डा.रूपेशजी श्रीवास्तव ने यह क्या पुछा ? भारत के स्वाधीनता संग्राम से जुड़े दस जैन क्रान्तिकारियों के नाम बताइये

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भा रुपेश जी ने कल हे प्रभु यह तेरापंथ पर आकर जिज्ञासा जाताई थी जैन धर्म के बारे मे। लगता है डा.रूपेशजी श्रीवास्तव सात्विक मन से कुछ प्रशन रखे थे जैन परम्परा को एवम जैन क्रान्तिकारियों के बारे मे जानने को इच्छुक लगे।

चुकी जवाब लघु भी हो सकता था या प्रतिक्रया कल के कमेन्ट बोक्स मे भी दे सकते थे, किन्तु सोचा शायद यह उचित नही रहेग क्यो कि रुपेशजी के अलावा और भी सज्जन होगे जो पुर्णतया जानना चाहते होगे कि जैन धर्म क्या है ? उसके मत क्या है? यह सभी जानने के लिऐ आपको और हमको इतिहास के ज्ञान कि जरुरत पडेगी अथवा शास्त्रार्थ कि, और उसके लिऐ आपको और हमे महापुरुषो कि चरण मे जाना होगा।

"डा.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava) ने कहा…

तीन छोटे सवाल जो कि मुझसे करे गए थे परन्तु मेरे पास उत्तर नहीं था अब आपसे जान सकता हूं---
१. भारत के स्वाधीनता संग्राम से जुड़े दस जैन क्रान्तिकारियों के नाम बताइये।
२.मुसलमान कुरान शरीफ़,हिन्दू भगवदगीता, क्रिस्तान बाइबिल की अदालत में सत्य बोलने के लिये शपथ लेते हैं जैन किस ग्रन्थ की शपथ लेते हैं यदि भगवदगीता की ही शपथ लेते हैं तो क्यों हिंदुओं से अलग मानते हैं खुद को?
३.www.jagathitkarni.org नामक वेबसाइट चलाने वाले क्या कह् रहे हैं और कोई इनके विरुद्ध कानूनी कार्यवाही क्यों नहीं करवाता?
मेहरबानी करके इन शंकाओं का समाधान करें।"

१. पहली बात स्वाधीनता संग्राम से जुड़े दस जैन क्रान्तिकारियों के नाम जिसने आपसे पुछा उसके पिछे उनकी भावना क्या रही होगी ? यह मै नही जानता हू। ना ही इस बात से यह साबीत होता है कि जैन जाती में डरपोक किस्म के लोग है। और लोगो को ऐसा प्रशन करने कि आवश्यकता ही क्यो पडी ? समझ के परे है

चुकि मै जैन हू सत्य अहिसा, अस्तेय सयम्, सेवा के सिद्धान्तो कि पालना करता हू इसलिऐ मेरा फर्ज होता है जिन लोगी ने भी आपसे इसे सवाल किए उनको अच्छे मन से सन्तुष्ट करु।

सैकडो जैनी है जिन्होने स्वाधीनता संग्राम मे जेल भी गऐ और बलिदान भी दिया। गुजरात महाराष्ट्र्, राजस्थान्, मध्यप्रदेश अन्य क्षैत्रो से जैनी लोगो ने स्वाधीनता संग्राम मे हिस्सा लिया। पुरुषो को छोडो महिलाओ ने भी इस मे भाग लिया।

रिषब दास राकॉ ( कई जैल यात्राऐ एवम मात्मा गान्धी विनोबा के साथ कई वर्ष रहे,) रमणीक् मेहता, (तीन बार जैल) अमर शहिद हुकमिचन्द जैन ने (बिहार हिसार के कानुगा परिवार से ) १८५७ कि क्रान्ति मे तात्या टोपे के साथ कुद पडे। १८ जनवरी १८५८ को लालाजी को फॉसी पर लटका दिया। अग्रेजो कि कृरता तो देखिऐ लालाजी के भतिज फकिरचन्दजी जैन जिसे अदालत ने रिहा कर दिया था उसे भी पकडकर फॉसी दे दी गई। लाला हुकमिचन्द के नाम से हासी मे एक पार्क भी बनाया है।

अमर शहीद अमरचन्द बॉठीयॉ (तत्कालिन गवालियर राज्य के कोषा अध्यक्ष) रानी लक्ष्मीबाई कि क्रान्ति सेना मे शामिल हुऐ।२२ जून १८५८ को ग्वालियर मे ही अग्रेजो ने राष्ट्र द्रोह का सवाग रचके भिड भरे सर्फा बाजार मे पेड से लटकाकर अमरचन्द बॉठीयॉ को फॉसी दे दी। इस तरह मोहन राज जैन ( बाली पुर्व विधायक्) मुलचन्द डागा ( २ बार सॉसद पाली से ) सहीत हजारो जैन लोगो है से इस लडाई मे शामिल हुऐ थे। जैन ही क्यो पुरा देश ईस लडाई मे भाग लिया। जिन्होने किसी न किसी रुप मे स्वाधीनता संग्राम मे अपना योगदान दिया, जैल गये, फॉसी पर लटक गऐ, ऐसे महान सपुतो को मै और पुरा देश सलाम करता है ।

२.आपके दुसरे सवाल का जवाब इस तरह से दुगा- भारत का अन्य देश के साथ युद्ध हो रहा हो भारत कि जीत हो जाती है पुरा देश खुशी से झुमता है तब आप कहते हो आपभी ( जैन्, सिख, इसाई) खुश लगते हो, तो हिन्दु क्यो नही बन जाते । इस खुसी में अर्थ राष्ट्रीयता से है......

अरे भाई गीता जब रची गई उसमे कोई हिन्दु या जैन का उलेख नही है भगवतगीता मे जो कहा गया वो हे

"सर्वे जना: सुखिना भवन्तु" सभी सुख से रहे यही मुल मन्त्र का जैनो मे अर्थ दिया गया "जियो और जिने दो"

बाकी इसका सम्पुर्ण ज्ञान ससार के महान विदुषक, ज्ञाता धाता, महान सन्त ७८ वर्षो से साधुत्व का पालन करने वाले महान योगी पुरुष आचार्य महाप्रज्ञ जी के विचार भी लोगो को पढने चाहीऐ तब साफ हो जाता है

जैन कोन ?

प्रस्तुत है आचार्य महाप्रज्ञ जी के विचार

(पुस्तक लोकतन्त्र - नया व्यक्ती नया समाज }

"ज जिस भूख खण्ड का नाम हिन्दुस्थान है, प्राचीन काल मे उसे भारत या भारतवर्ष कहा जाता था। ऋषभपुत्र भरत के नाम पर भारत नामकरण हुआ। पारस (वर्तमान ईरान्) आदि मध्य एशियाई देशो के सम्पर्क के कारण इसका नाम हिन्दु देश प्रचलित हुआ।आचार्य कालक ने कहा-" आओ ! हम हिन्दु देश चले-

एहि हिन्दुकदेशम वच्चामो। यह निशीथ चूर्णि का प्रयोग है। भारतीय साहित्यो के उलेखो मे यह सबसे प्राचीन है। पारसी सम्राट द्वारा महान(छठी शताब्दी ई,पू,) के अभिलेखो मे सिन्धु प्रदेशो के लिऐ हिन्दु शब्दो का प्रयोग मिलता है। जैसे राजस्थान आदि कुछ प्रदेशो मे "स" का उच्चारण ह" किया जाता है वैसे प्राचीन फारसी बोली मे भी "स" का उच्चारण "ह्" होता था। फारसी लोग "सप्तसिन्धु" का उच्चारण हप्तहिन्दु" कहते थे।

मुल प्रकृति के अनुशार हिन्दु शब्द देश या राष्ट्र का वाचक है। वह किसी धर्म का वाचक नही है।

भारत मे धर्म की दो धाराये प्रवाहित रही - श्रमणऔर वैदिक। श्रमण परम्परा का तन्त्र क्षत्रियो के हाथ था, वैदिक परम्परा का सुत्र धार ब्राहृमणो वर्ग था। साख्य, जैन, बोद्ध और आजिवक- ये सभी श्रमण परम्परा के धर्म है। मीमास, वेदान्त-ये वैदिक परम्परा के धर्म है। हिन्दु नाम का कोई भी प्राचीन धर्म नही है। मुसलमानो के आगमन के बाद हिन्दु और मुसलमान पक्ष और प्रतिपक्ष बन गये। प्राचीन काल मे श्रमण ब्राहृण पक्ष प्रतिपक्ष हुआ करते थे। इसका उल्लेख सस्कृत व्याकरणकारो ने उल्लेखित किया है। एक श्रमण ब्राहृण धर्म मे दिक्षित हो जाता है और एक ब्राहृण श्रमण धर्म मे दिक्षित हो जाता, उसे कोई जाति परिवर्तन नही होता।

क्या जैन हिन्दु है?

धुनिक युग मे धर्म का वर्गीकरण सनातन, वैष्णव, जैन्, बोद्ध,शैव,शाक्त, आदि रुपो मे रहा। हिन्दु धर्म कि व्याख्या वैदिक धर्म के रुप मे की गई, तब जैन, बोद्ध्,शैव्,सिख आदि उस धारा से भिन्न हो गऐ। हिन्दु शब्द अगर राष्ट्र और जातिवाचक रहे तो जैन, बोद्ध,आदि सभी हिन्दु शब्द के द्वारा वाच्य हो सकते है। किसी के सामने कोई उलझन नही होनी चाहिए। आचार्य श्री तुलसी ने एक बार कहा था हिन्दुस्थान मे रहने वाला प्रत्येक नागरिक हिन्दु है। धर्म और महजब कि दृष्टि से भले ही वह ईसाई हो, इस्लाम का अनुयायी हो,पारसी अथवा और कोई भीहो।

"हिन्दु धर्म"इस शब्द ने हिन्दुत्व को सकुचित बना दिया है।

आचार्य श्री तुलसी से पुना के कुछ पण्डितो ने पुछा-जैन हिन्दु है या नही? आचार्य श्री ने उत्तर मे कहा-" यदि आप हिन्दु का अर्थ वैदिक परम्परा का अनुयायी से करते है तो जैन हिन्दु नही है और यदि आप हिन्दु का अर्थ राष्ट्रीयता से है तो जैन हिन्दु है।"

आपका ३. सवाल www.jagathitkarni.org नामक॥॥॥॥॥।

रुपेश जी, ससार मे गलत और सही सभी जगहो पर मिलता है। हमारे बच्चे स्कुल जाते है रास्ते मे शराब कि दुकान भी होती होगी या और कोई गलत कार्य होता होगा। हमे हमारे बच्चो को बताना फर्ज है कि बेटा यह सही है, यह गलत है। यह उसके उपर निर्भर करता है कि वो क्या ग्रहण करता है अर्थात कुछ तो कहने से मानते है ओर कुछ भुगतने के बाद सुधर जाते है।

www.jagathitkarni.org के बारे मे चर्चा करना हमारा लक्ष्य नही। आपका आभार रुपेशजी, जहॉ तक हो सका मेने समाधान कि कोशिश कि अगर भुल चुक हुई हो तो क्षमा करे।

17 comments

डा.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava) 23 अप्रैल 2009 को 8:38 pm

आदरणीय! आपने जो उत्तर दिये आशा है कि जिन सज्जन ने ये सवाल मेरे समक्ष रखे थे वे स्वयं देख कर संतुष्ट हो जाएंगे मैंने उन्हें फोन करके सूचित कर दिया है, शेष प्रभु इच्छा...
यदि किसी बात से कष्ट का अनुभव हुआ हो तो करुणापूर्वक क्षमा करें।
सादर
डा.रूपेश श्रीवास्तव

Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" 23 अप्रैल 2009 को 10:18 pm

आपने बहुत ही बढिया,विस्तारपूर्वक तरीके से जिज्ञासा का निवारण किया.

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` 24 अप्रैल 2009 को 4:59 am

आपकी स विस्तार चर्चा बहुत अच्छी लगी - इतनी जानकारी पहले नहीँ थी
- लावण्या

ѕαηנαу ѕєη ѕαgαя 26 अप्रैल 2009 को 9:27 pm

महावीर जी,सटीक जवाब
इससे पहले मैंने कभी जैन धर्म को इतने विस्तार से नहीं सोचा ना ही जैन क्रन्तिकारों के बारे मे जानने की कोशिश की,जो मेरी भूल थी!!
आप इसी तरह ज्ञान का मार्ग खोलते जाइए!!
बहुत उम्दा !

संकेत पाठक... 1 मई 2009 को 11:51 pm

bhai ek sawal ka uttar aap ne nahi diya, me bhi janna chahta hu ki jain adalat me kis granth ki shapath lete hai. me keval janna chahta hu anyatha mat lena...

D.S.BHATI 31 मई 2010 को 4:34 pm

ADALAT ME KIS KITAB PAR HAATH RAKH KAR SHAPATH LETHE HE IS SAWAAL KO APNE TAAL DIYA.

बेनामी 12 जून 2010 को 4:52 pm

adalat wala sawale ka jawab bhi do sir

बेनामी 12 जून 2010 को 5:01 pm

sir me apse pochna chanta hu ki jamin mata ka rup kesa hai ?

Ashok sonana 18 जनवरी 2011 को 10:36 am

see original jagathitkarni
click here

insaan 5 अगस्त 2011 को 12:49 pm

aap duniya ko gumrah karana chhod do tumhari saari asliyat to kitaab jagathitkarni me jaahir ho chuki hain deri hain to sirf duniya le samajane ki aur main daave ke sath kaheta hoon ki tab ravan ki tarah tumhara bandovast kar diya jayega jay dhartimata

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insaan 5 अगस्त 2011 को 1:05 pm

lavanya aapjanne ko bahut utsuk hain yeh jankar achcha laga lekin agar real maim aap kuchh jaanana hi chaahati hain to pls aur pls aap ek baar yeh kitaab avashya padhe pls kitaab jagathitkaeni or visit at www.jagathitkarni.org

insaan 5 अगस्त 2011 को 1:05 pm

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manoranjan singh 7 अगस्त 2011 को 1:14 pm

Mr. sanjay sen sagor aapne abhi tak sirf jain dharm ke mukhote ko hi jaana hain. jis din tumhe asaliyat malum padegi tab shayad zinda rahne par bhi sharm aayegi. pls visit at www.jagathitkarnioriginal.com

बेनामी 22 अक्तूबर 2011 को 10:32 pm

aap ek bar jagathit karni jaroor padhe.

बेनामी 22 अक्तूबर 2011 को 10:35 pm

sir adalat wale swal ka javab kyo nahi de rahe ho.me janna chahta hu.