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आप कोन है यह कोई सवाल नहीं है.

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आप कोन है यह कोई सवाल नहीं है।
It does not matter Who you are........


May be you are king of world


May be you are most dangerous in वर्ल्ड

May be you are an independent one...
May be you can rule other or rule the world
May be you are most lovable by others...
Either you are a Gentleman...
or most DANGEROUS killer of the world...
But the fact is this..........












When you are at home........











Wife is wife...



Dose not matter who the Hell are you...

अदने से आदमी के ऊपर टनो शब्द उडेले जा रहे है किन्तु शब्दो के निचे दबा आदमी जिन्दा है

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शब्द-अविष्कार
मै आजकल शब्दो के महासमुन्द्र मे डूब रहा हू। कुछ समय से हिन्दी ब्लोग जगत के भिष्मपितामाह कहे जाने वाले श्री ज्ञानदत्तजी नये शब्द-अविष्कार करने की ठान बैठे है। कुछ शब्दो को आम जनता के लिए खोलकर पान्डेजी सुकुन भरी ब्लोगेरी कर रहे है। उनका यह इवेन्ट कब तक कम्पलिट होगा यह तो बहृमाजी को पत्ता है या स्वय पान्डेजी को।ज्ञान दतजी हमेसा नऍ शब्दो की जुगाड मे रहते है। वो नये शब्दो को भू-भाग पर लाना चाहते है।

उन्होने नई शब्द सरचना की कोशिस की । आप देखे वो अब तक कोन-कोन से नए शब्दो को पाठको को पेल चुके है।
* इण्टरनेटीय डोलची
* टंकियाटिक पोस्ट
* चिठेरे लुंगाड़े
* मैं नये शब्द तलाश रहा हूं – बड़े और गरुह शब्द नहीं; पर नयापन लिये सहज ग्राह्य शब्द। लगता है कि पुस्तकों की ओर लौटना होगा। हिन्दी पुस्तकों की ओर।
अगर आपको पाठक बांधने हैं तो मौलिकता युक्त लिखें या फिर अश्लील। दुन्नो नहीं है तो काहे टाइम खोटा किया जाये।
* साइबरित आप को नया शब्द लेना होगा उसके लिये। क्या है वह? साइबरित्य है?
खैर कोई बात नहीं अगर आपको "साइबरित्य" शब्द पसन्द नहीं आया। नया शब्द गढ़िये। असल में आपको नया शब्द गढ़ना ही होगा। एक नया फिनॉमिना पुराने शब्द से समझाया नहीं जा सकता!
* डिसिप्लिनाचार्यों
* चिरकुटई
* पिल
* ठेलिये

ब्दो के भवर मे आम आदमी इतना फ़स चुका है कि अब वो डरने लगा है। आदमी के आगे-पिछे, उपर निचे, दाए-बाए शब्द ही शब्द है।
सुबह उठते ही टीवी खोलो तो शब्द। आधी रात को निन्द उचट जाए, टीवी खोलो तो शब्द हाजिर। समाचार पत्र देखो तो वहा भी शब्द कुण्डली मार कर फ़ुफ़कार रहा है। ऎसा लगता है कि अदने से आदमी के ऊपर टनो शब्द उडेले जा रहे है। इतना शब्द वजन आदमी पर डाला जाए तो बेचारा आदमी घुटकर तडफ़ तडफ़ कर मर जाएगा। पर ताजुब है कि इतने इतने शब्दो के निचे दबा आदमी जिन्दा है। शब्द फ़ैकना लिखाडो की मजबुरी है झेलना आम आदमी की। आम आदमी को अर्थसयोजन से कुछ प्रयोजन नही है, न सन्दर्भ से, न शब्दो के प्रसग से मतलब है, न शब्दो के भाव से, नेता हो या कवि रेडियो जोकी हो या समाचार वाचक, चिठ्ठा लेखक हो या चिठ्ठी लिखने वाला नेता या मन्त्रि सबके पास केवल शब्द है।

एक दिन तो हद हो गई मेरा मोबाईल घनघनाया. मैने उठाया. उघर से एक युवक की आवाज (शब्द) आ रही थी- "हाय! आप बहुत क्यूट लग रहे हो . मुझसे दोस्ती करोगे ? ". *शब्द सुनते ही घबराहट मे मोबाईल छूटकर जमीन पर गिर गया। जमाना बडा खराब हुआ पडा है जी! आदमी से दोस्ती के नाकारात्मक अर्थ भी हो सकते है। शब्दो का क्या ठीकाना.

र पल हर घडी इतने शब्द की मै निशब्द होना भूल रहा हू। मेरी भी मजबुरी है क्यो की मेरा धन्धा ही शब्दो का है। जिन्हे मै सलाह दे रहा हू वह भी शब्द प्रपच है। जिसे भाषण सा प्रवचन कहा जाता है वह शब्द की माया है। यहा तक कि कविता, कहानी, उपन्यास शब्दो की जादुगरी है।
यह जो मै लिख रहा हू शब्दो का करतब है। कोई पढे ना पढे मेरी बला से।
मेरे एक परिचित मेरा लेख कभी नही पढते। एक तो मै उनसे पुछता या पढने का आग्रह करता नही। पुछ लिया तो कहेगे- "सारी! मै व्यस्त था।" "किस दिन छपा था ?" हॉ, उनकी कोई किताब छप जाए तो जबरन थमा जाएगे, और फ़ोन कर पूछेगे भी-" कैसी लगी ?" मै उनसे कैसे कहू कि वहॉ मात्र शब्दो की बाजीगरी है। ताजुब होता है इतने-इतने शब्दो की जरुरत किसे है ?

क दिन एक कार्यक्रम मे गया बोलने कि मेरी जरा भी ईच्छा नही थी। मै दो धण्टे ढेरो शब्द सुनता रहा। हद तो तब हो गई जब अन्त मे मुझसे कहा गया-"आप दो शब्द बोल दे!" शब्द की ऎसी खुजली मची की मै दो के बजाय दो हजार शब्द बोल गया। पाच-सात शब्द तोडको ने सैकडो शब्द ढाई घण्टे मे उडेल दिऎ। 100-125 सुनने वाले तो शब्दो के वजन तले इतना दब गऎ की बैठे-बैठे कुर्सी पर ही लुडक गऎ।
बाद मे सोचा, इन शब्दो की न मुझे जरुरत थी न श्रोताओ को। क्या शब्द के बिना जीवन, जीवन नही होता. ?
जकल एक शोघ पत्र तैयार कर रहा हू शब्द की उत्पति कहा से हुई। प्रथम शब्द किसने बोला। यही शोघ का विषय है। इस शोघ के लिए मुझे लाखो शब्द की जरुरत पडेगी। शब्दो का भण्डार जमा करके मे समझाऊगा कि शब्द क्या है ?
हालाकि इसका यह अर्थ नही की मै शब्द समझ गया हू। मुजे केवल दुसरो को समझाना है।
अपने आपको  औरो से श्रेष्ट "शब्द-लिखाडीया" दिखाने के लिऎ शब्दो की कान खिचाई  करना फ़ैशन बन पडा है,मुह हिन्दी का-टाग अग्रेजी की,कभी मुह भोजपुरी का और टाग हिन्दी की और पुछ अगेजी की। भाई यह कोनसा शब्द सर्जन है ?
कहते है- बिटवा! (बेटा) इबे (अब) तु कन्फ़ियुजीया(भटकना) गया है। जी! मै शायद ऎसे हजारो नये शब्द सर्जना से डर गया हू ।
कैसे कैसे शब्द होते है। शब्दो मे भी कई जातिया है। रुलाने वाला शब्द, हसाने वाला शब्द, कोई डरानेवाला शब्द, कोई शरीर मे रन्ग तरन्ग रोमाचित करने वाला शब्द, सेक्सी शब्द। इसमे सबसे खतरनाक गाली-गलोज वाली शब्द-माला है। कुछ वर्षो से गालिया देने वाले शब्दो का जोर शोर से विस्तार और सर्जन दोनो एक साथ हुआ है।
सोचता हू शब्दो को विश्राम देकर मोन व्रत रहने के प्रयास करके देखु शायद लोग सुखी हो जाए.

नोट यह मेरी सोच है इस लेख को  मेने व्यगात्मक शैली मे लिखा है। आदरणीय ज्ञानदतजी की नई शब्द सजृना की सोच ने मुझे लिखने के लिऍ प्रेरित किया है। इसे पढते समय मन हल्का बनाए रखे। क्यो की इसमे जो भी नाम सन्दर्भ के तोर पर लिए गए है वो हमारे आदरणीय है। फिर भी कही कोई बात से कष्ट हो तो मै क्षमा चाहता हू।
मुम्बई टाईगर

धनचक्कर गुरु हम स्वय है।

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 GURU
फो पर सारथी वाले शास्त्रीजी से बातचीत हो रही थी। शास्त्रीजी ने पुछा-" ओर धन्धा-पानी कैसे चल रहा है ? " 
मैने कहा-"गुरुदेव मन्दा है।"  
शास्त्रीजी ने राय दी क्यो ना आप किसी अदद ज्योतिष गुरु को पकडे, और कुण्डली बताए।" 
मैने विस्मय भाव से कहा- "गुरु! इसके लिए भी "गुरु" बनाना पडेगा ?" 
अक्सर टीवी मे ज्योतिषगण चोबिसो घण्टे कुछ ना कुछ समझाते ही मिलते है। मुझे लगा अब इन महाज्ञानीयो से बच पाना नामुमकिन ही है।
लतः मै अपनी जन्म कुण्डली समेत एक लेपटॉपधारी पन्डितजी की दुकान पर गया तो वह उल्ट-पल्ट कर बोलते गए- " वत्स तुम्हारा फेस देखकर ही मालुम दे रहा है कि गुरु के प्रभाव का जातक होने के चलते मामला अत्यन्त धातक है, अगले माह से गुरु वक्रि है, आगे सकट ओ‍र भी प्रचन्ड है, आठ महिने के बाद गुरु फिर से अपनी मूलमार्गी चाल मे लोट आएगा, उसके बाद ही शुभ फल देगा, सब ग्रहो की चाल का परिणाम है बच्चा।" अगर अनिष्ट फल से बचना चाहते हो तो अपने घर पर पुजा रखवा लो।"
मै मन ही मन बोला,-" पण्डितजी महाराज! ग्रहो की चाल का तो मुझे पता नही, लेकिन आपकी चाल जरुर मेरी समझ मे आने लगी है।" 
बहराल, मै इतनी जटिल विधा पर शका करके पाप का भागीदार नही बनना चाहता था। सो चुप ही रहा। धर्म मै विश्वास जरुरी है। फिर भीतर भीतर कही यह डर था कि जब बडे बडे तक अपने गुरुओ की वक्रि चाल के लपेटे मे आ जाते है तो मेरी क्या ओकात?
हा गया है प्रबल गुरु मिल जाए तो फलदायी है अन्तथा कष्ट ही कष्ट है। 
बहराल, ये पण्डितजी तो गुरुओ के भी गुरु निकले। 
झटपट उन्हे दक्षिणायित किया और मै वहॉ से फुट लिया।
पुनः घर आकर 29"  बुद्धु बक्से (टीवी ) का रिमोर्ट  लेकर चैनलो के मनके जपने लग गया हू। किसी नए गुरु की तलास मे  हू। 
सा भी नही है कि मेरा "गुरु-चोट की चपेट मे आना पहळी बार हुआ है, विघाज्ञान का श्री गणेश गुरुजी के डन्डे से ही हुआ था। आज भी हाथ की हथेली पर तकदीर की लकीरो से ज्यादा सन्टी के निशान ज्यादा है।  
जब भी मेरे मित्र जयपुर वाले आशिषभाई खण्डेलवाल पुछते है कि -"कहो गुरु", का हाल है ?" मुझे तत्काल अपने स्कुल के गुरुदेवगणो की तुडाई याद आ जाती है। उस टाइम नारा लगाए करते थे -

"छत्रन गुरु की क्या पहचान, 
हाथ मे सोटा, मुह मे पान।"

गुरु गाथा मे वे नागपुर वाले गुरुजी भी आते है, जिनकी लाठी आज भी बीजेपी वालो को सियासत की वैतरणी फन्दवाने के काम आती है।

इस दुनिया मे एक से एक गुरु हुए है और एक से बढकर एक गुरुघन्टाल भी हुए है।
सच्चे भी कच्चे भी।  
धर्म गुरु भी।  
अधर्म गुरु भी।  
डान्स के गुर।  
रोमास के गुरु।  
म्यूजिक के गुरु।  
अखाडे के गुरु।


 खैर, मेरे ताजा-ताजा उपजे कनपुरिया धनचक्करगुरु ने मुझे  गुरुमन्त्र दिया है कि फसना ही चाहता हू तो "टेक्स गुरुओ" के चक्कर मे फसू अथवा शेयर गुरु की चरण मे जाऊ।

योग गुरु की बॉहे थामू। मैनेजमेन्ट गुरु से कला सीखू।  आज बाजार मे फैशन गुरु से लगाकर ई गुरु
ब्लोग गुरु, तमाम   ब्रान्ड के गुरु उपल्ब्ध है। 

 इस लेख को व्यग के रुप मे पिरोया गया है।
जाने अनजाने किसी को कष्ट हुआ हो तो मै  क्षमा मागता हू।

बाबा श्री समीरानन्दजी महाराज ने ताऊ को दिया निम्बु मिर्च

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ताऊ ने लगाया निम्बु मिर्च
स्वर्गलोक मे कल रात बाबा श्री समीरानन्दजी महाराज गहरी निद्रा मे सो रहे थे । बाबाजी ! सपना देखते है, कोई चिठ्ठाकार दोनो हाथ से धोती पकड कर व बाहो मे लठ लिए हाफता भागता स्वर्गलोक कि ओर आ रहा है।  पिछे लोगो का हुजुम उस पकडने के लिए भाग रहा है।  
बाबा श्री समीरानन्दजी महाराज ने अपनी दिव्यदृष्टि लगाकर देखा। अरे! यह तो अपना शिष्य  हिन्दी का चिठठाकार ताऊ है। ताऊ से बाबा श्री समीरानन्दजी महाराज ने पुछा -"क्या बात है ताऊजी ?" बडे ही चिन्ता के भाव लिए मेरे दरबार मे आऐ हो ?" और यह लोग कोन है जो तुम्हारे पिछे लगे है ? और क्यो?"
ताऊ ने अपने गले मे पडे गमचे से पसीना पुछा और बोला- "महाराजजी! यह सभी असन्तुष्ट प्राणी है।  मेरे तेरह महीने के ब्लोग कार्यकाल के प्रसिद्धि एवम सफलता को कुछ लोग पचा नही पा रहे है। इनकी बदहजमी यहॉ तक पहुच गई की मेरे एवम "ताऊ डाट इन" के खिलाफ मोर्चा खोल बैठे है। 
बाबाजी! आपने मुझे यह किस झमेले मे डाल कर आप स्वर्गधाम मे आराम फरमा रहे है।"
बाबा श्री समीरानन्दजी महाराज  ने चुटकि बजाई तभी अप्सराए हाजिर हुई। 
समीरानन्दजी महाराज-  अप्सराओ कि और मुख्खातिब होते हुऍ बोले -" यह हमारे सेले ताऊ है। बहुत दुर धरती-लोक से आऐ है। थके प्यासे है। पहले तो तुम एयरकन्डीशन (A/C) चालु कर दो,
फिर दो गिलास शरबत हाजिर करो।" अप्सराए शरबत लाने चली गई।
अब बाबा श्री समीरानन्दजी महाराज  ने अपने मुख से अमृताशब्दो कि बारिश करते  हुए ताउजी से कहते है-" देख ताऊ! तुमने "ताऊ डाट इन"  को एक साल चार महीने मे जिस बुलन्दियो पर पहुचाया है यह बात मुझे भी हजम नही हो रही है  ! तो इन तुच्छ मानवो कि क्या बिसात जो बिना जले रह सकते है। उन्हे जलना तो था ही। यह "जलशी" का किडा तो प्रत्येक मानव मे मैने फिट कर रखा है। और टेशन नही लेने का ताऊ! 

कोई रेडीमेड सफलता तो मिली नही तुम्हे , चिठठाजगत मे रात दिन कि कडी मेहनत, सकारात्मक, रचनात्मक सोच के बाद तूम्हे यह  मुकाम हासिल हुआ है। तेरी "सत्ता" स्वीकार करने मे ऐसे लोगो को कुछ वक्त लगेगा, तुम्हारी "बादशाहत" को एक ना एक दिन स्वीकार करना ही करना है ताऊ।" ताऊ इसका मुलकारण है तुमने कभी भी "चिठ्ठे" का बेजा फायदा नही उठाया, तुम्ह ने शब्दो का स्तेमाल क्षिक्षा स्वरुप किया। छोटी छोटि आम मानवीय जीवन मे घटने वाळी  घटनाओ कुरितियो  को पात्रता के रुप मे अपनी आत्मा की  भाषा मे पिरोकर कुशल शिक्षाप्रद अपने ब्लोग पर अभिनय कहू या मचन कहू ताऊ वो तूमने किया है।" 
हुका पीते हुऐ ताऊ - बाबा श्री समीरानन्दजी महाराज से पुछते है- "महाराज! इब इसका इलाज किया और कब तक ? "
बाबा श्री समीरानन्दजी महाराज -"अरे ताऊ! कै बावली बूस कि तरह उतावाला होवे छे, यह सक्रमण काल छे समय पर ठीक हो जावेगा।" थोडा धिरज बान्ध ताऊ!  
समीरानन्दजी महाराज -"ताऊ!  फेम (प्रसिध्द् )बनने के बाद  व्यक्ती को अपने लिए नही पब्लिक के लिए जीना पडता है।  फेम (प्रसिध्द्)  व्यक्ती को यह छोटी सी किमत तो चुकानी ही पडती है। 
ताऊ-"महाराजजी! मै फैमस कब हुआ मुझे तो पता ही नही चला ?-" 
तभी एक अप्सरा शरबत लिए बाबा समीरानन्दजी महाराज के दरबार मे हाजिर होती है। ताऊ घटा-घट शरबत हलक के निचे उतार देता है।! 
मुस्कराते हुए अपने दिव्य एवम ओजस्वि शब्दो का इस्तेमाल करते हुए  बाबा श्री समीरानन्दजी महाराज फरमाते है-" ताऊ!  20 जून 2009 को आपने एवम मेरा प्रिय बालशिष्य आशीषजी खंडेलवाल ने   "ताऊ डाट इन" पर 1०,००० वीं टिपणी  की घोषणा ने तुम्हे नम्बर वन पर ला खडा कर दिया। बस लोगो कि ऑखो मे किरकिरी पैदा होने के कारणो मे यह भी एक मुख्य कारण है।"

ताऊ-" इस नजर टोकार के लिए कोई इलाज मन्त्र सन्त्र ?"

बाबा समीरानन्दजी महाराज -" मेरे प्रिय शिष्य मैने आजकल टोटके टाटके करना बन्द कर दिया है। पर तुम मेरे प्रिय हो ताऊ, इसलिए जाते समय बाहर के कक्ष मे   "हे प्रभु" ध्यानास्थ है  उन्ह से कहो वो तुम्हे मेरे द्वारा अभिमंत्रित "निम्बु- मिर्च देगे वो "ताऊ डाट इन" पर अगरबत्ती का धुप कर शुक्रवार को मेरा मनन कर टॉग देना। ताकी बुरी आत्माओ का छाया "ताऊ डाट इन" पर ना पडे।"
ताऊ -" बाबाजी आपने मुझे शान्त कर दिया अब मुझे जाने की आज्ञा प्रदान करे, मगल पाठ सुनाए। "
बाबा समीरानन्दजी महाराज  मगल पाठ देते हुऐ धरती-लोक के लिए निम्बु मिर्ची के साथ ताऊ को  रवाना करते है।
बाबा समीरानन्दजी महाराज का मगल पाठ

" मैं दीपक हो के बुझ जाऊँ, ऐसा हो नहीं सकता
मैं तूफानों से डर जाऊँ, ऐसा हो नहीं सकता
न मैने तैरना सीखा, मगर है हौसला दिल में
मैं दरिया पार न जाऊँ, ऐसा हो नहीं सकता.  "


ताऊडॉट इन कि कुछ खबरे
असली ताऊ कौन ?
आज साल 2008 का अंतिम दिन है ! आज मुझे हिंदी के सार्वजनिक ब्लागिन्ग में कुल 7 माह और 9 दिन हुये हैं. इस बीच  आज की पोस्ट सहित कुल 144 पोस्ट इस ब्लाग पर मेरे द्वारा लिखी गई ! और 56 पोस्ट मग्गा बाबा पर ! इस तरह कुल दो सौ पोस्ट इस अवधि में लिखी गई ! और दिसम्बर 08 मे पूरी 31 पोस्ट लिखी गई ! यानि प्रति दिन एक !
Wednesday, December 31, 2008 at 12:11 AM Posted by ताऊ रामपुरिया


महाबाबा ताऊआनंद : हे मेरे परम प्रिय ब्लागरों, अपना संपुर्ण ध्यान लगाकर सुनो कि हम कैसे ब्लागरत्व को प्राप्त हुये. बडा दुरुह और कठिन कार्य है. पर भक्त जनों जिसने एक बार ब्लागरत्व प्राप्त करने की ठान ली. वो भला बिना पाये विश्राम कैसे करेगा?
Saturday, June 6, 2009 at 8:00 AM Posted by ताऊ रामपुरिया


आज ताऊ के  ब्लाग की उम्र एक साल हो गई है यानि आज ताऊ की वर्षगांठ है…अरे नही….. नही……ताऊ की नही ..इस ब्लाग की वर्षगांठ है.  इस एक साल मे ताऊ ने  फ़ुल साईज 281 पोस्ट लिखी. जिन पर ताऊ को करीब 8450 कमेंट प्राप्त हुये.

आज मैं आपका हृदय से आभारी हूं कि २० जून २००९ को आपने इस ब्लाग पर १०,००० वीं टिपणी करके आपका स्नेह और आशिर्वाद मुझे दिया. मैं अभिभूत हूं. जिसने एक भी टिपणी दी है उनका भी मैं आभारी हूं. बिना उनकी एक टिपणी के भी यह अधुरा ही रहता.
Monday, June 22, 2009 at 2:09 PM Posted by ताऊ रामपुरिया

आशीष खण्डेलवाल (Ashish Khandelwal)
June 22, 2009 5:48 PM
@ Makrand, सभी चिट्ठों में से यह पता लगाना तो काफी श्रमसाध्य कार्य है कि किस-किस चिट्ठे पर दस हजार टिप्पणियां हो चुकी हैं। प्राप्त जानकारी के अनुसार उड़नतश्तरी वाले समीर लाल जी और मानसिक हलचल वाले ज्ञानदत्त जी अभी तक इस दस हजारी क्लब में शामिल थे और लेटेस्ट व धमाकेदार एंट्री ताऊजी की हुई है। अगर किसी साथी को दूसरे नाम पता हों तो बताने का कष्ट करें।

अब आपको बजट वाले दिन हिन्दी के धुरन्द्र चिट्ठा-लिखाकारो के पास लिए चलता हु।

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अर्थपूर्ण-अर्थहीन

हमारे देश मे बजट ने कुछ कुछ उत्सव का स्वरुप ले लिया है। लोग कयास लगाने लगते है। वे भले अर्थशास्त्र की बारीकियो मे न जाए पर वे इस विमर्श मे जरुर जुट जाते है कि  बजट उनके रोजमरा  के जीवन पर क्या असर डालेगा, उन्हे  कितना सुखी बनाएगा। वे एक विचित्र मनःस्थिति से गुजरने लगते है। बजट से लोगो का यह जुडाव आश्चर्यजनक है। एक तरफ तो लोग धर्न-कर्म और सस्कृति मे खुब आस्था जताते है, जिसमे 'धनसचय और भोतिकता को निषेद किया गया है। लेकिन  दूसरी तरफ वे इस बात को लेकर चिन्तातुर भी रहते है कि कही उनका स्तर कम ना हो जाए। वे इस होड मे पिछड न जाए। मिडल क्लास के जो लोग सत्सग मे रमे रहते है  वे भी इस बात को लेकर सतर्क रहते है कही उनका बजट न गडबडा जाए।
एक व्यगः अर्थपूर्ण-अर्थहीन बजट पर

पने देश  मे ज्यादातर पढे लिखे लोग बजट के मामले मे विद्धवान ही होते है।  हॉलाकी उनको कोई सरकारी फार्म भरने या एप्लिकेशन लिखने मे पसीना छुट जाता है, फिर भी बजट पर वे अपनी कोई रॉय अवश्य रखते है।जैसे हर हिन्दुस्थानी बीमारी के मामले अपनी कोई न कोई राय जरुर रखता है। भले ही वह डाक्टर, कम्पाउन्डर ना हो।
इस बार बजट दो बार हो गया। आम तोर ब़जट एक बार ही होता है। लेकिन इसके विद्धवान कई किस्म के होते है।
अब आपको बजट वाले दिन हिन्दी के धुरन्द्र चिट्ठा-लिखाकारो के पास लिए चलता हु। 

ज्ञानदत्तजी, अपने दफ्फतर मे टीवी खोल बैठे है। उन्हे कल ऑफिस  अर्जेन्ट डिस्पैच रजिस्टर तैयार करना था ,लेकिन वे बजट सुन रहे थे। अब हम सभी जानते है कि उन्हे इस राष्ट्र कर्म के बीच टोका नही जा सकता।
मेरे एक ब्लोगर मित्र आशिष खण्डेलवालजी  घर से कह के जाते है कि आम बजट है देर से लोटूगा, और राजमन्दिर मे नाईट शो देखकर लोटते है।
ये सब बजट के विद्धवान है, जानते है कि इसे रोजमरा की जिन्दगी मे कैसे इतेमाल करना है।
कुछ लोग बजट  की तैयारी वित्तमन्त्री से भी पहले से करना शुरु कर देते है। वे सारे सम्पर्क टटोलते है, उस दिन कही कमेन्ट या लेख छप जाऍ, किसी पैनल-डिस्कशन मे नाम आ जाए। किसी टीवी चैनल पर कोई स्लॉट मिल जाऐ।
ताऊ! वितमन्त्री को बोलते हुऐ सुनते है कि कमॉडीटी ट्राजैक्शन पर टैक्स हटाया जाएगा। वह
राज भाटीयाजी की और मुह कर के गम्भीर स्वर मे बोलते है, इसमे मिडल क्लास को बहूत फायदा होगा। असल मे तो ताऊ को पता ही नही है कमॉडीटी ट्राजैक्शन  टैक्स चीज क्या है,  लेकीन सोचते है यह बाजु मे बैठा बन्दा क्या जानता होगा।
भाटिया़जी, सचमुच कमॉडीटी ट्राजैक्शन  टैक्स  के बारे मे नही जानते, पर ताऊ कि बात सुनकर चिढ जाते है, रोब गाढ रहे है । बडे आऐ है अर्थशास्त्र झाडने। भटियाजी और ध्यान से टीवी सुनने लगते है। अचानक सुनते है कि "इफ्रास्ट्रक्चर फॉइनैस कम्पनी" बनेगी। यह बढिया है भारी भरकम नाम है। 'इफ्रास्ट्रक्चर' मतलब ढॉचा-मतलब सडक-मतलब-बिजली,बन्दरगाह। वे सब भी जानते है अच्छा मोका है। वे ताऊ कि और मुह कर के बोलते है -' कमॉडीटी ट्राजैक्शन तो खैर ठीक है, मगर इफ्रास्ट्रक्चर फॉइनैस कम्पनी से ज्यादा लाभ होगा। शाम दोनो ही भुल जाते है कि  उन्हे बजट के किस हिस्से ने प्रभावित किया।
नेहरुवियन इकॉनमी के दिन बीते, इन्दिरा का समाजवाद पीछे छूट गया, आर्थिक उदारिकरण और वैश्वीकरण के भी लगभग दो दशक पुरे होने जा रहे है। लेकिन मध्यवर्ग का आदमी आज भी बजट मे अपनी वही दो पुरानी चीजे ढूढता है- इनकम टैक्स की स्लैब बढी या नही और ट्रेक्टर, टीवी,-टुथपेस्ट सस्ता हुआ या नही।
पिछले पचास सालो से अगर कोई निशिचत है तो वह है सिगरेट पिने वाला, तम्बाकु खाने वाला। क्यो कि उसे पता है कि बढेगा ही बढेगा ।


 
देश के हर नागरिक पर 1177 रुपयो का विदेशी कर्ज
देश के हर नागरिक पर लगभग 1177 रुपये का विदेशी कर्ज है। चाहे वह नवजात शिशु ही क्यो ना हो। यदि घरेलु कर्ज को जोड ले तो यह रकम हर भारतीय पर लगभग 29800 रुपए हो जाएगी।



 
पाकिस्थान से भारत को वसूलने है 3०० करोड
भारत पिछले ६० वर्षो मे पाकिस्थान से 3०० करोड नही वसुल पाया। दिलचस्प बात है कि इस राशि का भुगतान 1950-51 से ही लम्बित है।
इस बात की एक रपट गत वर्ष सुरेसजी चपलुनकर जी ने अपने ब्लोग पर भी दी थी।



विशेष-:यह एक व्यगात्मक सोच थी इसमे जिस किसी का भी नाम उल्लेखित है वे भारतिय जनमानस की भुमिका मे मेर हिरो है जो आदरणिय है।
कही भी आपका दिल दुखाया हो तो क्षमा चाहता हू,
आभर जी
हे प्रभु यह तेरापन्थ
मुम्बई टाईगर

लाइए दे दीजिए डॉलर!!!!!

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हे प्रभु ने सुना ओबामा और जरदारी मीट को।















धर जरदारी साहब अमेरिका पहुचे और ओबामा से मिले। पहली बार।
बोले-"लाईऐ डॉलर दीजिए।" ओबामाजी हैरान परेशान। बोले- डॉलर ?  डॉलर किसलिऐ ?
सयोग से वहॉ हिन्दुस्थानी हे प्रभु होते तो तो यही कहते कि जी,मुह दिखाई मान्ग रहे है। पर कायदे से मुह दिखाई तो जरदारी साहब को देनी चाहिये थी। पर खैर, वहॉ वह था नही। सो जरदारी साहब ने कहा-"परम्परा, रवायत।
जब भी कोई पाकिस्तानी-प्रधानमन्त्री, राष्ट्रपति अमेरिका आता है तो बातचीत होती है ,वादे होते है, जिसके बाद चलते हुऐ वह डालर मॉगता है। क्या-ओबामाजी कि समझ मे कुछ नही आया। जरदारी साहब ने कहा- डॉलर ओर क्या ?
ओबामा ने कहा-"देखिए, डॉलर तो अब हमे  भी चाहिऐ।" मन्दी का दोर है। अर्थव्यव्स्था को फिर से खडा करना है। जरदारी साहब ने कहा-" जी बिल्कुल।" मुझे भी पाकिस्थान को फिर से खडा करना है। लेकिन हमारी अर्थव्यवस्था तो बैठ गई है न-ओबामा ने कहा-इसलिये उसे फिर से खडा करने कि जरुरत है। और वह डॉलर के बिना नही हो सकती। पाकिस्थान भी तो बैठा हुआ है है जी-जरदारी साहब ने कहा- उसे भी फिर खडा करना है। वह भी डॉलर के बिना नही हो सकता।
ओबामा ने कहा-" मै कुछ समझा नही। जरा खुलकर समझाइए। जरदारी साहबको बडा आश्चर्य हुआ कि अमेरिका के राष्ट्रीपति को भी समझने की जरुरत पड रही है। पहले तो कभी नही पडी। बिना कुछ समझे बुझे डॉलर दे देते थे।
उन्होने समझाने कि कोशिस की-देखो जी, पहले तो मुझे ज्यादा समझ नही आता था। फिर बेनजीर के साथ मेरी शादी हो गई। फिर वो प्रधानमन्त्री बन गई। प्रधानमन्त्री बन गई तो, अमेरिका आना ही था। सो जब वे आने लगी तो, मैने यू ही पुछ लिया -"क्यो जा रही हो ?"उन्होने कहा -"डॉलर-लेने।" मेरे से पहले सब लाते रहे, मुझे भी लाने है। हमारे यहॉ सब यही करते रहे है। ओबामा-" ओहो, तो यह आपका धन्धा है-ओबामा को बडा आचर्य हुआ-पर मैने तो सुना है कि आपका धन्धा तो 20 % वाला है। ओह, तो आपने भी सुन रखा है कि लोग मुझे टूवेन्टी परसेन्ट कहते है-जरदारी साहब ने कहा- पर जी वो तो तब था, जब मै प्रधानमन्त्री का शोहर हुआ करता था। अब तो राष्ट्रीपती हू न। लाईए अब दीजिए डॉलर । 
लेकिन क्यो -  ओबामा फिर उसी सवाल पर लोट आऐ। जरदारी साहब को बडा आचर्य हुआ कि  इतना समझाने के बाद भी यह सवाल क्यो? सो उन्होने कहा-" अगर आप क्यो का सवाल उठा रहे है तो वह भी हम समझा देगे, पर पहले डॉलर तो दीजिए। नही। ओबामा ने कहा - पहले आप समझाइए। जरदारी साहब ने कहा-हमने मुशर्फसाहब को हटाकर पाकिस्तान मे डेमोक्रेसी कायम की। बताइए, बिना डालर के डेमोक्रेसी कैसे चलेगी।पर तब तो दिया था-ओबामा ने कहा-जब आपने
डेमोक्रेसी कायम की थी। ओह, हॉ!- जरदारी साहब ने कहा-" दिया तो था, पर मुझे लगा डेमोक्रेसी के नाम पर आप ओर दे देगे।

आखिर डेमोक्रेसी आपकी कमजोरी है न । नही, हमेशा नही-ओबामा ने कहा।
अच्छा-जरदारी साहब ने कहा-फिर मुम्बई पर हमला हुआ। सबने कहा पाकिस्थान से हुआ। हमने सोचा अच्छा मोका है-ऑतकवाद से लडने के लिऐ डॉलर चाहिए। पर तब दिये तो थे-ओबामा ने कहा-ओह हॉ,जरदारी साहब ने कहा- दिए तो थे,पर मुझे लगा और दे देगे। फिर हमने कहा तालिबान आ रही है। पकिस्तान को उनसे बचाना है तो डॉलर दीजिए

पर तब दीए तो थे-ओबामा ने कहा। ओह हॉ- दिए तो थे,पर लगा और दे देगे, आखिर तालिबान आपकी कमजोरी है। खैर, पर अब हमे डॉलर चाहिए। पर क्यो- ओबामा ने कहा। तालिबान से लडने के लिए-लाइए दीजिए डॉलर
अब जाकर करजाई साहब न भी अपनी चुपी तोडी। बोले- दे दीजिए न सर, और थोडे मुझे भी दे दीजिए। आखिर तालिबान से लडना है।
लेखक-सहिराम
नवभारत टाईम्स के सोजन्य से
१५ मई २००९













रामप्यारी जिद कर रही है.. ताई दस रुपया दो ना, चाउमीन वाली नैनो आई है।

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चुनाव मे नोट कि जगह नैनो बॉटी जाएगी।

नेता नोट के बदले नैनो कि चॉबियॉ बॉटते हुए पकडे जाएगे।
वे गरीब के झोपडे कि बजाय गरीब कि नैनो मे बैठकर फोटू खिचवाएगे। 
समाज , नैनो और गैर नैनो वालो मे बट जाऐगा 
"बिलो पॉवर्टी लाइन" कि तरज पर बिलो नैनो लाइन कहा जाएगा।

व्यग के लिए क्षमा


एक रात को आया सपना, नैनो हुई अपनी-हे प्रभु

हरी निन्द्रा मे थे "हे प्रभु"नैनो का ओपचारिक लॉन्स देखते हुऐ हे "प्रभु", गम्भीरता से सोच  रहे थे कि नैनो के बाद की दुनिया यानी हिन्दुस्थान कैसा होगा? "हे प्रभु के" सपने मे आई कुछ आशन्काए मुलाहिजा फरमाऐ।

(1) हे प्रभू घर से निकल सामने वाली सडक पर पहुचते है,यहॉ वहा देखा। कोई नजर नही आ रहा। अरे...यही तो रहता thaa....कहॉ चला गया? तभी नजर अपने दाई तरफ पेड के नीचे पडती है। एक साथ छह-सात नैनो खडी है। मै गाडी के नजदीक पहुचता हू, उसके अन्दर झॉकता हू। एक शख्स गले मे गमछा डाले, दोनो पॉव सीट पर रख, खैनी लगा रहॉ है। मैने इसे पहले कई बार देखा है पहचानने की कोशिश करता हु। अरे तुम भइया तुम...? जी बाऊजी! मै..। और तुम्हारा रिक्शा....? वो तो मैने बेच दिया ये गाडी कल ही खरीदी है।

(2) ताऊ के घर का दृश्य चल रहा है मेरे सपने मै- ताई ताऊ को कन्जूसी के लिऐ ताने दे रही। ताऊ वर्तमान के खर्चो  और भविष्य की जिम्मेदारीयॉ गिना अपनी कन्जूसी को जस्टिफाई कर रहा है। इस बीच ताऊ के घर के दरवाजे कि कुण्डी बजती है। अरे गन्गूबाई (कामवाली) तुम..आज इतनी जल्दी कैसे? ताई वो क्या है ना...आज मेरा घरवाला (पति) मुझे ड्राप कर गया...वो कल ही गाडी खरीदी है...। इसीलिए मै जल्दी आई। ये सुन कन्जूस ताऊ के मन मे खतरे कि धन्टी बजती है इससे पहले ताई मुझे ड्राप कर दे, मुझे नैनो खरीद लेनी चाहिऐ। ताई भी खुश हो जाऐगी, रामप्यारी को स्कुल छोडने के काम भी आ जाऐगी, साथ ही साथ भाटियाजी कि शैखी भी खत्म हो जाऐगी।
(3)  दिल्ली के एक मार्केट मे चॉइनिज नैनो पचास हजार मै मिल रही है, शैलस भारतवासी बखान कर रहे थे-असली नैनो के मुकाबले इसमे कई दिलचस्प फिचर है। पैट्रोल डालने का झझट नही बैटरी से चलने वाली नैनो। किसी भी मोबाईल चार्जर से चार्ज होने वाली नैनो।
शैलश भारतवासी खरीद लेते है। एक दिन दिल्ली ब्लोगर-मिटस मे शिवकुमारजी, लवलीजी, अरविन्दजी मिश्रा, सजय सैन सागर को बैठा कर इण्डिया गेट के दर्शन कराने ले जा रहे थे तभी दरवाजा टुटने कि आवाज सुनाई पडती है तभी लवलीजी बोलती है अरे यह क्या....? इसमे तो थर्माकॉल का दरवाजा है।



(4) ताई का पल्लू पकड कर  रामप्यारी जिद कर रही है..
ताई दस रुपया दो ना, चाउमीन वाली नैनो आई है।

डक पर नैनो की तादाद बढने लगेगी। जाहिर है हादसे भी बढेगे। जिस तरह ट्र्क से ट्रक भिड जाते है उसी तरह नैनो से नैनो भी भिडेगी। ऐसे मे शास्त्रीजी के "सारथी" पर हेडलाईन आम होगी-  
"नैनो से नैनो लडी.....
दिल तो नही मिले,
दो कि टॉग जरुर टूट गई,
नैनो कि टक्कर मे दो ने नैन गवाऐ।"
सभी ब्लोगरो मे नैनो की होड मची हुई थी। ऐसे मे "हे प्रभु" के  सपने मे आकर श्यामलजी सुमन (मनोरमा) (प्रशासनिक पदाधिकारी टाटा स्टील, जमशेदपुर) ने तो अपने ब्लोगर दोस्तो को जो उनके दिऐ मोबाईल नम्बर पर उनकी कविता सुनेगा उन्हे एक नैनो पार्सल करवाने की स्कीम भी बताई (सुमनजी की टिपणीयो के साथा मोबाईल नम्बर लटका हुआ है आप चाहे तो सुमनजी से


"मोबाईल पर कविता सुनो और नैनो ले जाओ"वाली स्कीम मे भाग ले सकते है।

सडको पर चेतावनी लिखी हुई पढ रहे थे हे प्रभु,-
"सडक पर चलते हुऐ अपने नैनो का इस्तेमाल करे वरना नैनो के नीचे आ जाएगे।"
पुराने कपडो के बदले  बरतन देने वाले भी नैनो रखने लगेगे।
पति कि दो पुरानी पैन्ट के बदले नैनो मिल जाएगी।
घरो मे गेस्ट रुम कि तरह ही गेस्ट नैनो रखेगे।

हिन्दी ब्लोग जगत मे टीपणीकारो का भयकर अभाव :व्यग

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दिनाक २४ अप्रेल,( खबरची)

ग्रीष्मलालिन अवकाश,एवम चुनावी धमाल के कारण कई दिनो से हिन्दी ब्लोग जगत मे टीपणीकारो का भयकर अभाव हो गया है। विश्वस सुत्रो के अनुशार कई दिग्ज चिठ्ठाकारो ने तो नया माल (पोस्ट) बजार मे उतराने के लिऐ घबराऐ हुऐ है। खबरची को पता चला है कि एक बडा ब्लोग घराना तो अपनी नियमित ब्लोग प्रोडेक्सन को कुछ दिन के लिऐ स्थिगित करने का मन बना लिया है।

कुछ दिनो पुर्व तक जिस ब्लोगर को थोक बन्द टिपणीया मिलती थी, वो आजा आधे पर आ गऐ है। और छोटे ब्लोगरो कि तो इस"टिपणीया अकाल" से कमर ही टुट गई है।

हमारे सवाददाता के अनुसार कई ब्लोगो पर, पाठको के पहुचने वाला मीटर तो १०० पाठको कि सख्या बताता है, पर टिपणी २-३-या ५ तक सीमीत हो गई है। छोटे ब्लोगरो के तो हप्तो से "पाठक-पहुच" मीटर के कॉटे रुके पडे है। ब्लोगरसरकार के प्रधानमन्त्री श्री ज्ञान दत्त जी पाण्डे ने पत्र्कारो से बात करते हुऐ कहा है की-" स्थिति चिन्ताजनक है समय रहते पीड़ित ब्लोगरो को टिपणियो कि साहयता नही पहुचाई गई तो कई ब्लोगर समय से पहले टीपण्णीयो के अभाव से उजड जाऐगे, इसलिऐ मैने टिपणियामिनिस्टर समिरजी को निर्देश दिया है कि ट्रको से हेलिकोपटर से कैसे भी हो ब्लोगरो को टिपणिया मुहैया कराई जाऐ। जरुरत पडे तो उनके ब्लोग 'उडन-तस्तरी" का ट्राफिक इस और मोडे।"

ब्लोगरसरकार टिपणियो कि कमी नही होने देगी। जरुरत पडी तो महानगरो मे कई महिनो से बन्द पडे

"कॉल सेन्ट्रस" के युवक युवतियो को टिपण्णीयॉ लिख भेजने के काम मे लगाया जाऐगा।" उधर् भारत दोरे पर गऐ टिपणियो के गृह राज्य मन्त्री राजीव भाटियाजी को तुरन्त नेट पर बैठकर गरीबी रेखा के निचे वाले ब्लोगो को तुरन्त टिपणिया साहयता भेजने को कहॉ गया है।

एवम ब्लोगेरिया के प्रतिपक्ष के नेता शास्त्रीजी से भी कहॉ है कि वे बाहर गॉवो कि यात्रा कम करे, एवम टिपणियो का फ्लो बडाऐ। उधर ब्लोगरो कि नई-नई नेता बनी घूम रही रामप्यारी ने मॉग कि

"पाठकपहुच मीटर", एवम 'हिचकी मीटर' ( हिचकी मीटर- किसने कितनी टिपणिया कि ) कि उच्च स्तरीय जॉस कि जाऐ।मीटरो मे लोचा लगता है। उधर चॉन्द को लुटने गऐ हरीयाणवी ताऊ ने आकाशवाणी करते हुऐ वादा किया है -"अब वो रोज कि दस कि जगह २० टिपणीया भेजेगे।" चोखोरबाली कि सुजाताजी पारुलजी, रचनाजी, लावण्याजी, भी इस त्रासदि से चिन्तित है। लवलीजी ने तो ब्लोग पर "फुल" हटाकर अपना छाया चित्र भी टॉग दिया है। ताकि टिपणीकार बिना टिपणी किऐ ना जाऐ खाली-पिली आवक-जावक ब्लोगमीटर फोकट मे ही चलता नही रहे। एकमात्र ब्लोगर अल्पनाजी के वहॉ टिपणियो कि आवाजाही अच्छी है। बैगाणीजी तो अपने मिडिया आफिस अहमदाबाद से कल इसके बारे मे वक्तव्य देने वाले है। कन्नुजी, ई गुरु राजीव ने बिहार के बिहड जग्लो से आदमी के हाथ चिठा लिख भेजा है उसमे उन्होने कहा-" भाई समय रहते लाईन चेन्ज करली-हम लोगो ने, नही तो अभी.................? उधर इस टिपण्णीयो कि त्रासदी कि मार झेल रहे अरविन्द मिश्राजी चाईना से टिपणीया इम्पोर्ट करने के फिराक मे, ब्लोग को और मसाले दार बनाने जा रहे। कोची केरला से शास्त्रीजी ने हमारे खबरी को बताया कि-" टिपणीयो का भारी अभाव् या मन्दी का मुझे पहले से अन्देशा था, मैने इस टिपणीया मन्दी से निपटने के लिऐ ब्लोग मे कई तरह के बदलाव किऐ है। पहला बदलाव मेरा जुना पुराना फोटु बदल डाला, ब्लोग का मुख्य पृष्ट नया डाला, उसी ब्लोग मे मेरा सिक्को के कलेक्शन से जोडा, और तो पिछले कैइ दिनो ऐसे ऐसे विषयो पर लिखता हु कि लोगो को हजम नही होता और गुस्से मे एक दो टीपणी लिख मारते है, और कभी- कभी टिपणीयो मे मै स्वय भी पहुच कर कोटा पुरा कर लेता हू।"

फुरसतिया जी ने लालकिले कि दीवार पर खडे हो कर बताते है - " भाई, हमे कोई चिता नही हमारी सेटिग्स थोडि अलग ढग कि है हमारी ग्राहकी जमी-जमाई है,फिक्स ग्रहाक है। अगर टिपणीयो का यह अभाव दो तीन साल तक भी रहे तो चिन्ता कि कोनोही बात नाही हमारे पासमा प्रयाप्त टिपणीकारो का कोटा है-राम राम।"

पाठको के लिऐ २४ अप्रेल २००९ सुबह से शाम सात बजे तक के टिपणियो के ऑकडे प्रस्तुत है :-


१ पूरी में समायी-कचौरी
आज 16 Comments: : वडनेकर जी!


२ शुक्र है शोभित ह

आज 7 Comments: दर्पण साह


३ छत्तीसगढ़ की नारी-सब पर भारी

आज 09Comment राजकुमार ग्वालानी


४ प्रवक्ता, ख्वाब का दर, हथौड़ा,- पाबला

आज0 1 Comment बी एस पाबला


५ एक खुली बहस uchcharan

आज 07Comment डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक


६ चुनावी बदलाव की -

आज 08 Comments: मोनिका गुप्ता


७ आठवें जनम की आशंकायें कस्‍बा

आज 6Comments: ravish kumar


८ अस्मत का सवाल -सारथी

आज 02Comments Shastri April 22/२००९ को 13Comments:


९ बाबा-दादी की कहानी -चोखेर बाली

आज 01Comments:सुजाता April23/२००९ को 05Comments:


१० कौन है तालीबान -पंगेबाज

आज 10 Comments:arun feb 01/2009 को 10 Comments:


११ जो "आज की पसन्द"-चिट्ठा चर्चा

आज 09 Comments चिट्ठा April23/2009 को 23Comments:


१२ मानसिक हलचल

आज 20 Comments: ज्ञानदत्त पाण्डेय April 21,को 36 Comments:


१३ जरा पक्षियों की भी सुनो : ताऊ

आज 28 comments: ताऊनामा ! April 23, को 57 comments:


१४ आम आदमी तो पापी -शिवकुमार

आज 13 commentsशिवकुमार! April 22, को 20 comments:


क्षमा करे व्यग के लिए ......क्षमा करे व्यग के लिए ......क्षमा करे व्यग के लिए ......