ताऊ किसी दूसरे पर तोहमत नही लगाता-अपनी खिल्ली उडाकर ही हास्य के रुप मे व्यंग करता है-रामपुरिया जी

✪ 22 comments
नाम रुपात्मक दृश्य जगत मे प्रत्येक पदार्थ अपना यथार्थ नाम या शब्द खोजता है और उसकी स्थापन करता है। शब्द व्यक्ति या वस्तु को पहचान देता है तो अर्थ प्रतिष्ठा देता है। शब्द ,अर्थ, और व्यक्ति तीनो समरुपता कठीन अवश्य है, असम्भव नही। इस प्रतिष्ठित अर्थ के जगत मे एक ऐसा अर्थ जिसके अस्तित्व, कतृत्व एवम व्यक्तित्व  को उजागर करता है। एक शब्द "ताऊ"। हॉ ताऊ ऐसा व्यक्तित्व है, जिसके नाम और अर्थ मे कोई दुरी नही ।

प्रश्न है ताऊ कोन ?  ताऊ वह जिसकी अन्तदृष्टि जागृत हो, जिसकी सोच साकारात्मक हो, जिसका दृष्टिकोण विधायक हो, जिसका जीवन सहता, सरलता का समन्वित रुप हो, जिसका अशन और आसन नियन्त्रित हो।जिसने लोगो के दिलो पर विजय प्राप्त कर ली हो, जिसकी लिखाई नियन्त्रित एवम सधी हुई हो एवम भाषा लोक=लुभावनी हो।

ताऊ वस्तुतः ताऊ है क्यो कि उनका अस्तित्व इन सारे रहस्यो का समवाय है। ताऊ एक विचार धारा है, पर उनके रुप अनेक है कभी वे विचारो को यूगीन भाषा मे प्रतुति देते नजर आते है, कभी वे मग्गा बाबा के रुप मे भाष्यकार बनकर उभरते है,  कभी उन मे से हरियाणवी भाषा  मुखरित होती है, तो कभी वे हिन्दी भाषा के वाग्मी सन्त बन जाते है। कभी एक अर्थशाश्त्री के बतौर नजर आते हैं। कभी ताऊ अपनी मेड-इन-जर्मन लठ की हुल्ल पट्टी देते हुऍ दिखाई देते है, कभी नटवरलाल तो कभी चाणक्य रुप, कभी महात्मा बाबा तो कभी लुटायत,  बाप रे बाप ताऊ है या फैन्टम, स्पाईडर मैन है या चाचा चोधरी।


हिन्दी चिठ्ठा जगत मे ताऊ कोई परिचय का मोहताज नही। ताऊ, ने सबसे पहली पोस्ट May 22, 2008 को लिखी, तब से  १६ महिनो के अपने ब्लोगिग सफर मे ४१९ पोस्टो मे १५ हजार कमेन्ट के साथ हजारो पाठको के दिल मे जगह बनाने मे कामियाब हुऍ। ताऊ की इस सफलता के पिछे सिर्फ एक ही एक कारण स्पष्ट दिखलाई पडता है- वो है- ताऊ के चरित्र को जी रहे श्री पी.सी.रामपुरियाजी (मुदगल) का अथक परिश्रम, चिठ्ठाकारिता के प्रति लगन, एवम समय के पाबंद।

"ताऊ डाट इन" ने हिन्दी चिठठाकारी को एक नई पहचान दी।  ताऊ डाट ईन से प्रोत्साहीत होकर सैकडो लोग हिन्दी चिठठाकारी की और आकर्षित हुऍ। बहुत से चिठ्ठो पर तो ताऊ के विभिन्न "किस्से-कहानियो" की श्रृखलाए शुरु हो गई। "अरे बावलीबूच".. ताऊ का तकिया कलाम डायलॉग तो जन-जन के मुह पर है।


ताऊजी की प्रसिद्धि के अनेक कारणो मे एक मुख्य  कारण यह भी है- इनका मोलिक लेखन एवम बोलचाल की भाषा। लेखन शैली इतनी पैनी है की पाठको को एक बार मे ही आकर्षित कर लेती है, पाठक को लगता है कि वो स्वय उस पात्र को जी रहा है। लोग  पढकर अपनी जीवन की धारा को मोड लेते है।


जब ताऊ लिखता है तो लगता है कोई अपने आसपास होने वाली घटनाक्रम को देख रहा है, उसे महसुस किया जा सकता है। एक ताऊ बडा ही मनोविज्ञानिक मानव मन की समस्याओ की गुत्थि को बडे ही विनोदी स्वभाव से सुलझा रहा है। सचमुच  ताऊ जैसा चरित्र शताब्दियो मे कोई एक ही होता है। ताऊ के कर्तृत्व की आभा हिन्दी चिठ्ठाकारी को उजाला देती है।
ताऊ डॉट ईन के
संस्थापक श्री रामपुरीयाजी (ताऊ)  ने अपने लेखन कर्तृत्व से जो रोशनी बिखेरी,वह आज सैकडो हिन्दी पाठको, लेखको, के पथ को आलोकित कर रही है।

२२ मई २००८ को ताऊ डाट इन की शुरुआत करने वाले ताऊजी ने हिन्दी ब्लोगिग मे नये उच्छवास भरे, हिन्दी चिठाकारी नई ऊचाईयो को छूने मे सक्षम हो गया। यशस्वी हिन्दी चिठठा जगत ने रामपुरिया जी को "ताऊ" नाम का सम्मान देकर नवाजा।

ब्लोगिग ससार ताऊ ने १६ महिना २५ दिन  ४२१ पोस्ट व १५८०० टिपणियो के माध्यम से अल्पअवधि मे जो ख्याती प्राप्त की यह भी एक हिन्दी ब्लोगिग के इतिहास की विरल घटना है ताऊ पात्र  इतिहास का दुर्लभ दस्तावेज बनेगा इसमे हमे कोई शको-शुब्बा नही होनी चाहिये। ताऊ के बारे मे लिखने बैठे तो शायद इस ब्लोग के पन्ने कम पड जाऍ।

ताऊ की भुमिका का बेखुबी से निर्वाह कर रहे आदरणीय श्री पी.सी.रामपुरिया जी (मुदगल)
जो किसी परिचय के मोहताज नही हैं, आप सभी उनको एक शीर्ष ब्लागर के रूप मे पहचानते हैं। रामपुरिया जी ने हमको एक छोटी सी बातचीत का समय दिया। आपको भी उस बातचीत से रुबरू करवाते हैं।


ताऊ से बातचीत करते हुऐ महावीर बी सेमलानी
सवाल-1;  आप कब से ब्लागिंग मे हैं? आपके अनुभव बताईये? आपका ब्लागिंग मे आना कैसे हुआ?
उत्तर;  सार्वजनिक ब्लागिंग मे १५ / १६ महिने पहिले से. इससे पहले निजी ब्लागिंग (अपने ग्रुप) में सीमित थे.
अनुभव : बहुत ही अच्छे रहे हैं, बस कुछ परदुख: भंजनकारों की कारस्तानी छोड दी जाये तो.  और आटे मे दाल
जितना तो होना जरुरी भी है.:) 


सवाल-2; ब्लोग का नाम "ताऊ" रखने के पिछे आपकी मुल अवधारणा क्या रही ?
उत्तर; - मूल धारणा तो कोई विशेष नही थी...असल मे मैं जिस कंपनी से संबंध रखता हूं वहां के लडके/लडकियां  मेरे  बोलने के अक्खडपन और हरयाणा से संबंध रखने के कारण पीठ पीछे मुझे ताऊ कहते थे...फ़िर जब हिंदी मे ब्लाग लिखना शुरु किया तो उनकी खुशी और इच्छा देखते हुये मैने इसका नाम ही ताऊ डाट इन रख दिया.  और आज भी ब्लागर्स से ज्यादा मेरे पाठक वही हैं. 

सवाल-3;  "ताऊ पत्रिका" के प्रसिद्धि के पिछे कोन सा फ़ेक्टर मुख्य रहा- "ताऊ" नाम  या "ताऊ" कि चारित्रिक,वैचारिक, भुमिका ?
उत्तर : आप किसी एक बात को इसके लिये श्रेय नही दे सकते.  असल मे हम मौलिक रुप मे तो आज भी भारतीय ही हैं...ये जो पश्चिमी संस्कृति का चोगा हमने ओढ रखा है वो अंदर ही अंदर बैचेन करता है...और ताऊ के चरित्र के साथ   इतना आत्मिय रिश्ता असल मे अपनी जडों की और लौटना ही है.  थोडी देर यहां आदमी अपनी ओढी हुई तस्वीर छोड देता है. यहां ताऊ के सामने आदमी अपनी ओरिजिनिलिटी मे आता है...बिल्कुल अपने आपको बच्चा महसूस करके थोडी देर तनाव मुक्त हो जाता है.


सवाल-4;  बहुत ही अल्पसमय मे ~ताऊ~ ब्लोग ने हिन्दी ब्लोग जगत के सारे रिकोर्ड धवस्त कर अपने आप को शिखर पर पहुचा दिया, इस सफ़लता से पाठको की आपसे अपेक्षा बढ गई है, ऎसे मे  आपको नही लगता की अब जिम्मेदारीयो का दबाव अधिक हो गया है ?
उत्तर : आपका कथन कुछ अर्थों मे तो सही है पर इसमे रिकार्ड ध्वस्त करने जैसी कोई खास बात नही है. इस ब्लाग की सफ़लता की असली वजह इसका मौलिक लेखन है. हालांकि चंद लोग इसमे भी नकल देखते हैं.  अगर हम वाकई मौलिक की बात करें तो मेरी समझ मे परमात्मा के अलावा मुझे तो दूसरी कोई मौलिक चीज दिखाई नही देती.  जैसा की मैने अपने प्रोफ़ाईल मे भी लिखा है  कि मैं तो अपने आसपास की घटनाओं मे ही अपने लिखने की सामग्री ढूंढ लेता हूं..बस उस घटना को मैं अपनी   भाषा मे ज्यों का त्यों रख देता हूं..अब इस शैली कॊ लोगों ने पसंद किया है तो मैं उनका शुक्रगुजार हूं.
जहां तक जिम्मेदारियों का सवाल है तो मैं मैं ऐसा कोई कमिटमैंट लेकर नही चलता.  जितना हो सकता है उतना लिखता हूं..मूड नही हो तो नही भी लिखता.

सवाल-5;  ताऊ की भुमिका निभाते निभाते क्या अब आप स्वय को ताऊ समझ बैठे है ?
उत्तर : ना. कतई ना.  जितनी देर लिखता हूं उतनी देर  ताऊ की आत्मा मुझ पर सवार रहती है बाकी तो मैं भी आप लोगों जैसा ही कामकाजी आदमी हूं.

सवाल-6; ताऊ के चरित्र को जीना सरल है या कठीन है ?
उत्तर : अब ये तो मैं नही जानता..पर ताऊ के चरित्र को जीते जीते आदमी सहज जरुर होजाता है. जो एक उपर की ओढी हुई शराफ़त की गंभीर छवि है वो हट जाती है और आदमी निर्भार हो जाता है. 

सवाल-7; : इसको थोडा समझाईये?
ताऊ : देखिये इसमे समझने और समझाने जैसा कुछ नही है.  हर आदमी अपने आपको वो दिखाना चाहता है जो वो है नही.  हर आदमी अपने को शरीफ़ और सामने वाले को बेईमान सिद्ध करने की कोशीश करता है.  यहां ताऊ के चरित्र को देखिये...वो सारी हरकते खुद ही करता है..यानि चोरी, बेइमानी, डकैती..मुर्खता खुद ही करता है.  यानि वो सारी चोट खुद पर करते हुये ही व्यंग करता है और यही स्टाइल पब्लिक पसंद करती है.
ताऊ किसी दूसरे पर तोहमत नही लगाता....अपनी खिल्ली उडाकर ही हास्य के रुप मे व्यंग करता है. 

सवाल-8; : ये खुद की खिल्ली उडाना कहां से सीखा?
उत्तर : ये कोई सीखने की चीज नही है. बस इतना कहुंगा कि समीरलाल जी को इस विधा का माहिर मानता हूं...उनके लेखन को बारीकी से पढने के बाद मैने इस लीक पर चलना शुरु किया.

सवाल-9; : क्या ये व्यंग लोग समझ पाते हैं?
उत्तर : हां ज्यादातर लोग बहुत ही स्पष्टता से समझते हैं और यही उनको बार बार यहां खींच लाता है. पर कुछ सिरफ़िरे या तथाकथित गंभीरता का खोल ओढे बैठे कुछ लोग ऐसे भी हैं जो इसे लफ़्फ़ाजी कहते हैं..पर मैं तो उन्हें भी धन्यवाद ही देता हूं कि उन्हे कुछ तो लगा? उनका ध्यान तो खींचने मे सफ़ल हुआ.  

सवाल-10; क्या घर वाले, दोस्त, रिस्तेदार भी आपको ताऊ नाम से पुकारते है ?
उत्तर : ना जी. कोई पहचानता नही इस नाम से. ताऊ सिर्फ़ ब्लाग जगत से ताल्लुक रखता है. बाकी मेरी निजी जिंदगी ताऊ से बिल्कुल जुदा है. बाकी आजकल ताऊ की बेफ़िक्री कभी कभी अपने उपर आजमाता हूं तो बडा सहज महसूस करता हूं एकदम भारहीन.

सवाल-11; ताऊ की बात चल रही है और रामप्यारी की बात नही चले तो बात अधूरी रह जाऎगी. आप तो यह बताऎ रामप्यारी का "ताऊ के हिट" होने मे कितना योगदान है ?  क्या ताऊ को रामप्यारी की लोकप्रियता से डर नही लगता ?
उत्तर :  जहां तक हिट होने का सवाल है तो जब कोई चरित्र पापुलर हो जाता है तो उसको इस कोण से देखा जाता है. पर वास्तविकता तो यही है कि दोनों एक दूसरे के पूरक हैं.  दोनों ही चरित्र अब तो एक द्सरे मे समा गये हैं.  एक को याद करते ही दूसरे का चित्र आंखों के सामने आजाता है.  


सवाल-12; कुछ भ्रान्तिया है की ब्लोगिग दाऎ बाऎ हाथ का खेल है, लिखा, छापा और हो गई ब्लोगिग, इस पर आपकी प्रतिक्रिया अहम है. क्या इस धारणा के साथ नियमित ब्लोगिग की जा सकती है ?
उत्तर : बात  आपने बडे सलीके की पूछी है.  आप ऐसा कर सकते हैं इसमे क्या अडचन है? पर सवाल ये है कि आप कितने दिन ऐसा कर पायेंगे?  जब तक आप दूसरों को नही पढेंगे.. आप उन पर अपनी प्रतिक्रिया नही देंगे..तब तक कोई आपके लिखे पर प्रतिक्रिया नही देगा. यानि ये पूरी तरह से शादी का लिफ़ाफ़ा है. तो ब्लागिंग के मायने सबके लिये अलग अलग हैं. 
आप लिखकर छोड गये..प्रतिक्रिया से कोई मतलब नही तो शायद ये ब्लागिंग नही हुई. क्योंकि यह दुतरफ़ा संवाद की सुविधा है लेखक और पाठक के मध्य. निजी रुप से मैं इसे परस्पर संवाद का माध्यम मानता हूं.

सवाल-13; आपने इतने कम समय मे १५००० हजार टिप्पणियां प्राप्त की हैं जो की अपने आप मे कीर्तिमान ही है. ज्यादा टिप्पणीयो के कारण प्रसन्नता होना स्वाभाविक  है, पर   क्या कम टिप्पणीयो ने कभी आपको विचलित किया ?
उत्तर : शुरु मे तो टिप्पणीयां आती ही नही थी. और मालूम ही नही था कि इस तरह से कुछ टिप्पणीयां भी की जाती हैं. हम लोग तो पोस्ट लिखकर सब लोग   आपस मे फ़ोन पर गप्पे लगाते थे. फ़िर एक रोज कहीं से उडनतश्तरी जी कहीं से प्रकट हुये...मेल आया कि ताऊ क्या नाराजी है? कमेंट करना तो अलाऊ करिये..तब जाकर कहीं टिप्पणीबाजी मे पडे.

सवाल-14; हिन्दी ब्लोग जगत मे आप किसे ? एवम कैसे विषय को सबसे ज्यादा पढना पसन्द करते है?
उत्तर : अगर आप मुझसे यह पूछें कि कौन  ब्लागर  मेरा पसंदीदा लेखक है? तो बिना सोचे कहुंगा अनूप शुक्ल फ़ुरसतियाजी, निसंदेह मुझे उनका लिखा पढना कम और बात करना ज्यादा लगता है. उनकी लेखन शैली का मुरीद हूं. 


सवाल-13; क्या आप पहले अग्रेजी मे ब्लोग लिखते थे ? अग्रेजी ब्लोग की सफ़लता,  हिन्दी ब्लोग की असफ़लता, क्या सफ़लता-असफ़लता का मुख्य कारण भाषा को मानते है.?
उत्तर : हां जब हमको मालूम नही था कि हिंदी भी लिखी जा सकती है नेट पर तब तक सारी गप्प गोष्ठियां हम अंग्रेजी मे ही करते थे पर सार्वजनिक रुप से.  अब जहां तक भाषा का सवाल है तो इसमे कोई दो राय नही है कि आज भी अंग्रेजी की पहुंच बहुत बडी है. अगर हमको हिंदी के लिये ये ख्वाब देखने हैं तो बहुत लंबा रास्ता तय करना है. और सभी लोग लगे हुये भी हैं. थोडा समय तो लगेगा पर मुझे यकीन है कि एक रोज हम मंजिल अवश्य पा जायेंगे.

सवाल-14; ब्लोगिग सफ़र मे किसे सफ़ल,  किसे असफ़ल कहेगे ? इसका कोई पैमाना है क्या ?
उत्तर : ब्लागिंग क्या? जीवन मे किसी चीज के कोई तय पैमाने नही हैं. एक भिखारी सुबह  मंदिर मे भगवान से  अपने लिये १०० रुपये की मजदूरी आज मिल जाये इस कामना के साथ दर्शन करने जाता है वहीं एक सेठ सुबह इसलिये दर्शन करने जाता है कि आज उसे २५/५० लाख का मुनाफ़ा होजाये? यही बात ब्लागिंग मे है...आप स्वयम अपने लिखे से  कितने संतुष्ट हैं? और पैमाना आप स्वयम ही तय कर सकते हैं. 

धार्मिकता एवम आध्यात्मिकता भी आपके पसन्द के प्रमुख विषयो मे से एक है मग्गबाबा चिठ्ठे द्वारा नियमित इस तरह के विषयो पर अपने विचारो का सम्प्रेषण आप करते रहे है- 

प्रशन=15; धर्म क्या है ?
उत्तर : मेरे लिये धर्म एक जीवन शैली का नाम है. निजी रुप से प्रचलित धर्म के तरीके मैं नही मानता. या युं कहले कि धर्म सबकी अपनी निजता है. 

सवाल-16; क्या आप धर्म को बुद्धिगम्य मानते है या श्रद्धागम्य ?
उत्तर : धर्म को पहले बुद्धिगम्य मानना होगा अगर आपकी बुद्धि को यह रास्ता समझ आगया तो श्रद्धा तो उसकी परिणीति है जो हो ही जायेगी. उसके बाद कुछ करना नही होगा. जो होगा स्वत: होगा.

सवाल-17; क्या धर्म सम्प्रादायिकता मे अटक गया है ?
उत्तर : नही सिर्फ़ राजनितिज्ञों तक. एक आम नागरिक  को इससे कुछ भी लेना देना नही है. इन चंद नेताओं को गोली मार दिजिये फ़िर देखिये कि यह सवाल उठता है या नहीं? 

सवाल-18;  भगवान महावीर, एवम भगवान बुद्ध के सन्देशो मे काफ़ी समानताऎ है- ऎसे मे आजके युग मे दोनो कितने प्रासगिक है?
उत्तर : महावीर और बुद्ध कभी भी अप्रासंगिक नही हुये और ना कभी होंगे.  इन दोनो के जीवन मे ही एक उंचाई आई जहां से लौटना मुमकिन नही था. बस सब कुछ त्याग दिया. और यह स्वाभाविक है.  आज बिल गेट्स ने क्या किया? उन्होने भी सब कुछ त्याग दिया. क्या वो महावीर या बुद्ध के अनुयायी थे? नही ना? मेरी निगाह मे आप महावीर और बुद्ध  को किसी धर्म विशेष से नही बांध सकते. पूरी मानवता ही उनके बताये मार्ग पर स्वत: ही चलती है. हां शर्त सिर्फ़ इतनी है कि वो अवस्था आनी चाहिये. 

सवाल-20; तेरापन्थ के आचार्य महाप्रज्ञजी को अगर आपने कभी पढा हो, दर्शन  किऎ  हो, तो उनके बारे मे अपने विचार दे.
उत्तर : आचार्य जी के बारे मे पढने या मुलाकात का सौभाग्य नही मिला. जो कुछ भी पढा वो आपके माध्यम से ही पढा अत: इस बारे में कुछ भी कहना मेरे लिये बडा अनुचित होगा

ताऊजी, आपने अपना कीमती समय हमे दिया आपका बहुत बहुत धन्यवाद।
धन्यवाद की कोई बात नही है महावीरजी! जब आप, मुम्बई से इन्टव्यू के लिऐ यहॉ तक आगऐ तो हमे समय तो देना ही था।

विशेष सुचना- हमारे सहवर्ती पहेलियो के ब्लोग SELECTION & COLLECTION मे पहेली क्रमाक 9 मे ताऊ से सम्बन्धित एक सवाल करा गया। इसी उपलक्ष मे ताऊ की यह मुलाकात उनके निवास स्थान पर कि गई। चुकी नियमाअनुशार उपरोक्त बातचित सलेक्शन और कलेकशन पर  बुधवार को प्रसारित होनी थी किन्तु  तकनिकी कारणो से इसे "मुम्बई टाईगर" पर प्रसारित कर रहे है जिसका अनुमोदन हमारे अन्य चिठ्ठे " हे प्रभू यह तेरापन्थ"- एवम सलेक्शन और कलेक्शन सहर्ष प्रसन्ता पुर्वक कर रहे।

विशेष इसी कडी मे ताऊ कोन ? एक खबर के मुताबिक ताऊ को विभिन्न रुपो मे देखा गया। कभी मनुष्य के रुप मे, तो कभी वानररुप मे। ऐसी किदवंतिया  है कि ताऊ के अनेक रुप है-रंग है। ताऊ कोन ? इस पर हम विभिन्न चिठाकारो के पुर्व मे दिऐ व्यक्तव्यो  को क्रमश: भाग-2 को एक दो दिन मे प्रसारित करने जा रहे है।
सम्पादक मण्डल
हे प्रभू यह तेरापन्थ

अत: मैंने आज यह नया चोगा पहन ही लिया

✪ 13 comments
कुछ दिनों से टेम्पलेट को लेकर ब्लोग जगत में हंगामा बरपा देख मेरे मन भी आया क्यों नहीं मुंबई टाइगर की वेष भूषा में बदलाव किया जाए . अत: मैंने आज यह नया चोगा पहन ही  लिया . आप बताए कैसा लगा ? फ्री टेम्पलेट है....  लागत शून्य है. इसलिए  इसे लगाने में ज्यादा सोचना नहीं पडा.

हिन्दी ब्लोगिग मे प्रदुषण का लेवल बढा

✪ 25 comments
यह कैसी खिलवाड... ? किससे खिलवाड... ? क्यो खिलवाड... ? हिन्दी ब्लोग संसार मे एन्वायरमेन्ट गडबल झाले! 

कुछ दिनो से हिन्दी ब्लोग संसार मे कई तरह के विवाद देखने को मिले। किसी ब्लोगर द्वारा ब्लोगवाणी के उपर "पसंद-बटन" के बेजा उपयोग पर सवालिया निशान दागे, तो तुरंत-फुरत ब्लोगवाणी ने त्यागपत्र दे दिया। राजनेता होते तो कुर्सी छोडते नही। किन्तु ब्लोगवाणी अपने आपको बंद कर नैतिकता का परिचय देने से नही चुकी। ब्लोगिंग के लोकतन्त्र मे यह "ब्लोगशक्ती" का परिचय था। मानमनुवाल के बाद ब्लोगवाणी फिर प्रकट हुई तब कही जा के हिंदी ब्लोगर काले धब्बे से बच पाए।
अब चिठ्ठा-चर्चा भी विवादो से परे नही रही। कभी चर्चा में तो कभी टिप्पणी में, चर्चाकार शांतिप्रिय ब्लॉगर्स का नाम ले लेकर उन्हें उकसाने का काम लगातार करते रहते है ताकि वो भड़क उठें और बलवा मचे साथ ही साथ "इस चर्चा से अजी टिपण्णी चर्चा तो भूले बिसरे गीत बन चुकी है".. चच्चा टिप्पू सिंह बडे ही दुखी भाव से पोस्ट लिखते है, और ब्लोगिग की दुकान ही बन्द करना चाहते है।  यह कैसी विडम्बना  है की मुठ्ठी भर हिन्दी ब्लोगरो के संसार  मे भी लोग मुखोटा लगाऍ हुऍ लिखियाते-टिपियाते घुमते है।
कुछ टीकाकार "चिठाचर्चा" पर, "चच्चा टिप्पू" के "टिप्पणी चर्चा" के ब्लोग टेम्पलेट को गुमराहकारक मानते  है,  वो ही टीकाकारो को "चच्चा टिप्पू" के "टिप्पणी चर्चा" के ब्लोग पर जाकर उन्हे ढाढस बंधाते  देखा गया। यह छदम वेश क्यो ? ब्लोग इतिहास उन्हे अपने पन्नो पर हरगिज इबारत लिखने की इजाजत नही देता जो  ब्लोगिंग  को रणभूमि बनाने की भावना रख बार बार वही गलती दोहराते है। दास्ताने उन्ही की याद रहती है जो मोत को हथेली पर थामकर उसे बेफिक्र, बेपरवाह, बिंदास ,होकर सच की तलाश मे हिंदी  ब्लोगिंग  के सफर मे सागर के लहरो  की तरह हमेशा-हमेशा चलते रहते है।  जब आप नई लकीर अपने ब्लोग पर खीच रहे होते है तब मुखालफती ना हो तो दुनिया का सबसे बडा सुखद आश्चर्य होगा। लेकिन खिलाफत और विद्रोह के उस मोड पर खडे  जाने कितनी हस्तिया लडखडा जाती है। होश हवास खो बैठती है, लेकिन आप हम हरगिज ऐसा ना होने दे।
हिंदीजनो! मेरे मित्रो! ब्लोगरो!
चुनोतियो से घबराकर भागने के बजाय बुलंद जज्बातो से मुकाबला करना हमेशा हमारा शगल बना रहे, ऐसा लक्ष्य अपेक्षित है।

परवाह नही अगर जो जमाना खिलाफ हो
राह वह चलुगा जो नेक और साफ हो॥

इस नाजुक दोर के चोराहे पर खडी हिंदी ब्लोगिंग, फर्श पर सिसक-सिसक कर मोत के दिन को करीब आते  देखने को बेबस है। "मै नंबर वन"-"मै नंबर  वन", के चक्कर मे हिंदी ब्लोगिंग  सामन्तवादी  विचारधाराओ के भेट ना चढ जाऍ। हमे क्वान्टिटि  की बजाय क्वालिटी,शासन के साथ अनुसासन की जरुरत महसुस हो। अनुशासन का डंडा  चलाने वालो को सबसे पहले "निज पर शासन फिर अनुशासन" की कहावत पर गौर फरमाना चाहिऍ। हमे हिंदी ब्लोगिंग  की महान धरोहरो के साथ पंगे -बाजी लेने से बचना चाहिऍ तो उन्हे भी बार बार जुने पुराने होने का वास्ता देने की जरुरत नही। "ओल्ड इज गोल्ड" वाली काहवत सब जगह सही नही ठहरती, जैसे दवाई की शिशी पर तारीख पुरानी हो जाती है तो उसे एक्सपाईरी माना जाता है। कभी कभी नई चीजे भी मुल्यवान होती है-सार्थक होती है।
हर व्यक्ती का अपना महत्व है।  व्यक्ती अपने गुण से, अपने व्यक्तित्व से, अपने चरित्र व्यवहार से जाना जाता है, यह सभी बाते ही आदमी को ऊँचा बनाती है, ना कि आप फंला  क्षैत्र के जुने-पुराने लिखाडे हो।

इस धुआधार अंधेरो  से गुजरने के लिए
सूने दिल से कोई मशाल तो जलानी होगी।

हिंदी ब्लोगिंग  को दोहरेपन के शिकंजो से आजाद करना पडेगा।  यह लडाई किसलिऐ ? कोनसी विरासत हाथ लगने की आश है हमे ?  क्या हम मिलजुलकर, भाईचारे से, एक दुसरे की मान-मर्यादाओ एवम स्वाभिमान का ख्याल रखते हुऍ ब्लोगिंग  नही कर सकते ? अपेक्षा मात्र इतनी है, की हम सभी इमानदारी से हिंदी चिठठाकारी के चहुमुखी विकास पर ध्यान केन्द्रित करे।
समय-समय पर नऐ ब्लोगरो को भी प्रोत्साहीत करे। अपनी चर्चाओ मे उन्हे सम्मिलित करके, उन्हे मार्गदर्शन दे।  झगडा कब उत्पन होता है, जब हम किसी की बार बार उपेक्षा करे। अपनी दुकान की मिठाई, रिस्तेदारो मे मिलबांटकर  खाने से पडोसी खुश नही होता, उसके मुंह  मे भी मिठास पहुचे अपेक्षा बनी रहती है।
सच पहले भी वो ही था जो आज है और कल रहेगा। जो लोग लकीर खीचकर उसे आखिरी रास्ता मान बैठते है उन्हे बैकवर्ड होने से, पिछडने से कोई रोक नही सकता। मेरी निगाह मे चिठठाकारी जीवन मे मर्यादा निहायत जरुरी है। यह तो वैसे ही है कि आप तरक्कियो के रास्तो को अपने हाथो से बनाते है, उन्हे बुलन्दियो पर शुमार करने के लिए अगली पीढी के हाथो सुपुर्द कर देते है। यही उत्तम तरिका है  ओर मंगलमय भी .
आज हमे गर्व होना चाहिऐ की समीरलालजी, ज्ञानदत्तजी, रामपुरीयाजी, शास्त्रीजी, अरविन्द मिश्राजी, राज भाटिय़ा. जैसे वरिष्ट् लोगो का साथ मिल रहा है तो आशिषजी खन्डेलवाल, शिवकुमारजी, सन्जयजी बैगानी,    रतनसिहजी, जैसे युवा प्रतिभावानो का मार्ग दर्शन भी मिल रहा है।
इस इरादे के साथ..........................

तू चल रे नजीर
इस तरह से कारवॉ के साथ
जब तू न चल सके तो तेरी दास्ता चले।

आप मेरी भावनाओं में छुपे दर्द को को समझे. कोई व्यक्ति विशेष के लिए यह बाते नहीं कही गई है. मात्र  ब्लोगिग एवम हिंदी ब्लोगरो में एक दूसरो के प्रति आदर भाव, प्रेम भाव, की चाहत लिए यह पोस्ट को लिखा गया है. मेरी गुजारिश है सभी छ: हजार हिंदी चिठाकारो से  की वो मेरे विचारों की मूल हार्द को जाने पहचाने व सभी दो शब्द टिपण्णी के माध्यम से शपथ ले......................
* आज से हम सभी हिंदी चिठठाकार एक दूसरो को मान-सम्मान देंगे,ओर लेंगे.
* अपने ब्लोगिंग जीवन के व्यवहार में स्वस्थ प्रतिशपर्धा को अपनाएगे.
* विषय से हटकर किसी साथी ब्लोगर के खिलाफ़ ना लिखेगे, ना ही उसका समर्थन करेगे.
* वरिष्ठ ब्लोगर,छोटो को प्यार देगे....छोटे, मान-सम्मान देकर वरिष्ठ ब्लोगरो का आशीष एवम स्नेह पाने का लक्ष्य बनाए

भूर्ण-हत्या- कैसे बना दानव - मानव ?

✪ 10 comments
प्लिज मम्मा, मुझे मत मारो, मुझे भी भैया के साथ खेलना है।

भारत की संस्कृति विश्व की सर्वोच संस्कृति है. संस्कृति हमारी धरोहर है, विरासत है, अंहिसा की प्रतिध्वनी में फलने वाली इस देश की धरती पर आज चारो तरफ हिंसा का नाद है. कहते है यह इक्कस्वी सदी महिलाओं की है. प्रश्न उठाता है फैशन , नशा, भ्रूण हत्या, अनुशासनहीनता जीवन, अनावश्यक संग्रह की मनोवृति जैसी प्रवृतियो में तेजी से बढ़ती हुई महिलाये क्या अपनी  संस्कृति  का सम्यक निर्वाह कर रही है ?  भ्रूण-हत्या  इस सदी की सबसे बड़ी त्रासदी है.

उड़न तश्तरी .... समीर लालजी ने दो दिन पहले  एक पोस्ट लिखी थी , उसमे समीरजी ने लिखते हुए कहा - "शायद कहीं आपको छुए/ झकझोरे". पूरा का पूरा मनडा ही  खर-खर हिल गया . कविता के माध्यम से समीर जी ने भ्रूण हत्या पर जो त्रासदी बया की  आँसूओं की धार मेरी आँखों से भी निकल पडी और गंगा में समाहित हो गई. आप भी देखे समीरजी ने व्यथित  मन से जो भाव प्रकट  किये  और शब्दों के माध्यम से कन्याओ की भ्रूण हत्या पर समाज को जो फटकार लगाईं  वो प्रंसनीय तो है ही वर्तमान में इस ओर  कठोर रूप से अजन्मे बालको की हत्याओके विरोद्ध में जनचेतना के लिए बेहद मार्मिक और सशक्त अभिव्यक्ति अग्रषित की  है. 
बुजुर्ग बताते थे कि सपनों का आधार आपके दिमाग के कोने में पड़े वो विचार होते हैं जिन्हें आप पूरा होता देखना चाहते हैं किन्तु जागृत अवस्था में कुछ कर नहीं पाते. कह नहीं पाते और मूक दर्शक बने उन्हें अपने आसपास होता देखते रहते हैं. ऐसे विचार सपनों में आकर आपको झकझोरते हैं, जगाते हैं.
एक कविता, बिना किसी भूमिका के, प्रस्तुत करना चाह रहा था, इत्मिनान से पढ़ें और शायद कहीं आपको छुए/ झकझोरे, तो दाद दिजियेगा.
गंगा,
जो शंकर  की जटाओं से
नहीं निकली..
वो है
एक उस  क्न्या के 
आँसूओं की धार
जो जन्मीं ही नहीं..
सांस लेने के पहले
उसे मार दिया गया..
भ्रूण में ही..
शायद इसीलिये
गंगा के होते हुए भी
वो धरती
मरुस्थल है...........

पराया देश,  पर राज भाटिया जी ने भी भ्रूण हत्या जैसे  कृत्य  को कंस की संज्ञा दी . उन्होंने समाज से  अपने दर्द भरे दिल से  की प्रश्रन लिख छोड है, जो विचार करने योग्य है. बडे ही दुखी  मन से पर गुस्से  से समाज में भ्रूण हत्या जैसे जधन्य  अपराध  पर लिख मुझे यह पोस्ट लिखने  को प्रेरित  किया है.  आप सभी देखे राज भाटियाजी ने  समाज में भ्रूण हत्या को लेकर मानव कैसे बना  दानव  ? उन्होंने इसे एक  आन्दोलन के रूप में लिखा  है जो एक मानव एवं स्रष्टि  के हित की बात है.
जो मां बाप कोख मै ही बेटी को मारे, उसे आप क्या कहेगे ? जो ड्रा पेट मे किसी बच्ची को जन्म से पहले ही मार दे उसे आप क्या कहेगे ?
अजन्मे को मोत के मुंह मे धकेलना क्या अच्छा है, अगर वो बच्ची है तो क्या वो कलंक है ? अरे जिस के पेट मै है वो भी तो कभी बच्ची थी.... जो परिवार ऎसा करे उस परिवार से नाता तोड ले.... रहने दे उन्हे अकेला... उन के लडके को कोई बहू मत दो... आओ मिल कर इन गंदे कृत को रोके.... आओ मिल कर हम इस कंस को मारे..

भ्रूण हत्या यह मानव समाज में  ऐसा  कोढ है जो संक्रमण की तरह फ़ैलता जा रहा है, जो सभी समाज के भाल पर कलंक टीका है. आज एबोर्सन एक फैशन  बन गया है. जो माँ ममता की मूर्त होती है अपनी ममता के विस्तरत आंचल में बच्चे को दुलारने-सहलाने वाली माँ ऐसा जधन्य अपराध कर सकती है. कल्पना से परे की बात है. जिसके उर में बेपनाह ममत्व हिलोरे लेता है, कैसे  वह उस संतति की निर्मम ता से ह्त्या करवाकर "माँ"  कहलाना कितनी विडम्बना है.  इसमे पुरुष में बच  नहीं सकता क्यों की इस अपराध में वो भी बराबर का हिस्सेदार है.
आज हम सबको मिल बैठकर चिन्तन विचार विमर्श करना है की प्रक्रति ने सहज स्वाभाविक रूप में माँ की ममता के आंचल की ओर अग्रसर किया , उस पर तुषारापात ओर कुठाराधात क्यों ?
लोगो मुझे  "टाइगर" कहते है . आप मनुष्य मुझे जानवर की श्रेणी में गिनते है. पर हमारे जानवरों में अपने अजन्मे बच्चो को मारने की कोई रिवाज नहीं है. फिर यह सवाल आप के लिए जानवर कोन हुआ ? 
आप या हम  ?


आज हिंदी दिवस है कोई तरह से मै दकियानूसी वाली बात नहीं करुगा-मुंबई टाइगर

✪ 12 comments
आज हिंदी दिवस है कोई तरह से मै दकियानूसी वाली बात नहीं करुगा आज के हिंदी बर्थ डे कों बड़ी ही प्रसंता से मना रहा हू . आज मै ने यह निश्चय किया की कोई भी हाल में हिंदी भाषा कों बढावा मिले, सहजता से लोग 
अपनाए , अपनी प्रिय भाषा बनाए, इस और मेरे जंगल राज में प्रयास करुगा. हिंदी मेरी माँ  है  मै उसके लिए कुछ भी कर गुजरुगा......
मै हिदी ब्लोग जगत कों बधाई देना चाहाता हू की विगत वर्षो से हिंदी भाषा कों सरल, सुगम बनाया जिससे सैकडो लोगो ने अपनाया आप सभी इसी तरह इसे बढावा देते रहे. 

मै प्रससा करना चाहता हू हिंदी टेलीविजन मीडिया की जिसने हिंदी बोलने वालो कों शर्म से निजात दिलाई. अब लोग हवाई जहाज , ए. सी. रेलवे कोच, फाई स्टार सेवन स्टार होटलों में वेटर से लेकर ग्राहक तक बिना शर्म के हिंदी में बोलते हुए देखे गए. मै धन्यवाद देना चाहता हू अमिताब बच्चन  कों की उन्होंने "कोन बनेगा करोड़पति" कार्यक्रम से लोगो कों हिंदी में बोलने  पर गर्व करना सिखाया . 

आज हम कुछ कमियों का रोना नहीं रोये तो  अच्छा है, बस एक ही आवाज हो हिंदी है हम हिन्दुस्थान हमारा .

आप को भी हिदी दिवस पर हार्दीक शुभकामनाऍ।आपका मुंबई टाइगर 

पाकिस्तानी ब्लोगरिया कहे छु छु कर रिया है ?

✪ 12 comments
बहुत दिनो से सोच रहा था क्या लिखू ? कोई भी विषय हाथ नही लग रहा था। कहने का अर्थ है किसी विषय की पुछ हाथ मे नही आ रही है। चारो तरफ सन्नाटा है। लगता है दुनिया मे खबरे बनना बन्द सी हो गई। देश मे स्वाईन फ्लू के बाद जिन्ना/ जसवन्त फ्लू ने रफतार पकडने की कोशिस की पर साला बिच रास्ते ही दोनो कि टॉय-टॉय फिस हो गई। आडवाणी चुनाव क्या हारे समझो जिवन से सन्यास ही ले लिया। चुनाव के पहले प्रधानमन्त्री को अब तक का सबसे 'वीक' (कमजोर) बताने वाले खुद आडवाणी चुनाव हारने के बाद इतने कमजोर पड गऐ की बेचारे.... आर एस एस प्रमुख को विटामिन्स की डोज देने दिल्ली पहुचना पडा।आज पाकिस्थान के ब्लोगरो को पढ़ने निकल पडा . देखा तो अपने जसवन्तसिह जी  और जिन्ना से वहा के ब्लॉग अटे पडे है. बहुत से हिंदी वेब साइटों के हवाले से जसवंत सिह जी  को  जस्टीफाई करने की भरसक कोशिश की गई.  तो भारतीय ब्लोगर भी अपना मत रखने में पीछे नहीं रहे.

जसवन्तसिह की पुस्तक ने मानो  की बीजेपी को चकते में डाल दिया.  उधर इस विवाद में पाकिस्तानी ब्लोगरो ने बीजेपी द्वारा जसवन्तसिह की बर्खास्त गिरी (दादागिरी) की आलोचना की. एक पाकिस्तानी ब्लोगर ओवेस एहसन {Owais Ehsan, a Pakistani blogger.} ने -" बीजेपी एक असहिष्णु पार्टी है. और कभी सच  को स्वीकार नही करेगी. भले ही यह उसके अच्छे खासे पढे लिखे और प्रसिद्ध पार्टी सदस्यों की और से आए . " पार्टी से जसवन्तसिह के निष्कासन को लेकर भारत के खिलाफ बहुत टिप्पणिया आई है. एक अन्य पाकिस्तानी ब्लोगर सज्जाद आवं {Pakistani blogger, Sajjad Awan} ने कहा ," भारत को दुनिया को अच्छी सदभावना  दिखानी चाहिए की वह अपने लोगो के सूझवो, विचारों , चर्चाओं और सोक का स्वागत कर रहा है. "

एक अन्य ब्लोगर कलसुम {Kalsoom, yet another blogger.}  ने कहा-"हास्यास्पद बात यह है की सिह का वैचारिक सधर्ष बीजेपी के साथ उसी तरह का है, जैसा जिन्ना का काग्रेस पार्टी के साथ था. दोनों पार्टी विचारधारा के सक्रीय प्रस्तावक थे और दोनों ही बोद्धिक असहमति के बाद खुद को अलग कर लिया. अंतर सिर्फ इतना है की सिह ने राष्ट्रवादी दक्षिणपंथी पार्टी का समर्थन करने से अपना आधार बदलकर बोद्धिक उदारवाद की और कर लिया है. जबकि जिन्ना धर्मनिरपेक्ष थे, उदारवादी नीतियों का त्याग करकठोर  और साम्प्रदायिक नीति को अपनाकर  जनता को अपने पक्ष में किया . कुछ ब्लोगरो ने तो स्वतंत्रता सघर्ष के दोरान कांग्रेस की भूमिका की आलोचना की है. अपने भारतीय ब्लोगर सुभम {Shubham, an Indian blogger.} ने तो कहा -" जब भगत सिह , चन्द्रशेखर ,अश्फाक-उल्ला -खान, राम प्रसाद बिस्मिला देश को एक करने के लिए लड़ रहे थे  टीबी कांग्रेस  और मुस्लिमलीग दोनों समुदाय के बिच  खाई पैदा करने की कोशिस कर रही थी.

भारत में   धर्मनिरपेक्षता  और लोकतंत्र की आलोचना से जुड़े मुद्दे पर अपनी राय जाहिर करते हुए भारतीय ब्लोगर कपिल राजेश पांडव {Indian blogger, Kapil Rajesh Pandav } ने कहा "बीजेपी ने हमे बदनाम किया है. यह हमे कही का नही छोडेगी. इसके बावजूद हमे कांग्रेस का मुकाबला करने के लिए बीजेपी की जरूरत है.ताकि लोकतंत्र का अस्तित्व कायम रहे.

जसवन्तसिह को क्रांतिकारी बताते हुए संजीव मिगलानी ने कहा -" सिह को कुछ   आशर्यजनक समाधान मिल गया है  मेरा मानना है कीउन्होंने  न सिर्फ एक पुस्तक लिखी है बल्कि उन्होंने क्रान्ति सुरु कर दी है.

भाई मेरा ऐसा मानना है की यह सभी टाइम खोटी करने का समय नही है .  ना जसवन्तजी ने जिन्ना को देखा ना हमने तुमने  फिर काहे फ़ोख्ट में बजा रहे है ?  घडी दो घडी कुछ अच्छा काम कर ले देश याद करेगा. यह जसवंत सिह जी भी काहे टाइम पास करने जिन्ना पे लिखे, अरे भाई, हमार देस मा कोनोही सब्जेक्ट नाही  बचा का ?  लिखना हो तो लालू है हमार ताऊ है ताऊ का गयन भैसियंन है बावली बुच जितना चाहो लिखो कहे बाउंड्री पार गेंद फैक्त है . का ?  समज़े के नाही ? और यह पाकिस्तानी ब्लोगरिया कहे छु छु कर रिया है ? टोपी सभाल हवा तेज चलत है भाई! पा..... की..... स ...... था....... न........
 
गांधीजी के साथ जिन्ना 
                                                                              


कुछ पाकिस्तानी ब्लोगर कोदेखे 


मेरा फोटो
Sohaib Qureshi
Wednesday, August 19, 2009
                                     Jinnah: India- Partition- Independence by Jaswant Singh

                                                                         
Owais Ahsan
Owais Ahsan

Education

Sir Syed University of Engineering and Technology
Pakistan Islamia Higher Secondary School

स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं

✪ 12 comments
 

अदने से आदमी के ऊपर टनो शब्द उडेले जा रहे है किन्तु शब्दो के निचे दबा आदमी जिन्दा है

✪ 6 comments
शब्द-अविष्कार
मै आजकल शब्दो के महासमुन्द्र मे डूब रहा हू। कुछ समय से हिन्दी ब्लोग जगत के भिष्मपितामाह कहे जाने वाले श्री ज्ञानदत्तजी नये शब्द-अविष्कार करने की ठान बैठे है। कुछ शब्दो को आम जनता के लिए खोलकर पान्डेजी सुकुन भरी ब्लोगेरी कर रहे है। उनका यह इवेन्ट कब तक कम्पलिट होगा यह तो बहृमाजी को पत्ता है या स्वय पान्डेजी को।ज्ञान दतजी हमेसा नऍ शब्दो की जुगाड मे रहते है। वो नये शब्दो को भू-भाग पर लाना चाहते है।

उन्होने नई शब्द सरचना की कोशिस की । आप देखे वो अब तक कोन-कोन से नए शब्दो को पाठको को पेल चुके है।
* इण्टरनेटीय डोलची
* टंकियाटिक पोस्ट
* चिठेरे लुंगाड़े
* मैं नये शब्द तलाश रहा हूं – बड़े और गरुह शब्द नहीं; पर नयापन लिये सहज ग्राह्य शब्द। लगता है कि पुस्तकों की ओर लौटना होगा। हिन्दी पुस्तकों की ओर।
अगर आपको पाठक बांधने हैं तो मौलिकता युक्त लिखें या फिर अश्लील। दुन्नो नहीं है तो काहे टाइम खोटा किया जाये।
* साइबरित आप को नया शब्द लेना होगा उसके लिये। क्या है वह? साइबरित्य है?
खैर कोई बात नहीं अगर आपको "साइबरित्य" शब्द पसन्द नहीं आया। नया शब्द गढ़िये। असल में आपको नया शब्द गढ़ना ही होगा। एक नया फिनॉमिना पुराने शब्द से समझाया नहीं जा सकता!
* डिसिप्लिनाचार्यों
* चिरकुटई
* पिल
* ठेलिये

शब्दो के भवर मे आम आदमी इतना फ़स चुका है कि अब वो डरने लगा है। आदमी के आगे-पिछे, उपर निचे, दाए-बाए शब्द ही शब्द है।
सुबह उठते ही टीवी खोलो तो शब्द। आधी रात को निन्द उचट जाए, टीवी खोलो तो शब्द हाजिर। समाचार पत्र देखो तो वहा भी शब्द कुण्डली मार कर फ़ुफ़कार रहा है। ऎसा लगता है कि अदने से आदमी के ऊपर टनो शब्द उडेले जा रहे है। इतना शब्द वजन आदमी पर डाला जाए तो बेचारा आदमी घुटकर तडफ़ तडफ़ कर मर जाएगा। पर ताजुब है कि इतने इतने शब्दो के निचे दबा आदमी जिन्दा है। शब्द फ़ैकना लिखाडो की मजबुरी है झेलना आम आदमी की। आम आदमी को अर्थसयोजन से कुछ प्रयोजन नही है, न सन्दर्भ से, न शब्दो के प्रसग से मतलब है, न शब्दो के भाव से, नेता हो या कवि रेडियो जोकी हो या समाचार वाचक, चिठ्ठा लेखक हो या चिठ्ठी लिखने वाला नेता या मन्त्रि सबके पास केवल शब्द है।

एक दिन तो हद हो गई मेरा मोबाईल घनघनाया. मैने उठाया. उघर से एक युवक की आवाज (शब्द) आ रही थी- "हाय! आप बहुत क्यूट लग रहे हो . मुझसे दोस्ती करोगे ? ". *शब्द सुनते ही घबराहट मे मोबाईल छूटकर जमीन पर गिर गया। जमाना बडा खराब हुआ पडा है जी! आदमी से दोस्ती के नाकारात्मक अर्थ भी हो सकते है। शब्दो का क्या ठीकाना.

हर पल हर घडी इतने शब्द की मै निशब्द होना भूल रहा हू। मेरी भी मजबुरी है क्यो की मेरा धन्धा ही शब्दो का है। जिन्हे मै सलाह दे रहा हू वह भी शब्द प्रपच है। जिसे भाषण सा प्रवचन कहा जाता है वह शब्द की माया है। यहा तक कि कविता, कहानी, उपन्यास शब्दो की जादुगरी है।
यह जो मै लिख रहा हू शब्दो का करतब है। कोई पढे ना पढे मेरी बला से।
मेरे एक परिचित मेरा लेख कभी नही पढते। एक तो मै उनसे पुछता या पढने का आग्रह करता नही। पुछ लिया तो कहेगे- "सारी! मै व्यस्त था।" "किस दिन छपा था ?" हॉ, उनकी कोई किताब छप जाए तो जबरन थमा जाएगे, और फ़ोन कर पूछेगे भी-" कैसी लगी ?" मै उनसे कैसे कहू कि वहॉ मात्र शब्दो की बाजीगरी है। ताजुब होता है इतने-इतने शब्दो की जरुरत किसे है ?

एक दिन एक कार्यक्रम मे गया बोलने कि मेरी जरा भी ईच्छा नही थी। मै दो धण्टे ढेरो शब्द सुनता रहा। हद तो तब हो गई जब अन्त मे मुझसे कहा गया-"आप दो शब्द बोल दे!" शब्द की ऎसी खुजली मची की मै दो के बजाय दो हजार शब्द बोल गया। पाच-सात शब्द तोडको ने सैकडो शब्द ढाई घण्टे मे उडेल दिऎ। 100-125 सुनने वाले तो शब्दो के वजन तले इतना दब गऎ की बैठे-बैठे कुर्सी पर ही लुडक गऎ।
बाद मे सोचा, इन शब्दो की न मुझे जरुरत थी न श्रोताओ को। क्या शब्द के बिना जीवन, जीवन नही होता. ?
आजकल एक शोघ पत्र तैयार कर रहा हू शब्द की उत्पति कहा से हुई। प्रथम शब्द किसने बोला। यही शोघ का विषय है। इस शोघ के लिए मुझे लाखो शब्द की जरुरत पडेगी। शब्दो का भण्डार जमा करके मे समझाऊगा कि शब्द क्या है ?
हालाकि इसका यह अर्थ नही की मै शब्द समझ गया हू। मुजे केवल दुसरो को समझाना है।
अपने आपको  औरो से श्रेष्ट "शब्द-लिखाडीया" दिखाने के लिऎ शब्दो की कान खिचाई  करना फ़ैशन बन पडा है,मुह हिन्दी का-टाग अग्रेजी की,कभी मुह भोजपुरी का और टाग हिन्दी की और पुछ अगेजी की। भाई यह कोनसा शब्द सर्जन है ?
कहते है- बिटवा! (बेटा) इबे (अब) तु कन्फ़ियुजीया(भटकना) गया है। जी! मै शायद ऎसे हजारो नये शब्द सर्जना से डर गया हू ।
कैसे कैसे शब्द होते है। शब्दो मे भी कई जातिया है। रुलाने वाला शब्द, हसाने वाला शब्द, कोई डरानेवाला शब्द, कोई शरीर मे रन्ग तरन्ग रोमाचित करने वाला शब्द, सेक्सी शब्द। इसमे सबसे खतरनाक गाली-गलोज वाली शब्द-माला है। कुछ वर्षो से गालिया देने वाले शब्दो का जोर शोर से विस्तार और सर्जन दोनो एक साथ हुआ है।
सोचता हू शब्दो को विश्राम देकर मोन व्रत रहने के प्रयास करके देखु शायद लोग सुखी हो जाए.

नोट यह मेरी सोच है इस लेख को  मेने व्यगात्मक शैली मे लिखा है। आदरणीय ज्ञानदतजी की नई शब्द सजृना की सोच ने मुझे लिखने के लिऍ प्रेरित किया है। इसे पढते समय मन हल्का बनाए रखे। क्यो की इसमे जो भी नाम सन्दर्भ के तोर पर लिए गए है वो हमारे आदरणीय है। फिर भी कही कोई बात से कष्ट हो तो मै क्षमा चाहता हू।
मुम्बई टाईगर

राखी का राम मन का मोहन स्वयवर से भागा: दुल्हे ने कहा ना बाबा ना

✪ 14 comments




राम कि तलास मे सीता बनी राखी

वहा भाई वहा! कुछ दिनो से चर्चा मे रहा कलयुगी "स्वयवर" के एक दुल्हे ने राखी सावन्त को ना बोलकर रिजेक्ट कर दिया। प्रोग्राम के फोरमेट के अनुसार केवल राखी को ही वो अधिकार थे की किसी भी बनावटी "देवदास दुल्हे" को रद्दी की टोकरी मे फैक सकती है। किन्तु यहॉ उसके ठीक उल्टा  
"छोरा गगा किनारे वाला" पावन धाम "ऋषिकेश" के मनमोहऩ तिवारी ने तो आव देखा ना ताव दो दिन पुर्व ऋषिकेश कि हॉटल मे जहॉ राखी सावन्त ठहरी हुई थी रात मे जाकर राखी को "रिजेक्टवा" कर दिया, यानी शादी ना करने की बात कर राखी को  "जोर का झटका धिरे" से दे दिया। राखी हतप्रत थी कलयुगी राम बनेने चले मनमोहन के वकीलिया बुद्धि को लेकर। मनमोहन ने राखी को जहॉ ना बोला वहा स्वयवर आयोजित करने वालो की भुल हो गई की होटल मे कैमरे नही थे। बस वही मनमोहन ने वकीलिया बुद्धि यूज कर डाली और ऑफ द रिकार्ड राखी से बात कर आया। राखी ने बाद मे ऑन रिकार्ड टीवी मे मनमोहन को भलाबुरा कहा। राखी ने कहा-" मनमोहन मेरे ड्रायवर और सैक्रेटी से गया गुजरा है, राखी ने आगे कहा-" मुम्बई की सडको पर हजारो मनमोहन घुमते है।" कहने का अर्थ "खिचीयानी बिल्ली खम्बा नोचे।"
 इससे यह बात तो साफ हो जाती है शादी जैसे पवित्र बन्धन का कलयुग मे बाजारीकरण नही किया जा सकता। आजके युग मे जिस राम कि तलास मे सीता बनी राखी जिस रास्ते निकली पडी थी, उसी स्वयवर के सभी  उम्मेदवार प्रसिद्धि, नाम, गैलमर के चक्कर मे भारतीय सस्कृति का बन्टाधार करने को तुले थे। इसका अन्त क्या होगा यह तो पत्ता नही, पर क्या राखी ने चैनल से मिलनेवाले कुछ धन-बल के चक्कर मे,  
स्त्री धन {मर्यादओ- सस्कारो-और भारतीय सस्कारो-परिवारिक सामाजिक मर्यादाओ} को अरक्षित/ असुरक्षित नही किया ?

क्या प्यार ब्याह इतना बाजारु हो गया की खुल्ल्म खुल्ला सडको पर किया जाऍ ?  
राखी पुछती है -" मै आईटम गर्ल हू यह बात शादी मे रोडा तो नही बनगी ?"
अरे राखी जी !  आप "आईटम गर्ल" है तो यह लडके कोन से दुध के धुले हुऍ है सभी तो आईटम-बॉय है।
हम तो भगवान से दुआ ही करेगे की राखी इस स्वयवर मे एक पति को जीते व जीवन भर यह रिस्ता मजबूत रहे।

 सभी के लिए जितनी जिम्मेदार राखी है,  उतने ही उसके उम्मीदवार डायरेक्टर, निर्माता, स्टोरी लेखक, चैनल भी है। अब शो देखने वालो के लिए क्या कहू ? क्यो कि मै भी तो  देख रहा हू।
"पैसा फैक तमाशा देख," भाई! पब्लिक है यह सब जानती है।

धनचक्कर गुरु हम स्वय है।

✪ 14 comments


 GURU
फोन पर सारथी वाले शास्त्रीजी से बातचीत हो रही थी। शास्त्रीजी ने पुछा-" ओर धन्धा-पानी कैसे चल रहा है ? " 
मैने कहा-"गुरुदेव मन्दा है।"  
शास्त्रीजी ने राय दी क्यो ना आप किसी अदद ज्योतिष गुरु को पकडे, और कुण्डली बताए।" 
मैने विस्मय भाव से कहा- "गुरु! इसके लिए भी "गुरु" बनाना पडेगा ?" 
अक्सर टीवी मे ज्योतिषगण चोबिसो घण्टे कुछ ना कुछ समझाते ही मिलते है। मुझे लगा अब इन महाज्ञानीयो से बच पाना नामुमकिन ही है।
फलतः मै अपनी जन्म कुण्डली समेत एक लेपटॉपधारी पन्डितजी की दुकान पर गया तो वह उल्ट-पल्ट कर बोलते गए- " वत्स तुम्हारा फेस देखकर ही मालुम दे रहा है कि गुरु के प्रभाव का जातक होने के चलते मामला अत्यन्त धातक है, अगले माह से गुरु वक्रि है, आगे सकट ओ‍र भी प्रचन्ड है, आठ महिने के बाद गुरु फिर से अपनी मूलमार्गी चाल मे लोट आएगा, उसके बाद ही शुभ फल देगा, सब ग्रहो की चाल का परिणाम है बच्चा।" अगर अनिष्ट फल से बचना चाहते हो तो अपने घर पर पुजा रखवा लो।"
मै मन ही मन बोला,-" पण्डितजी महाराज! ग्रहो की चाल का तो मुझे पता नही, लेकिन आपकी चाल जरुर मेरी समझ मे आने लगी है।" 
बहराल, मै इतनी जटिल विधा पर शका करके पाप का भागीदार नही बनना चाहता था। सो चुप ही रहा। धर्म मै विश्वास जरुरी है। फिर भीतर भीतर कही यह डर था कि जब बडे बडे तक अपने गुरुओ की वक्रि चाल के लपेटे मे आ जाते है तो मेरी क्या ओकात?
कहा गया है प्रबल गुरु मिल जाए तो फलदायी है अन्तथा कष्ट ही कष्ट है। 
बहराल, ये पण्डितजी तो गुरुओ के भी गुरु निकले। 
झटपट उन्हे दक्षिणायित किया और मै वहॉ से फुट लिया।
पुनः घर आकर 29"  बुद्धु बक्से (टीवी ) का रिमोर्ट  लेकर चैनलो के मनके जपने लग गया हू। किसी नए गुरु की तलास मे  हू। 
ऐसा भी नही है कि मेरा "गुरु-चोट की चपेट मे आना पहळी बार हुआ है, विघाज्ञान का श्री गणेश गुरुजी के डन्डे से ही हुआ था। आज भी हाथ की हथेली पर तकदीर की लकीरो से ज्यादा सन्टी के निशान ज्यादा है।  
जब भी मेरे मित्र जयपुर वाले आशिषभाई खण्डेलवाल पुछते है कि -"कहो गुरु", का हाल है ?" मुझे तत्काल अपने स्कुल के गुरुदेवगणो की तुडाई याद आ जाती है। उस टाइम नारा लगाए करते थे -

"छत्रन गुरु की क्या पहचान, 
हाथ मे सोटा, मुह मे पान।"

इस गुरु गाथा मे वे नागपुर वाले गुरुजी भी आते है, जिनकी लाठी आज भी बीजेपी वालो को सियासत की वैतरणी फन्दवाने के काम आती है।

इस दुनिया मे एक से एक गुरु हुए है और एक से बढकर एक गुरुघन्टाल भी हुए है।
सच्चे भी कच्चे भी।  
धर्म गुरु भी।  
अधर्म गुरु भी।  
डान्स के गुर।  
रोमास के गुरु।  
म्यूजिक के गुरु।  
अखाडे के गुरु।


 खैर, मेरे ताजा-ताजा उपजे कनपुरिया धनचक्करगुरु ने मुझे  गुरुमन्त्र दिया है कि फसना ही चाहता हू तो "टेक्स गुरुओ" के चक्कर मे फसू अथवा शेयर गुरु की चरण मे जाऊ।

योग गुरु की बॉहे थामू। मैनेजमेन्ट गुरु से कला सीखू।  आज बाजार मे फैशन गुरु से लगाकर ई गुरु, 
ब्लोग गुरु, तमाम   ब्रान्ड के गुरु उपल्ब्ध है। 

 इस लेख को व्यग के रुप मे पिरोया गया है।
जाने अनजाने किसी को कष्ट हुआ हो तो मै  क्षमा मागता हू।

बाबा श्री समीरानन्दजी महाराज ने ताऊ को दिया निम्बु मिर्च

✪ 12 comments
ताऊ ने लगाया निम्बु मिर्च
स्वर्गलोक मे कल रात बाबा श्री समीरानन्दजी महाराज गहरी निद्रा मे सो रहे थे । बाबाजी ! सपना देखते है, कोई चिठ्ठाकार दोनो हाथ से धोती पकड कर व बाहो मे लठ लिए हाफता भागता स्वर्गलोक कि ओर आ रहा है।  पिछे लोगो का हुजुम उस पकडने के लिए भाग रहा है।  
बाबा श्री समीरानन्दजी महाराज ने अपनी दिव्यदृष्टि लगाकर देखा। अरे! यह तो अपना शिष्य  हिन्दी का चिठठाकार ताऊ है। ताऊ से बाबा श्री समीरानन्दजी महाराज ने पुछा -"क्या बात है ताऊजी ?" बडे ही चिन्ता के भाव लिए मेरे दरबार मे आऐ हो ?" और यह लोग कोन है जो तुम्हारे पिछे लगे है ? और क्यो?"
ताऊ ने अपने गले मे पडे गमचे से पसीना पुछा और बोला- "महाराजजी! यह सभी असन्तुष्ट प्राणी है।  मेरे तेरह महीने के ब्लोग कार्यकाल के प्रसिद्धि एवम सफलता को कुछ लोग पचा नही पा रहे है। इनकी बदहजमी यहॉ तक पहुच गई की मेरे एवम "ताऊ डाट इन" के खिलाफ मोर्चा खोल बैठे है। 
बाबाजी! आपने मुझे यह किस झमेले मे डाल कर आप स्वर्गधाम मे आराम फरमा रहे है।"
बाबा श्री समीरानन्दजी महाराज  ने चुटकि बजाई तभी अप्सराए हाजिर हुई। 
समीरानन्दजी महाराज-  अप्सराओ कि और मुख्खातिब होते हुऍ बोले -" यह हमारे सेले ताऊ है। बहुत दुर धरती-लोक से आऐ है। थके प्यासे है। पहले तो तुम एयरकन्डीशन (A/C) चालु कर दो,
फिर दो गिलास शरबत हाजिर करो।" अप्सराए शरबत लाने चली गई।
अब बाबा श्री समीरानन्दजी महाराज  ने अपने मुख से अमृताशब्दो कि बारिश करते  हुए ताउजी से कहते है-" देख ताऊ! तुमने "ताऊ डाट इन"  को एक साल चार महीने मे जिस बुलन्दियो पर पहुचाया है यह बात मुझे भी हजम नही हो रही है  ! तो इन तुच्छ मानवो कि क्या बिसात जो बिना जले रह सकते है। उन्हे जलना तो था ही। यह "जलशी" का किडा तो प्रत्येक मानव मे मैने फिट कर रखा है। और टेशन नही लेने का ताऊ! 

कोई रेडीमेड सफलता तो मिली नही तुम्हे , चिठठाजगत मे रात दिन कि कडी मेहनत, सकारात्मक, रचनात्मक सोच के बाद तूम्हे यह  मुकाम हासिल हुआ है। तेरी "सत्ता" स्वीकार करने मे ऐसे लोगो को कुछ वक्त लगेगा, तुम्हारी "बादशाहत" को एक ना एक दिन स्वीकार करना ही करना है ताऊ।" ताऊ इसका मुलकारण है तुमने कभी भी "चिठ्ठे" का बेजा फायदा नही उठाया, तुम्ह ने शब्दो का इस्तेमाल क्षिक्षा स्वरुप किया। छोटी छोटि आम मानवीय जीवन मे घटने वाळी  घटनाओ कुरितियो  को पात्रता के रुप मे अपनी आत्मा की  भाषा मे पिरोकर कुशल शिक्षाप्रद अपने ब्लोग पर अभिनय कहू या मचन कहू ताऊ वो तूमने किया है।" 
हुका पीते हुऐ ताऊ - बाबा श्री समीरानन्दजी महाराज से पुछते है- "महाराज! इब इसका इलाज किया और कब तक ? "
बाबा श्री समीरानन्दजी महाराज -"अरे ताऊ! कै बावली बूस कि तरह उतावाला होवे छे, यह सक्रमण काल छे समय पर ठीक हो जावेगा।" थोडा धिरज बान्ध ताऊ!  
समीरानन्दजी महाराज -"ताऊ!  फेम (प्रसिध्द् )बनने के बाद  व्यक्ती को अपने लिए नही पब्लिक के लिए जीना पडता है।  फेम (प्रसिध्द्)  व्यक्ती को यह छोटी सी किमत तो चुकानी ही पडती है। 
ताऊ-"महाराजजी! मै फैमस कब हुआ मुझे तो पता ही नही चला ?-" 
तभी एक अप्सरा शरबत लिए बाबा समीरानन्दजी महाराज के दरबार मे हाजिर होती है। ताऊ घटा-घट शरबत हलक के निचे उतार देता है।! 
मुस्कराते हुए अपने दिव्य एवम ओजस्वि शब्दो का इस्तेमाल करते हुए  बाबा श्री समीरानन्दजी महाराज फरमाते है-" ताऊ!  20 जून 2009 को आपने एवम मेरा प्रिय बालशिष्य आशीषजी खंडेलवाल ने   "ताऊ डाट इन" पर 1०,००० वीं टिपणी  की घोषणा ने तुम्हे नम्बर वन पर ला खडा कर दिया। बस लोगो कि ऑखो मे किरकिरी पैदा होने के कारणो मे यह भी एक मुख्य कारण है।"

ताऊ-" इस नजर टोकार के लिए कोई इलाज मन्त्र सन्त्र ?"

बाबा समीरानन्दजी महाराज -" मेरे प्रिय शिष्य मैने आजकल टोटके टाटके करना बन्द कर दिया है। पर तुम मेरे प्रिय हो ताऊ, इसलिए जाते समय बाहर के कक्ष मे   "हे प्रभु" ध्यानास्थ है  उन्ह से कहो वो तुम्हे मेरे द्वारा अभिमंत्रित "निम्बु- मिर्च देगे वो "ताऊ डाट इन" पर अगरबत्ती का धुप कर शुक्रवार को मेरा मनन कर टॉग देना। ताकी बुरी आत्माओ का छाया "ताऊ डाट इन" पर ना पडे।"
ताऊ -" बाबाजी आपने मुझे शान्त कर दिया अब मुझे जाने की आज्ञा प्रदान करे, मगल पाठ सुनाए। "
बाबा समीरानन्दजी महाराज  मगल पाठ देते हुऐ धरती-लोक के लिए निम्बु मिर्ची के साथ ताऊ को  रवाना करते है।
बाबा समीरानन्दजी महाराज का मगल पाठ

" मैं दीपक हो के बुझ जाऊँ, ऐसा हो नहीं सकता
मैं तूफानों से डर जाऊँ, ऐसा हो नहीं सकता
न मैने तैरना सीखा, मगर है हौसला दिल में
मैं दरिया पार न जाऊँ, ऐसा हो नहीं सकता.  "


ताऊडॉट इन कि कुछ खबरे
असली ताऊ कौन ?
आज साल 2008 का अंतिम दिन है ! आज मुझे हिंदी के सार्वजनिक ब्लागिन्ग में कुल 7 माह और 9 दिन हुये हैं. इस बीच  आज की पोस्ट सहित कुल 144 पोस्ट इस ब्लाग पर मेरे द्वारा लिखी गई ! और 56 पोस्ट मग्गा बाबा पर ! इस तरह कुल दो सौ पोस्ट इस अवधि में लिखी गई ! और दिसम्बर 08 मे पूरी 31 पोस्ट लिखी गई ! यानि प्रति दिन एक !
Wednesday, December 31, 2008 at 12:11 AM Posted by ताऊ रामपुरिया


महाबाबा ताऊआनंद : हे मेरे परम प्रिय ब्लागरों, अपना संपुर्ण ध्यान लगाकर सुनो कि हम कैसे ब्लागरत्व को प्राप्त हुये. बडा दुरुह और कठिन कार्य है. पर भक्त जनों जिसने एक बार ब्लागरत्व प्राप्त करने की ठान ली. वो भला बिना पाये विश्राम कैसे करेगा?
Saturday, June 6, 2009 at 8:00 AM Posted by ताऊ रामपुरिया


आज ताऊ के  ब्लाग की उम्र एक साल हो गई है यानि आज ताऊ की वर्षगांठ है…अरे नही….. नही……ताऊ की नही ..इस ब्लाग की वर्षगांठ है.  इस एक साल मे ताऊ ने  फ़ुल साईज 281 पोस्ट लिखी. जिन पर ताऊ को करीब 8450 कमेंट प्राप्त हुये.

आज मैं आपका हृदय से आभारी हूं कि २० जून २००९ को आपने इस ब्लाग पर १०,००० वीं टिपणी करके आपका स्नेह और आशिर्वाद मुझे दिया. मैं अभिभूत हूं. जिसने एक भी टिपणी दी है उनका भी मैं आभारी हूं. बिना उनकी एक टिपणी के भी यह अधुरा ही रहता.
Monday, June 22, 2009 at 2:09 PM Posted by ताऊ रामपुरिया

आशीष खण्डेलवाल (Ashish Khandelwal)
June 22, 2009 5:48 PM
@ Makrand, सभी चिट्ठों में से यह पता लगाना तो काफी श्रमसाध्य कार्य है कि किस-किस चिट्ठे पर दस हजार टिप्पणियां हो चुकी हैं। प्राप्त जानकारी के अनुसार उड़नतश्तरी वाले समीर लाल जी और मानसिक हलचल वाले ज्ञानदत्त जी अभी तक इस दस हजारी क्लब में शामिल थे और लेटेस्ट व धमाकेदार एंट्री ताऊजी की हुई है। अगर किसी साथी को दूसरे नाम पता हों तो बताने का कष्ट करें।