चाह गई, चिन्ता मिटी

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सुख और दुख दिनो प्रचलित शब्द है। सभी सुख चाहते है, दु:ख कोई नही चाहता । प्रत्येक प्राणी सुख से जीना चाहता है, उसे दुख अप्रिय है।

प्रशन उठता है किसे सुख माने किसे दुख ? झोपडी और फुटपाथो पर जिन्दगी जीने वाले अगर दुखी है तो क्या महलो मे रहने वाले सुखी है ? जिन्हे भरपेट भोजन, तन ढकने को वस्त्र एवम सिर छुपाने के लिए जगह नही है वे इन भोतिक साधनो की प्राप्ती के अभाव मे दु:खी है। दुसरी और जिनके पास महल, नोकर-चाकर, धन-दोलत सब कुछ है, वे भी सुखी नही है। उनके घर मे पकवान बनते है किन्तु वे डॉक्टर के आदेशानुसार सुखी रोटी,बिन चक्कर चाय,का ही सेवन कर पाते है। भोग की प्रचुर सामग्री होते हुऐ भी उनमे भोगने की क्षमता न होने के कारण वे दु:खी है। रात को नीनंद नही आती, दिन को चैन नही मिलता।

कल जिसके पास कुछ नही था उसे यदि आज सब कुछ मिल जाऐ तो क्या वह सुखी हो जाएगा ? मेरी समझ मे उसका दु:ख मिटने की अपेक्षा तृष्णा के कारण और बढेगा। लालसा का अन्त नही है और ईच्छाऐ आकास के समान अनन्त है। यह मिला वह चाहीऐ और फिर वह, फिर वह । इस "ओर" का कही अन्त मुझे दिखाई नही देता।

कभी कभी मै सोचता हू कि अभाव मे दुख है और अति मे भी दु:ख ! समभाव मे सुख है। सन्तोष और सयम के बिना सुख सम्भव नही है। सुख का अकन मन करता है। पदार्थ अथवा भोतिक सामग्री अपने आप मे सुख दुख का कारण नही है बल्कि उनके उनके साथ जुडा हमारा मन ही सुख-दुख का भ्रम महसुस करता है।

बात सुख दु:ख की नही, बल्कि सुख्-दुख महसूस करने की है। जिनका दृष्टिकोण निराशावादी बन गया है, जो मन को सयमित नही कर पाते, उनके पास सब होते हुऐ भी दुख है। इसके विपरीत जो आशावादी है सयमी है और तृष्णा पर अकुश लगाने मे समर्थ है उनके पास कुछ नही होते हुऐ भी सब कुछ है।

हम चिन्तन करे। आत्म चिन्तन सुख का कारंण बनता है। इसलिऐ कवि कि एक पक्ति याद आ रही है -

"चाह गई,चिन्ता मिटी।" जिसने इच्छाओ पर अकुँश कर लिया वह सुखी है।हर परिस्थिति मे वह प्रसन्न है। मन के चचंल घोडे पर लगाम लगाकर जो आत्मा मे स्थिर है वह सदा सुखी है। दुनिया जिसे दुख मानती है वह उसे भी सुख मे बदल लेता है।


आप अपने मनुष्य जीवन का यापन बडे ही सरलता एवम शुद्धता पुर्वक कैसे करे ? इसके लिऐ महापुरुषो को पढना समझना पडेगा। उनके जिवन से सीख लेनी चाहिए। कैसे और कहॉ से? तो बस यहॉ पर-" हे प्रभु यह तेरापन्थ पर आचार्य महाप्रज्ञ", को पढने के लिऐ क्लिक करे।

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परमजीत बाली 10 अप्रैल 2009 को 12:51 am

बहुत सुन्दर विचार प्रेषित किए है।धन्यवाद।

श्यामल सुमन 10 अप्रैल 2009 को 6:54 am

कहते हैं कि-

तल्ख-ओ-शीरी बेतकल्लुफ जिसको पीना आ गया।
मैकशो पीना तो पीना उसको जीना आ गया।।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
मुश्किलों से भागने की अपनी फितरत है नहीं।
कोशिशें गर दिल से हो तो जल उठेगी खुद शमां।।
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com

संगीता पुरी 10 अप्रैल 2009 को 11:18 am

सुख और दुख कोई चीज ही नहीं ... सिर्फ महसूस करने का फर्क है ... बहुत अच्‍छा लिखा आपने।

अजित वडनेरकर 11 अप्रैल 2009 को 3:01 am

बहुत सुंदर बंधु...बेबाक लिखते हैं आप। रविजी के ब्लाग पर आपकी टिप्पणी देखी। हम भी बीते दो बरस से रोज ही लिख रहे हैं...:)
कभी आकर देखिये ...पसंद आए तो हमसफर बनें...
शुक्रिया