पांडेजी ! मै ठीक ठाक व्यख्यान कर रहा हु ना रेलवे का !!!

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 रेल हमारे देश का दर्पण है. जिस तरह में रेल में बैठने की जगह नही मिलती है, ठीक उसी तर्ज पर हिन्दुस्थान की सरजमी पर रहने को घर नही मिलता है. शायद हम रेलों की इस भीड़ में शामिल होकर अपने अस्तित्व को ही खो दिया है.
 

रेल गाडी  में हर आदमी एक दुसरे पर अविश्वास करता दिखता है.समान चोर भी मन ही मन में शंका करता है. 

फैंसी ड्रेस की तरह नाईट सूट का कम्पीटेंशन  भी ट्रेनों में खूब दिखने को मिलता है. लुंगी-पजामा अब तो 
थ्रीफ़ोर्त, जांगिया, या बरमुडा वगैहरा .....वगैहरा, बेचारी  नाईट सूट भी शर्मा जाती होगी क्यों की --  सब कुछ दिखता है उसमे .....बस जो नही दिखता है- वो है लाज,शर्म और हया...!!!

कम्पीटेंशन  से याद आया "कम्पटीटिव" माइंडेड" आज की कला एवं फैशन है. हर एक अपनी मोनोपली में रहना चाहता है . यात्रीयो के विभिन्न प्रकारों के खर्राटे, रेल चलाने में बड़े मददगार होते है ऐसा हमारे ब्लॉग गुरु एवं रेलवे के ताने-बाने  से वाफिक रेलवे के वरिष्ठ अफसर ज्ञानदतजी पांडे  का भी मानना है. खर्राटो की  आवाज सुनकर इंजन  के कान खड़े हो जाते है और पहियों में तेजी आ जाती है  और दोनों मिश्रित ध्वनी एक नया ही अलाप पैदा करती.  यात्रियों को रात में जगाए रखने के लिए एवं चोरो से बचाव का रेलवे का कुदरती खर्राटे एक  यंत्र बन पड़ा!


 रेल में जगह मिलने पर बड़ा प्रेम जग जाता है जैसे कुदरत की फितरत में हजरत नजर आती है. यदि कोई मार्डन माडल सामने की सीट पर बैठी होती है तो शराफत की मिसाले पेश करते थकते नही है, और अत्ते-पत्तो का अदान-प्रदान करते है, आने के न्योता दे डालते है. जबकि सच तो यह है की न उसे जाना है और न बुलाने वाले के भाव होते है, बस! केवल ओपचारिकता !

बेचारे रेल यात्री करे भी तो क्या ? मांगने वालो की ऊँची चढ़ी हुयी भोंये और हावभाव देखकर अच्छे-अच्छे अभिनेता भी बोने लगते !
 वे गाना अपनी ओरिजनल आवाज में गाकर लोक संगीत में नये प्राण फुकने का आभास करा जाते है! 

छोटे छोटे बच्चे, नंगे तन से पर  स्वच्छ दिल से अपने शर्ट से रेल के डिब्बो में झाड़ू लगाकर रेलवे की काफी हद तक स्वचछाता बनाये रखने में मदद करते है !पांडेजी ! मै ठीक ठाक व्यख्यान कर रहा हु ना रेलवे का !!!
 
रेल एक प्रकार का  मन्दिर है . यहा पर हर यात्री के मन में  श्रद्दा जागती है! रेल से नदी में अथवा समुन्द्र में सिक्के फेकना कोई नयीं बात नही है!  ये इसका ज्वलंत उदाहरण  है की नदी या समुन्द्र आने पर वे (यात्री) भी कुबेर की तरह अपने सिक्को के खजाने को खोल देते है , जब सिक्का ठीक नदी में गिरता है तो आनंद का अनुभव होता है, और जब नही गिरता है तो आसपास के मुसाफिरों को पत्ता नही चला होगा यह सोचना शुरू कर देता है बेचारा मुसाफिर !!! मेरा ताऊ कहता है -" हमारे जमाने में सिक्के ठीक जगह गिरते थे,"  अब ताऊ, तुम्हे कोण समझाये ?  तुम्हारे जमाने में सिक्क्के वजनदार होते थे अब हल्के फुल्के एलिमिन्युम की तरह हवा का रुख देख कर दूसरी तरफ उड़ जाते है. जिसका सिक्का नदी में गिर जाता है वह गंगामाई की जय जयकार अवश्य करता है पर जिसका सिक्का ठीक पानी में नही गिरता है वह खंखार कर उसे कोरस जरुर देता है! मानो सिक्के उछालने के विश्व कप से बाहर हो गया हो! इसे यात्रियों को  रेलवेवाले भी अपना  हारा हुआ खिलाड़ी समझते है. पर बेचारे, रेलवे के भोलेभक्त यात्री यह भूल जाते है की आजकल मछली पकड़ने के अलावा सिक्के पकड़ने के जाल भी होते है.


स्टेशन पर रुकना रेल की बड़ी पुरानी आदत है . पर जब रेल रूकती है तो सोये यात्रियों को जाग जाने की आदत है ! जब उपर की बर्थ से निचे उतरते है तो यू लगता है जैसे बेकाबू जंगली घोड़े पर से उतर रहे हो! 

यात्रा में "कंहा उतरना है ?" यह सबका फेवरेट सवाल होता है.  सुबह-सुबह बाथरूम के बाहर लगी लम्बी कतार रेल यात्री को यह आभास दिलाता है की  उसने केवल रेल में  सीट का आरक्षण करवाया  है बाथरूम की सीट  का नही .......
रेल की यात्रा करना कोई आसान काम नही है . इसी कारण सुखद एवं मंगलमय  यात्रा की  कामना रेल विभाग बार बार खुद ही करती है.
 

हवा पसंद लोग दरवाजे का सहारा लेते है और "ममता - लालू" उनका विषय होता है . वहा पर जी भी खूब लगता है . क्यों की टायलेट भी वही पास में होता है.
 

जिस तरह घोड़ा गाडी, घोड़े के बिना अघुरी है ठीक उसी तरह रेल भी ताश और घर के आचारों की सुगंध के बिना अधूरी है. 
ठेलेवाले  भी बड़े कलाकर होते है वह भी रेल का ऐसे इन्तजार करते है जैसे ममताबेन (रेलमंत्री) स्वय उनके ठेले की पानीदार चाय पीने या चार पाच घंटे पूर्व बनाई आलू सब्जी  एवं पूरी को फिर से घटिया तेल में गर्म कर खाने वाली हो !
 

रेल में जब टी टी घूमता है तो यू लगता है , जैसे गजराज जंगल में घूमता है अथवा किसी अखाड़े का गुरु अपने शिष्य को भरपूर दंड करवा कर आया हो ! पर आता है  अकसर आती हुई नींद के वक्त !
 

रेलवे पुलिस भी जो रेल में होकर भी दिखाई नही देती है . दिखाई देती भी तब है जब सब लुट पुट गया हो ! 

सब जगह कुली एक रंग के है ! इन्तजार से भरे हर स्टेशन पर नया यात्री यू लगता है जैसे मेरे पडोस में लडकी देखने आया हो ! सच में तो कुलियों को देख कर यू लगता है जैसे काशी या मथुरा में पण्डे , जहा  पर कोई अपने बाप का श्राद्ध  करने आया हो . पण्डो के सिवाय यह हो नही सकता. ठीक उसी तरह कुली के सिवाय सीट मिलनी  भी मुशिकल होती है. जिस तरह भगवान, घर्मगुरुओ की ज्यादा मानता है ठीक उसी प्रकार टीसी कुली की ज्यादा मानता है. 

लाल,  पीले, नीले  गांघीजी का चलन रेल में खुलम खुला होता है .
 

मेरे हिसाब से भारत में सर्वोतम देखने लायक स्थान ताजमहल है तो करने लायक सर्वोतम काम रेल का सफर करना है ! विनोबा भावे कह गये  है की सच्चा हिन्दुस्थान गावो में है . पर मै दावे के साथ कह सकताहू की सच्चा हिन्दुस्थान रेलों में है!
अपने आप में इतराती घमंड करती हुई राजधानी एक्सप्रेस, (सिंधिया का आविष्कार) - मेरी रेल को पीछे छोड़ पटरियों  पर दोड़ रही थी ! लालू की पैदाइस गरीबरथ में आमिर लोग गरीब बन कर यात्रा करते है तो ममता बेन की "दुरन्तो" एक्सप्रेस  आम लोग की पहुच से ही दूर है !!!!

12 comments

PD 28 मई 2010 को 9:31 am

ये व्यंग्य था, लेख था या कुछ और?
जो भी था, था बड़ा ही मजेदार.. :)

Vivek Rastogi 28 मई 2010 को 9:46 am

वाह बहुत अच्छा व्याख्यान किया है रेल का, हमने अभी ही एक लंबा सा यात्रा वृत्तांत खत्म किया रेल्वे पर।

रेल में भारत बसता है, बिल्कुल सही कथन :)

DEEPSRIVASTAVA 28 मई 2010 को 11:14 am

yaad aa gaya ambala se lucknow tak kiya jane wala safar.

नरेश सिह राठौङ 28 मई 2010 को 11:35 am

मै आपकी एक बात से सहमत नहीं हूँ कि रेलवे पुलिस रेल में नजर नहीं आती है| रेल में नजर आती पर रात के समय जब यात्री नीचे फर्स पर सो रहे होते है तो उंको धमकाने के लिए उनकी फीस मात्र १० रूपये है |

महेन्द्र मिश्र 28 मई 2010 को 12:35 pm

एक हकीकत की बयानी ..बिंदास लेख ...

Sanjeet Tripathi 28 मई 2010 को 1:44 pm

kafi pahle door-darshan par ek serial aata tha shayad manorajan nam tha ya kuchh aur,
railway station ki hi kahani thi usme,... kafi tak vaisa hi laga ise padhna

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन 28 मई 2010 को 4:35 pm

बहुत अच्छा!

गिरीश बिल्लोरे 28 मई 2010 को 7:21 pm

सिर्फ़ पंडित जी की सम्मति
न भई हम भी सहमत हैं

Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय) 28 मई 2010 को 10:00 pm

वाह!

बी एस पाबला 28 मई 2010 को 10:42 pm

मज़ेदार!

@ Sanjeet Tripathi

door-darshan ka serial tha YATRA
made by shyam benegal

भारतीय नागरिक - Indian Citizen 28 मई 2010 को 10:45 pm

सही, बिल्कुल दुरुस्त...

Dr. Purushottam Lal Meena Editor PRESSPALIKA 18 जून 2010 को 4:26 pm

जिन्दा लोगों की तलाश! मर्जी आपकी, आग्रह हमारा!!

काले अंग्रेजों के विरुद्ध जारी संघर्ष को आगे बढाने के लिये, यह टिप्पणी प्रदर्शित होती रहे, आपका इतना सहयोग मिल सके तो भी कम नहीं होगा।
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उक्त शीर्षक पढकर अटपटा जरूर लग रहा होगा, लेकिन सच में इस देश को कुछ जिन्दा लोगों की तलाश है। सागर की तलाश में हम सिर्फ सिर्फ बूंद मात्र हैं, लेकिन सागर बूंद को नकार नहीं सकता। बूंद के बिना सागर को कोई फर्क नहीं पडता हो, लेकिन बूंद का सागर के बिना कोई अस्तित्व नहीं है।

आग्रह है कि बूंद से सागर में मिलन की दुरूह राह में आप सहित प्रत्येक संवेदनशील व्यक्ति का सहयोग जरूरी है। यदि यह टिप्पणी प्रदर्शित होगी तो निश्चय ही विचार की यात्रा में आप भी सारथी बन जायेंगे।

हम ऐसे कुछ जिन्दा लोगों की तलाश में हैं, जिनके दिल में भगत सिंह जैसा जज्बा तो हो, लेकिन इस जज्बे की आग से अपने आपको जलने से बचाने की समझ भी हो, क्योंकि जोश में भगत सिंह ने यही नासमझी की थी। जिसका दुःख आने वाली पीढियों को सदैव सताता रहेगा। गौरे अंग्रेजों के खिलाफ भगत सिंह, सुभाष चन्द्र बोस, असफाकउल्लाह खाँ, चन्द्र शेखर आजाद जैसे असंख्य आजादी के दीवानों की भांति अलख जगाने वाले समर्पित और जिन्दादिल लोगों की आज के काले अंग्रेजों के आतंक के खिलाफ बुद्धिमतापूर्ण तरीके से लडने हेतु तलाश है।

इस देश में कानून का संरक्षण प्राप्त गुण्डों का राज कायम हो चुका है। सरकार द्वारा देश का विकास एवं उत्थान करने व जवाबदेह प्रशासनिक ढांचा खडा करने के लिये, हमसे हजारों तरीकों से टेक्स वूसला जाता है, लेकिन राजनेताओं के साथ-साथ अफसरशाही ने इस देश को खोखला और लोकतन्त्र को पंगु बना दिया गया है।

अफसर, जिन्हें संविधान में लोक सेवक (जनता के नौकर) कहा गया है, हकीकत में जनता के स्वामी बन बैठे हैं। सरकारी धन को डकारना और जनता पर अत्याचार करना इन्होंने कानूनी अधिकार समझ लिया है। कुछ स्वार्थी लोग इनका साथ देकर देश की अस्सी प्रतिशत जनता का कदम-कदम पर शोषण एवं तिरस्कार कर रहे हैं।

अतः हमें समझना होगा कि आज देश में भूख, चोरी, डकैती, मिलावट, जासूसी, नक्सलवाद, कालाबाजारी, मंहगाई आदि जो कुछ भी गैर-कानूनी ताण्डव हो रहा है, उसका सबसे बडा कारण है, भ्रष्ट एवं बेलगाम अफसरशाही द्वारा सत्ता का मनमाना दुरुपयोग करके भी कानून के शिकंजे बच निकलना।

शहीद-ए-आजम भगत सिंह के आदर्शों को सामने रखकर 1993 में स्थापित-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास)-के 17 राज्यों में सेवारत 4300 से अधिक रजिस्टर्ड आजीवन सदस्यों की ओर से दूसरा सवाल-

सरकारी कुर्सी पर बैठकर, भेदभाव, मनमानी, भ्रष्टाचार, अत्याचार, शोषण और गैर-कानूनी काम करने वाले लोक सेवकों को भारतीय दण्ड विधानों के तहत कठोर सजा नहीं मिलने के कारण आम व्यक्ति की प्रगति में रुकावट एवं देश की एकता, शान्ति, सम्प्रभुता और धर्म-निरपेक्षता को लगातार खतरा पैदा हो रहा है! हम हमारे इन नौकरों (लोक सेवकों) को यों हीं कब तक सहते रहेंगे?

जो भी व्यक्ति स्वेच्छा से इस जनान्दोलन से जुडना चाहें, उसका स्वागत है और निःशुल्क सदस्यता फार्म प्राप्ति हेतु लिखें :-

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा, राष्ट्रीय अध्यक्ष
भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास)
राष्ट्रीय अध्यक्ष का कार्यालय
7, तँवर कॉलोनी, खातीपुरा रोड, जयपुर-302006 (राजस्थान)
फोन : 0141-2222225 (सायं : 7 से 8) मो. 098285-02666
E-mail : dr.purushottammeena@yahoo.in