अब आपको बजट वाले दिन हिन्दी के धुरन्द्र चिट्ठा-लिखाकारो के पास लिए चलता हु।

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अर्थपूर्ण-अर्थहीन

हमारे देश मे बजट ने कुछ कुछ उत्सव का स्वरुप ले लिया है। लोग कयास लगाने लगते है। वे भले अर्थशास्त्र की बारीकियो मे न जाए पर वे इस विमर्श मे जरुर जुट जाते है कि  बजट उनके रोजमरा  के जीवन पर क्या असर डालेगा, उन्हे  कितना सुखी बनाएगा। वे एक विचित्र मनःस्थिति से गुजरने लगते है। बजट से लोगो का यह जुडाव आश्चर्यजनक है। एक तरफ तो लोग धर्न-कर्म और सस्कृति मे खुब आस्था जताते है, जिसमे 'धनसचय और भोतिकता को निषेद किया गया है। लेकिन  दूसरी तरफ वे इस बात को लेकर चिन्तातुर भी रहते है कि कही उनका स्तर कम ना हो जाए। वे इस होड मे पिछड न जाए। मिडल क्लास के जो लोग सत्सग मे रमे रहते है  वे भी इस बात को लेकर सतर्क रहते है कही उनका बजट न गडबडा जाए।
एक व्यगः अर्थपूर्ण-अर्थहीन बजट पर

पने देश  मे ज्यादातर पढे लिखे लोग बजट के मामले मे विद्धवान ही होते है।  हॉलाकी उनको कोई सरकारी फार्म भरने या एप्लिकेशन लिखने मे पसीना छुट जाता है, फिर भी बजट पर वे अपनी कोई रॉय अवश्य रखते है।जैसे हर हिन्दुस्थानी बीमारी के मामले अपनी कोई न कोई राय जरुर रखता है। भले ही वह डाक्टर, कम्पाउन्डर ना हो।
इस बार बजट दो बार हो गया। आम तोर ब़जट एक बार ही होता है। लेकिन इसके विद्धवान कई किस्म के होते है।
अब आपको बजट वाले दिन हिन्दी के धुरन्द्र चिट्ठा-लिखाकारो के पास लिए चलता हु। 

ज्ञानदत्तजी, अपने दफ्फतर मे टीवी खोल बैठे है। उन्हे कल ऑफिस  अर्जेन्ट डिस्पैच रजिस्टर तैयार करना था ,लेकिन वे बजट सुन रहे थे। अब हम सभी जानते है कि उन्हे इस राष्ट्र कर्म के बीच टोका नही जा सकता।
मेरे एक ब्लोगर मित्र आशिष खण्डेलवालजी  घर से कह के जाते है कि आम बजट है देर से लोटूगा, और राजमन्दिर मे नाईट शो देखकर लोटते है।
ये सब बजट के विद्धवान है, जानते है कि इसे रोजमरा की जिन्दगी मे कैसे इतेमाल करना है।
कुछ लोग बजट  की तैयारी वित्तमन्त्री से भी पहले से करना शुरु कर देते है। वे सारे सम्पर्क टटोलते है, उस दिन कही कमेन्ट या लेख छप जाऍ, किसी पैनल-डिस्कशन मे नाम आ जाए। किसी टीवी चैनल पर कोई स्लॉट मिल जाऐ।
ताऊ! वितमन्त्री को बोलते हुऐ सुनते है कि कमॉडीटी ट्राजैक्शन पर टैक्स हटाया जाएगा। वह
राज भाटीयाजी की और मुह कर के गम्भीर स्वर मे बोलते है, इसमे मिडल क्लास को बहूत फायदा होगा। असल मे तो ताऊ को पता ही नही है कमॉडीटी ट्राजैक्शन  टैक्स चीज क्या है,  लेकीन सोचते है यह बाजु मे बैठा बन्दा क्या जानता होगा।
भाटिया़जी, सचमुच कमॉडीटी ट्राजैक्शन  टैक्स  के बारे मे नही जानते, पर ताऊ कि बात सुनकर चिढ जाते है, रोब गाढ रहे है । बडे आऐ है अर्थशास्त्र झाडने। भटियाजी और ध्यान से टीवी सुनने लगते है। अचानक सुनते है कि "इफ्रास्ट्रक्चर फॉइनैस कम्पनी" बनेगी। यह बढिया है भारी भरकम नाम है। 'इफ्रास्ट्रक्चर' मतलब ढॉचा-मतलब सडक-मतलब-बिजली,बन्दरगाह। वे सब भी जानते है अच्छा मोका है। वे ताऊ कि और मुह कर के बोलते है -' कमॉडीटी ट्राजैक्शन तो खैर ठीक है, मगर इफ्रास्ट्रक्चर फॉइनैस कम्पनी से ज्यादा लाभ होगा। शाम दोनो ही भुल जाते है कि  उन्हे बजट के किस हिस्से ने प्रभावित किया।
नेहरुवियन इकॉनमी के दिन बीते, इन्दिरा का समाजवाद पीछे छूट गया, आर्थिक उदारिकरण और वैश्वीकरण के भी लगभग दो दशक पुरे होने जा रहे है। लेकिन मध्यवर्ग का आदमी आज भी बजट मे अपनी वही दो पुरानी चीजे ढूढता है- इनकम टैक्स की स्लैब बढी या नही और ट्रेक्टर, टीवी,-टुथपेस्ट सस्ता हुआ या नही।
पिछले पचास सालो से अगर कोई निशिचत है तो वह है सिगरेट पिने वाला, तम्बाकु खाने वाला। क्यो कि उसे पता है कि बढेगा ही बढेगा ।


 
देश के हर नागरिक पर 1177 रुपयो का विदेशी कर्ज
देश के हर नागरिक पर लगभग 1177 रुपये का विदेशी कर्ज है। चाहे वह नवजात शिशु ही क्यो ना हो। यदि घरेलु कर्ज को जोड ले तो यह रकम हर भारतीय पर लगभग 29800 रुपए हो जाएगी।



 
पाकिस्थान से भारत को वसूलने है 3०० करोड
भारत पिछले ६० वर्षो मे पाकिस्थान से 3०० करोड नही वसुल पाया। दिलचस्प बात है कि इस राशि का भुगतान 1950-51 से ही लम्बित है।
इस बात की एक रपट गत वर्ष सुरेसजी चपलुनकर जी ने अपने ब्लोग पर भी दी थी।



विशेष-:यह एक व्यगात्मक सोच थी इसमे जिस किसी का भी नाम उल्लेखित है वे भारतिय जनमानस की भुमिका मे मेर हिरो है जो आदरणिय है।
कही भी आपका दिल दुखाया हो तो क्षमा चाहता हू,
आभर जी
हे प्रभु यह तेरापन्थ
मुम्बई टाईगर

14 comments

अविनाश वाचस्पति 7 जुलाई 2009 को 5:24 pm

दुखा दिया जी
पक्‍का दुखा दिया

बजट का जिक्र करके

शेयर बाजार को

पूरा ही सुखा दिया।

संजय बेंगाणी 7 जुलाई 2009 को 5:27 pm

बजट तो जी वो राग है जो गाने वाला समझता है न सुनने वाला. बस वाह वाह कर देते है.

Udan Tashtari 7 जुलाई 2009 को 5:37 pm

बहुत सही, मजेदार!!

Shiv Kumar Mishra 7 जुलाई 2009 को 5:52 pm

अर्ज किया है;

न जाने कितने दिन से लगे थे बजट लिखवाने में
भर लाये इक अटैची में, संसद में पटका, चल दिए

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 7 जुलाई 2009 को 6:10 pm

भगवान भला करे।
वित्त-मन्त्री दाल-रोटी के लिए
बाज़ार नही जाते है?

राज भाटिय़ा 7 जुलाई 2009 को 6:24 pm

चलिये अब पता चल गया, लेकिन भाई यह होता क्यो है ? जरा यह जरुर समझना, वरना आप कल से ताऊ से पंगा ले रहे है भोले बन कर, कही ताऊ यह सब ना समझा दे अपने लठ्ठ से...
मालूम है ताऊ का काम है शेयर बाजार का ओर वो पहले ही ......

P.N. Subramanian 7 जुलाई 2009 को 8:04 pm

मजेदार रही. आभार. मुंबई में आपसे मिलने आ रहे हैं अपना नंबर दे दें.

MUMBAI TIGER मुम्बई टाईगर 7 जुलाई 2009 को 9:25 pm

P.N. Subramanian shab
well-come Sir

डॉ. मनोज मिश्र 7 जुलाई 2009 को 10:28 pm

आनंद आ गया .

आशीष खण्डेलवाल (Ashish Khandelwal) 8 जुलाई 2009 को 11:11 am

वाह जी वाह.. मित्रों की खूब खबर रखते हैं.. वो राजमंदिर वाला राज़ आपको कैसे पता चला.. :)

RAJIV MAHESHWARI 8 जुलाई 2009 को 2:36 pm

मुझे आपके इस सुन्‍दर से ब्‍लाग को देखने का अवसर मिला, नाम के अनुरूप बहुत ही खूबसूरती के साथ आपने इन्‍हें प्रस्‍तुत किया आभार् !!

MUMBAI TIGER मुम्बई टाईगर 8 जुलाई 2009 को 3:09 pm

@आशीष खण्डेलवाल (Ashish Khandelwal) ने कहा…
वाह जी वाह.. मित्रों की खूब खबर रखते हैं.. वो राजमंदिर वाला राज़ आपको कैसे पता चला..
......
आशीषभाई ! अब खबर तो रखनी ही पडती है कब आपकी जरुरत पड जाऍ। वैसे रामप्यारी जो है आप़की पोल पट्टी खोलने के लिए।

आप मुम्बई टाईगर पर पधारे आपका शुक्रिया!

Science Bloggers Association 8 जुलाई 2009 को 4:49 pm

गजब का व्यंग्य किया है आपने। सोचने पर मजबूर कर दिया।
और हाँ, आपके ब्लॉग का लेआउट बडा प्यारा है। बधाई।
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" 9 जुलाई 2009 को 11:10 am

हे राम्! हमने तो आज तक कभी किसी से चार आने भी उधार नहीं लिए,ये 29800 रूपये हम पर कर्जा कहाँ से चढ गया. वित्तमंत्री से कहिए कि जरा अपने बही खाते दोबारा से चैक करें,उसमे हमारा नाम नहीं होगा:)