अतः में, मै दो लाईने भारत मॉ को सुनाना चाहता हू।

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मुंबई में मैने वोट दिया

ज मैने अपना मताअधिकार का चोथी बार मद्रास से आक़र मुंबई में प्रयोग किया। देश के सबसे बडे लोकतान्त्रिक मेला, "चुनावो" मे मैने व्यक्ति विशेष के पक्ष मे अपने मत का प्रयोग किया। जब उगलि पर कालि स्याही का तिलक लगा तो मन मे एक सन्तुष्टि हुई कि चलो अब यह बात कोई नही कहेगा कि -

"अगर आप वोट नही कर रहे है, तो- आप सो रहे हो।" मै जाग गया हू, यह उगलि पर कालि स्याही का तिलक इस बात को प्रमाणित करता है। मैने तो अपने मताधिकार एवम जागने-जगाने वाली बात को साबित कर दिया। पर सोचता हू जागने - जगाने का फोर्मुला हम जैसे नागरिको के मानने से क्या यह राजनेता चुनावो के बाद पॉच साल तक जागते रहेगे ? मेरे मन मे यह प्रशन मुम्बई ऐयरपोर्ट से लेकर मेरे मतदान केन्द्र पहुचने तक दिमाग मे धमाल चोकडी कर रहा था। मतदान केन्द्र पर कोई लाईन नही थी फटाफट फुटे कि दिवार के पिछे गया बटन दबाया और बस हो गया मत + दान । अब इस मत के दान से मुझे या मेरे क्षैत्र को कितना पुण्य मिलेगा यह तो समय बताऐगा।

देश के सबसे बडे लोकतन्त्र के हाई प्रोफाईल क्षैत्र मुम्बई कि छः सिटो के लिऐ आज मतदान हुआ।

भारत का बडे से बडा उधोगपति, फिल्मी कलाकार, ने मुम्बई आकर अपना मत देकर, अपने अधिकारो पर अल्पकालिन विजय प्राप्त की।

सबने वोट देते वक्त एक बात को दोहराया कि-" हम सुरक्षा चाहते' हमारा सासंद वही होगा जो कार्य करेगा, जो स्वय शिक्षित होगा, (मुम्बई ऑतकवादी हमले के हादसे को वे अभी तक नही भुला पाऐ है) जो हमे सुरक्षित जीने का अधिकार देगा।

मैने तो यह सोचा ही नही था । और मत दे आया। क्यो कि मुझे पता है राजनितिज्ञो के लिऐ यह एक ऐसी फैक्ट्री है जो पॉच साल मे बिना टेक्स भरे करोडो अरबो के न्यारे वियारे है, नही तो भला कोन टिकट से लेकर प्रसार प्रचार मे करोडो स्वाह करेगा।

अतः मे मै दो लाईने भारत मॉ को सुनाना चाहता हू।

हर उम्मीदवार को डर रहता है

जनता कही मुझसे रुठ नही जाऐ।

और जनता को डर रहता है

उम्मीदवार का विजय रथ कही टुट ना जाऐ।

मुझे डर है उम्मीदवार और जनता के

बीच चल रही इस कशमाकस मे

कही भारत के लोकतन्त्र को बचाने का

सही-सही रास्ता छुट नही जाऐ।

जय हिन्द


7 comments

mahashakti 1 मई 2009 5:38 am

बिल्‍कुल सही फरमाया टाईगर साहब

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` 1 मई 2009 6:00 am

आपने मतदान किया वह अच्छा किया
- लावण्या

Arvind Mishra 1 मई 2009 7:14 am

आपने लोकतंत्र के धर्म का निर्वाह किया -बहुत बहुत अच्छा है !

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi 1 मई 2009 7:17 am

इक दिन आए जनता सब से रूठ जाए!

संजय बेंगाणी 1 मई 2009 9:51 am

हमने भी उँगली पर काला टिका लगवा कर ही सुबह का नास्ता किया था. मताधिकार मिलने के बाद एक भी मौका नहीं चुका हूँ.

जय हिन्द

Udan Tashtari 1 मई 2009 3:27 pm

आपका डर बिल्कुल जायज है.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 13 मई 2009 12:55 pm

महापर्व है लोक तन्त्र का, करना सब मतदान।
मत देकर जनता करती है,व्यक्ति का सम्मान।।