन्म दिन की मंगल कामानाए प्रेषित कर रहा हु. और "वेलेंटाइन डे के अवसर पर अपने प्रेंम का एक बार फिर से गुलाब के फुल से इजहार करता हु.

आपको याद होगा ... प्रेमलता एम् सेमलानी ने "ताऊ डोट इन" की साप्ताहिक पत्रिका में "नारी-लोक" कोलम के माध्यम से खाना खजाना की बाते लिखा करती थी.
आप सभी को भी "हेपी वेलेंटाइन डे"

मूल्य-परम्परा-संस्कार-प्रतिष्टा-कुल परम्परा

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मैंने इंशानी जीवन के कई पहलुओ को एक ही घटना मे तोलने का प्रयास किया. करीब से एक बाप बेटे के कई उलझनों को मैने समाज परिवार ओर व्यक्ति के वैज्ञानिक तथ्यों के करीब महसूस किया. शायद जीवन का यह फलसफा हमारे समझ में आ जाए तो आपसी कलह मनमुटाव परिवारिक चिंताए दूर हो सकती है.


किसी के चेतन मन तथा अवचेतन मन में भयंकर संघर्ष छिड़ा हुआ था. चेतन मन उसे लडकी की ओर खींच रहा था तथा अवचेतन मन अपनी कुल परम्परा की ओर .उसकी मनो दशा इतनी मोहग्रस्त हो गई थी कि उसे ना तो दूकान पर शान्ति मिलती न ही घर पर.

मूल्य-: मूल्य तो हमेशा ही सापेक्ष होते है. एक समय में जिस चीज का जो मूल्य होता है ,दुसरे समय में उसका इतना मूल्य नही होता है. एक व्यक्ति के लिए जिस चीज का मूल्य होता है दुसरे के लिए नही भी होता है!

परम्परा -: हमक कुलीन परम्परा को वहन कर रहे है. हम एक परिवार की सीमा में भी आबद्ध है. इस द्रष्टि से तुम्हारा निर्णय मुझे ओर मेरा निर्णय तुम्हे प्रभावित करता ही है.

संस्कार-: संस्कारों पर किसी वर्ग विशेष का अधिकार नही हो सकता! एक धनी ओर उच्च कुल में पैदा होने वाले व्यक्ति के संस्कार भी खोटे हो सकते है ओर एक गरीब तथा नीच माने जाने वाले कुल में पैदा होने वाले व्यक्ति के संस्कार भी अच्छे हो सकते है.

प्रतिष्टा -: मै यही सोच रहा हु कि परिवार की प्रतिष्ठा तथा व्यक्ति की प्रतिष्ठा में दुसरे शब्द में समाज की प्रतिष्ठा ओर व्यक्ति की प्रतिष्ठा में कोन ज्यादा मूल्यवान है ?
शायद समाज व्यक्ति की रक्षा करता है व्यक्ति को समाज की सुरक्षा रक्षा करनी चाहिए.दोनों मिलकर ही एक सुव्यवस्था को उजागर करते है.

क्षणिक -: शादी कोई ऐसा क्षणिक देह बंधन नही है जिसे व्यक्ति हडबडी में जोड़ ले .बल्कि यह तो एक ऐसा आत्मीय सम्बन्ध है जिसे बहुत सोच समझकर निर्धारित करना पड़ता है.

समाज सरचना का यह गहरा एवं गुढ़ रहस्य वैज्ञानिक आधार लिए हुए प्रतीत होता है.आजकल लव मैरिज आम बात हो गई है. हरेक समाज में यह प्रचलन चल पड़ा है. ऐसे में युवाजन जाती, धर्म, गोत्र, का पलायन कर अपने सुखी वैवाहिक जीवन क़ी अपेक्षा करते है. कुछ रिश्ते कामीयाबी के शिखर पर चढ़ भी जाते है कुछ रिस्तो में विराम सा आजाता है. घर परिवार एवं समाज के बनाए नियमो को हमारी भलाई एवं रक्षा हेतु बनाए गए थे पर आजकल धडल्ले से युवाजन उक्त नियमो को तोड़ मरोड़ रहे है. कारण बताते है-" हम शिक्षित है, २१वी शदी में रहते है, ओर हम हमारा भला बुरा समझते है." यह तर्क ही सही नही है ! जन्मदाता विवश है सामाजिक परम्पराओं क़ी अहवेलनाओ को देखने के लिए ...युवाजनो द्वारा ऐसी बातो को किसी दकियानूसी विचारों का वास्ता देना यह उनकी भूल साबित होने जैसा है.

अंत में एक पक्ति में अपनी बात खत्म करना चाहता हु
"सुधरे व्यक्ति, समाज व्यक्ति से,
राष्ट्र्य स्वयम सुधरेगा !!"

मुंबई मेरे ताऊ की

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यह सवाल ही बेकार है की मुंबई किसकी है ?  दुनिया में कैलफोर्निया से लेकर कालाहांडी तक ओर मुंबई से लेकर म्यूनिख तक हजारो ऐसी जगह है जिनका एक नाम है. और जंहा इंसानों की छोटी मोती आबादी बसती है.

यह सवाल आपके मन में भी होगा जैसा अब तक सब गलत फहमी के शिकार थे की मुंबई हम सब की किन्तु अफ़सोस हमारी सोच बेकार निकली. ऐसा सवाल हर जगह तो नहीं उठ रहा है.  यह सभी  जानते है की कोनसा गाव या शहर किसका है और किसका उस पर कितना अधिकार है. इसलिए मुद्दा यह है की यह सवाल कोंन उठा रहा है ?  जब यह सवाल एक बच्चे से पूछा गया की मुंबई किसकी तो उसने तपाक से कहा -" मेरे ताऊ की है मुंबई."

मुबई सिर्फ ओर सिर्फ मराठियों की है. यह बात कई मर्तबा दशको पूर्व से राग-अलापा जा रहा है. चव्हाण साहब यहा के मुख्यमत्री थे तब राजस्थानियों को बोम्बे छोड़ राजस्थान जाने की चेतावनी मिली थी. तब  राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री स्व. मोहनराज सुखाडिया महाराष्ट्र के राज्यपाल थे, श्रीमती  इंदरा गांघी के बिचबचाव से मामला शांत हुआ. अब ठाकरे  परिवार के सदस्य उसी बात को दोहरा रहे है.  यदि वो ऐसा कह रहे है की मुंबई महाराष्ट्रवालो की है तो मुंबई उन्हें दे देनी चाहिए. यह लेंन  देंन जवाबी ही होना चाहिए. कानूनी तोर पर यह हो नहीं सकता. अगर पिछले चुनाव में उन्हें सीटे ज्यादा मिली होती तो  सरकार भी दे दी जाती.

ओर यूपी-बिहार वासियों के प्रति वो ही  जहर उगला जा रहा है.  ठाकरे परिवार के सदस्य, अमिताभ,सचिन तेंदुलकर, मुकेश अम्बानी, शाहरुख खान पर इसलिए दहाड़ते  है की ये लोग मुबई को भारत का हिस्सा बताते है ओर कहते है की मुंबई आम भारतीयों की है. किसी एक जाती, भाषा रंग, में उसे नहीं बाटा जा सकता है. मुंबई पर ही नहीं पुरे देश के कोने-कोने पर भारत के आम नागरिक का बराबर का हिस्सा है. पर शिव-सेना, मनसे के नेता  मराठियों की हमदर्दी पाने की राजनीति के माध्यम से अपना अपना वोट बैंक तैयार करने में लगे हुए है. लगे हाथो राहुल बाबा भी बहती गंगा में (राजनीतिक कुंड) में हाथ घोने बैठ गए, ओर बिहारियों की हम दर्दी लुटने की फिराक में देश में प्रांतवाद की हवा को फुकने का काम किया है.  यह कैसी राजनीति ? मानवता ओर मानवीय भावनाओं का यह कैसा बलात्कार  ?  यह कैसा प्रातंवाद ?

रतन टाटा के उस कठोर निर्णायक फैसले से सभी प्रवासियों को एक सबक लेना  चाहिए जब शिन्गुर (कोलकत्ता) में नैनो के प्रोजेक्ट को लेकर गन्दी राजनीति शुरू हुई तो रतन टाटा ने करोडो की सम्पति को तिलांजलि देकर वहा से हट गए  तब केंद्र सरकार एवं राज्य सरकार की पेंट गीली हो गई. क्यों ना आत्मसमान से जिया जाए ? क्यों ना रतन टाटा के निर्णय को मुंबई में रहने वाले अप्रवासी सामूहिक रूप से फ़ॉलो करे ? करना चाहिए  तभी नानी याद आएगी ? यह राजनीतिज्ञो के लिए महत्वपूर्ण सवाल है वरना यह  बेकार बहस से ज्यादा कुछ नही है.
जय हिंद जय महाराष्ट्रा

पढ़ना है तो पिटना होगा!!!

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विदेशी वस्तुए , विदेशी कोच , विदेशी डिग्री , यह हमारी गुलाम मानसिकता का परिणाम है. विदेश में पढ़े - लिखे की इज्जत ओर घरेलू सस्थानों में पढ़े लिखे हेय नजर से देखने की प्रवर्ती का नतीजा है आस्ट्रेलिया में भारतीय छात्रों पर हमले .


२०२० में महाशक्ति बनाने का सपना संजोने वाले भारत में ऐसे शिक्षा सस्थानों का निर्माण क्यों नहीं किया जाता जँहा आस्ट्रेलियन एवं अमेरिकन छात्र पढ़ने को गोरव समझे ?


वहा की सरकार भारतीय छात्रों पर  हमलो को नस्लवाद नहीं मानती . भारतीय हुकमरान कठोर रुख अपनाने की बजाय पिलपीली भाषा में विरोध जताकर क्या साबित करना चाहती है ?

हद तो तब हो गई जब २१ वर्षीय नितिन गर्ग के पेट में चाक़ू घोपकर उसकी ह्त्या कर दी गई . ओर तो ओर पटियाला के युवक रणजोध सिंह को जलाकर मार दिया.
अब तक भारतीयों पर हमले के १०० मामले प्रकाश में आए किन्तु दुःख इस बात का है की आस्ट्रेलियन सरकार विफल रही इस नस्लवादी आंतक को रोकने में,वही भारतीय प्रसशान लाचार दिख रहा है, इस पुरे प्रकरण पर.


अब यह भारत की प्रतिष्ठा का,  सम्मान का सवाल है. अपने बच्चो के जीवन का सवाल बन गयाहै. ऐसे में हमे कठोर रुख अपनाना होगा. हमे आस्ट्रेलियन निर्मित वस्तुओ का बहिष्कार करना चाहिए. हमे आस्ट्रेलियन क्रिकेटरो के साथ कोई मैच नहीं खेलना चाहिए एवं उसका विरोध करना चाहिए . समस्त व्यापारिक सम्बन्ध विच्छेद कर देने चाहिए...