बैंगलोर से मेरा पुराना नाता, गार्डन सिटी" कब "पत्थरो की नगरी बन गई!!

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इन्ह दिनों बाहर  रहने का अवसर मेरे लिए कुछ अधिक था! मित्र के घर के मोहरत के सिलसिले में मुझे बैंगलोर जाना पडा . मेरे मित्र, रिश्ते में मेरी बहिन के देवर है . "राजाजी-नगर" में मित्र ने तीन मंजिला बिल्डिग बनाई जो सुन्दर एवं योजनाबद्ध ढंग से बनाई गई है.  बैंगलोर का यह क्षेत्र (राजाजी नगर) सुहाना, सुन्दर एवं साफ़   सुथरा लगा. हां इस क्षेत्र के ब्रिज के निचे ट्राफिक  जाम से मार्केट आने-जाने में बहुत अधिक समय जरुर लग जाता है  !

वैसे बैंगलोर से मेरा पुराना नाता है. गली-गली घूम चुका हु. दस-पन्द्रहा सालो में  बैंगलोर में काफी कुछ बदलाव आया है. विकास भी हुआ है. बहुत बढ़  सा गया है. कई किलोमीटर दूर तक लोगो ने अपना बसेरा बसा लिया है.  कुछ वर्ष  पूर्व बसंतगुडी, जयनगर जो चिकपेट एवं शहर से मात्र ५-६ किलोमीटर दुरी   पर स्थित है लोग दूर बताते थे आज वो ही स्थान बैंगलोर के बीचोबिच में विद्यमान हो गया है. समय कितना तेजी से चला पता ही नहीं चला. "गार्डन सिटी" कब "पत्थरो की नगरी" बन गई, पता ही नहीं चला!.

ट्राफिक समस्या से अभी तक लोगो को निजात नहीं मिल पाई है. जबकि सरकार ने बहुत सारे नए ब्रिज बनाए है. कई रास्तो को "वन वे" कर दिया है. फिर भी ट्राफिक  समस्या "सुर्पनका" की तरह मुह फैलाए खड़ी है.

हां! एयर पोर्ट रोड को काफी आधुनिक बना दिया है. एयरपोर्ट से सिटी आने के लिए मैसूर बैंक तक "ऐ,सी बसों" की अच्छी सुविधा होने की वजह से रिक्शा-टेक्शी वालो की मनमानी पर लगाम जरुर लगा गई है.
रेलवे के हालत भी बुरे ही है - "कंट्रोमेंट से बैगलोर" पहुचने के लिए ट्रेँन को ४५ मिनट लगते है. जबकि मुश्किल से यह रास्ता मिनट का है. वैसे प्लेट -फॉर्म खाली ना होने का बहना  बनाकर रेलवे मंडल क्या साबित करना चाहती है ?  समझ के परे है. कई मायनों में बैंगलोर विश्व स्तरीय माना जा सकता है पर नागरिक सुविधाओं कि कमी के कारण समय की अपव्यता चिंता का कारण है. इनफ़ोसिस , विप्रो , एच सी एल  जैसी  बड़ी कम्पनियों के कारण लाखो जॉबकर्ता देश-विदेश से बैंगलोर में निर्वासित है. इन्ही लोगो  की भारी तादाद ने बैंगलोर में प्रोपर्टी की कीमतों में उछाल लाने में साहयता की है तो सरकारी खजाने को  टेक्स  से लाबाबब कर दिया है. पर रात को ११=३० बजे के बाद उन्हें राहगीरों को खाने पिने को होटले या सड़क पर खुमचे नहीं लगे मिलते है क्यों कि यहाँ का प्रशासन एवं पुलिस इसके लिए तैयार नहीं है. हां फाइव स्टार होटल  रात भर खुला मिलेगा. पर लोग रात को १२ बजे के बाद घरो से निकल कर टहलते नहीं है बैंगलोर में शायद पुलिस्या डर ? हां रात को कभी जोरदार भूख लगा जाए तो घबराए नहीं रेलवे स्टेशन चले जाए वंहा की "केंटिन" में देर रात  तक स्वादिष्ट भोजन मिल जाएगा. "एमजी रोड " पर घूमने एवं शापिंग करने का आनंद कुछ ओर ही है. मुझे तो "सुखसागर" की पाँव भाजी बड़ी ही लजीज लगी. वैसे यह मुंबई "सुखसागर" की ही ब्रांच है.

आज मुंबई पहुचा ! लगे हाथो "रघुलिला शापिग  मोंल" में पत्नी के साथ "माई नेम इज खान" देखने बैठ गया ! पिच्चर से एक सन्देश जरुर मिलता है -
" दुनिया में दो ही तरह के इन्शान होते है - एक अच्छा इसान, दूसरा बुरा इंसान."
हिन्दू, मुश्लिम, जैन, सिख, इसाई यह सभी तो इंसानों कि इंसानों के लिए बनाई हुई खाई ! कुल मिलाकर फिल्म एक सामाजिक सन्देश देने में सक्षम हुई. शाहरुख खान को एवं काजोल को बधाई. वैसे करण जोहर भी इसके हकदार है.
बालासाहेब का आभार की वो "माई नेम खान" पर प्रतिबन्ध नहीं लगाते तो मै इतना उत्सुक नहीं होता यह पिक्चर देखने के लिए नही जाता .
कल  मेरे ब्लोगर मित्र विवेक रहस्तोगीजी की शादी की सालगिरह थी. फोन  मिलाया शुभाकामानो के लिए तो वो मद्रास में थे. काफी लम्बी बात चली.   मैंने उन्हें एवं भाभीजी को शुभ-कामनाए प्रेषित की.
वन्दना गुप्ताजी की १५ फरवरी को शादी की सालगिरह थी. वंदनाजी की कविताओं का मै बड़ा फैन हु एक बार चैट पर बात हुई थी.   वंदनाजी को हार्दिक शुभ कामनाए ....
वैसे अरविन्द जी मिश्रा की भी कल १८ फरवरी को  शादी की   सालगिरह मनाई गई उन्हें भी मै प्रणाम करते हुए मंगल कामनाए प्रेषित करता हु.
कल सुबह मै फिर कही नई  यात्रा पर निकल चुका होउगा जब आप यह पोस्ट पड़ेगे. नमस्ते....

7 comments

Udan Tashtari 19 फ़रवरी 2010 को 5:53 am

बढ़िया रहा आपकी कलम से बैंगलोर का आज का चित्रण. हम तो बहुत बरसों पहले की याद संजोये हैं.

रंजन राजन 19 फ़रवरी 2010 को 6:03 am

बढ़िया चित्रण और ब्लागर की शादी-सालगिरह का लेखाजोखा भी।...

Arvind Mishra 19 फ़रवरी 2010 को 6:50 am

आपकी नजर से बंगलौर की चित्रमय झांकी बहुत अच्छी लगी -शुभकामनायें !

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 19 फ़रवरी 2010 को 7:18 am

बढ़िया!
आपकी नजर से हमने भी बैंगलुरु घूम लिया!

'अदा' 19 फ़रवरी 2010 को 8:38 am

hey bhagwaan banglore ki ye halat hai...kitna khoobsurat tha ye shahr..khair kya kah sakte hain..aapne apni leknhi par bitha kar sair kara di hamein bhi...
vaise videshon mein to Bangalore ki bahut demand hai,
aapka aabhar ye sab saajha karne ke liye..
dhnyawaad..

Vivek Rastogi 19 फ़रवरी 2010 को 8:57 am

सुन्दर तरीके से आज के पत्थरों की नगरी का चित्रण किया है, और ये तो आपका स्नेह है, जो आपका फ़ोन आया।

राज भाटिय़ा 19 फ़रवरी 2010 को 3:56 pm

आप के लेख से हम भी बैंगलोर घुम आये.
धन्यवाद