राक्षसों ने ब्लागरों को लपेटा अपने मायाजाल में, मुंबई ब्लागर मीट

28 comments
 पिछले दिनों मुंबई में ब्लोगर मीट हुई थी. उसमे नामी-गिरामी चिठाकारो ने अपनी हिस्सेदारी निभाई थी. विवेक रहस्तोगी जी के निमंत्रण पर मै भी पहुचा उपरोक्त मीट में. मुझसे जो बन पडा सहकार किया. 
जब मै आज मुंबई पहुचकर  देखा की  एक हिंदी ब्लॉग " भडास" में किसी अनुप मंडल ने घटिया  तरह की भाषा का उपयोग कर कुछ यू लिखा की दोस्तों मेरा मन ही टुटा सा गया. आप भी पढ़े इस लिंक कों दबाकर.
राक्षसों ने ब्लागरों को लपेटा अपने मायाजाल में, मुंबई ब्लागर मीट
इस तरह की बातो से हिंदी चिठाकारी से में उकता गया हू. सोच रहा हू. अब 
हिंदी चिठाकारी से अलविदा कहने का मेरा समय आ गया है.  शायद यहाँ  अब शरीफ आदमियों के लिए कोई जगह ही नहीं बसी है. बड़ी दुर्भाग्य की बात है की कुछ लोग कुंठित मन से आरोप प्रत्यारोप करने से पहरेज नहीं करते . भले आदमी की इज्जत लेना अब यहाँ रिवाज बन पड़ा है. 
ओर मजेदार बात तो यह है की कोई नामचिन्ह ब्लोगर उपरोक्त पोस्ट पर कमेन्ट के माध्यम से लिखता है "नाईस"अब इस पर अधिक क्या लिखू   समझ के परे है.

28 comments

शरद कोकास 12 दिसंबर 2009 को 5:32 am

भई टाइगर को यह चिंता करने की क्या ज़रूरत ? हिन्दी ब्लॉगिंग इस समय उन्नति के पथ पर अग्रसर है आलोचना तो होगी ही ।

Suman 12 दिसंबर 2009 को 6:17 am

thik hai .

अविनाश वाचस्पति 12 दिसंबर 2009 को 6:57 am

मीट हटा दें, मिलन जमा दें
मीट लिखा होने से राक्षसी प्रवृति हावी हो जाती है
इसमें अनोप मंडल का कोई दोष नहीं
दोषी तो अविनाश वाचस्‍पति हुआ
जो इतना भी नहीं समझा पाया सबको।

Udan Tashtari 12 दिसंबर 2009 को 6:57 am

आप भी कहाँ जबरदस्ती की बात करते हैं. आप अपना काम करिये न...कोई आपके बारे में क्या कहता है, उससे अगर आप विचलित हो गये तो कहने वाले का तो काम बन गया. वो तो कह ही इसीलिए रहे हैं. आप निश्चिंत हो लिखिये.

शुभकामनाएँ.

Vivek Rastogi 12 दिसंबर 2009 को 7:21 am

महावीर भाई आपका आभारी हूँ कि आपने बहुत मेहनत की और ब्लॉगर मिलन को सफ़ल बनाया, अब सफ़लता पर कुछ लोग नाराज तो होते ही हैं यह तो आपको आम जिंदगी में भी देखने को मिल जायेगा, कोई सामाजिक होता है कोई नहीं, किसी को किसी भी चीज में मीन मेख निकालने की आदत होती है, और यही आम आदमी ब्लॉगर भी है तो आदत तो जायेगी नहीं न, ब्लॉग विचारों की दुनिया है, शब्द अस्त्र हैं। शरद भाई की टिप्पणी पर मंथन कीजिये। सब छोड़िये और ब्लॉगिंग करिये, ये nice वालों को शायद पता नहीं था कि टिप्पणी कहाँ करना चाहिये और कहाँ नहीं। बस उनको तो करने से मतलब है, वैसे भी एक टिप्पणी के ऊपर बहुत बड़ा हंगामा हो चुका है।

छोड़िये इन सब चीजों को और शब्दों को ताकत दीजिये।

'अदा' 12 दिसंबर 2009 को 7:46 am

क्या टाइगर साहब,
जरा-जरा सी बात से घबराना ठीक नहीं...
अब ऐसा है....१०-१२ हज़ार ब्लोग्स में से २-४ तो ऐसे निकलेंगे ही न....और आपलोग उन्हीं पर ध्यान दे रहे हैं....ध्यान ही देना है तो उनपर दीजिये...जिन्होंने अच्छी बातें कहीं हैं....
मुंबई ब्लोग्गेर्स मीट अभी तक की सबसे सफलतम मीट है.....आपलोगों को इस बात से खुश होने चाहिए...और स्वयं पर गर्व....बस...बाकी ....जिसे जो कहना है कहने दीजिये......

'अदा' 12 दिसंबर 2009 को 7:46 am

क्या टाइगर साहब,
जरा-जरा सी बात से घबराना ठीक नहीं...
अब ऐसा है....१०-१२ हज़ार ब्लोग्स में से २-४ तो ऐसे निकलेंगे ही न....और आपलोग उन्हीं पर ध्यान दे रहे हैं....ध्यान ही देना है तो उनपर दीजिये...जिन्होंने अच्छी बातें कहीं हैं....
मुंबई ब्लोग्गेर्स मीट अभी तक की सबसे सफलतम मीट है.....आपलोगों को इस बात से खुश होने चाहिए...और स्वयं पर गर्व....बस...बाकी ....जिसे जो कहना है कहने दीजिये......

निर्मला कपिला 12 दिसंबर 2009 को 9:37 am

ालोचना वहाँ की होती है जहाँ कुछ काम हो रहा हो जहाँ कुछ भी न हो वहाँ के क्या और क्यों आलोचना होगी ? निस्सन्देह ब्लाग जगत मे बहुत कुछ अच्छा हो रहा है बधाई और शुभकामनायें

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 12 दिसंबर 2009 को 10:25 am

असन्तुष्ट जब अपने काम में तल्लीनता से लगे हैं तो हम अपना काम क्यों छोड़ें??

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 12 दिसंबर 2009 को 10:26 am

अरे हाँ!
एक बात तो लिखना ही भूल गया-
NICE.

RAJNISH PARIHAR 12 दिसंबर 2009 को 10:37 am

कुछ तो लोग कहेगे..लोगों का काम है कहना....आप अपने लक्ष्य की और अग्रसर रहिये..happy bloging...

संजय बेंगाणी 12 दिसंबर 2009 को 10:43 am

इसे हमारी ब्लॉगरी भाषा में टंकी पर चढ़ना कहते है. लगभग सभी सफल ब्लॉगर एक न एक दिन टंकी पर चढ़ा है.

मगर जिस बात पर पेट पकड़ कर हँसा ही जा सकता है, उसके लिए टंकी पर काहे चढ़ना?

कुश 12 दिसंबर 2009 को 12:07 pm

अरे महावीर जी आप तो खालिस मारवाड़ी आदमी है.. आप कहाँ पीछे हट रहे है.. आपने अपना काम इमानदारी से किया ये आप जानते है.. फिर दुसरे कुछ भी कहे उस से क्या फर्क पड़ता है.. ? कुछ लोगो के ख़राब होने से क्या होता है.. जो लोग अच्छे है उनका तो ख्याल करिए.. अपना मन ख़राब मत करिए..

rashmi ravija 12 दिसंबर 2009 को 12:28 pm

लगता है, यह कोई 'अलविदा सप्ताह' चल रहा है.महावीर जी से इस भावुकता की उम्मीद नहीं थी....कौन सी जगह..स्वच्छ,सुन्दर और मनोरम है??...हर जगह, हर तरह के लोग हैं..कहाँ कहाँ से भाग सकते हैं हम??

सतीश पंचम 12 दिसंबर 2009 को 7:41 pm

महावीर जी, किसी के कहने से इतना डिस्टर्ब नहीं होना चाहिये। हां इस तरह की बातें तकलीफ तो देती ही हैं पर क्या किया जाय़ ।
लोग तो कहते ही रहते हैं, उनका काम है कहना। बाकि तो हम लोगों का काम है कर्म करना।
ब्लॉगर बैठकी को कितना पसंद किया गया यह तो आपको लोगों के स्नेह भरी टिप्पणियों से ही पता चल गया होगा। सो छोडिये इन बेकार की बातों को।
जमाये रहिये। हम तो आप के द्वारा तीन मूर्ति मंदिर में किये गये इंतजाम और आप के द्वारा लोगों को आग्रह कर के जलपान करवाने को देख मन ही मन मुदित हुए कि देखिये कैसा सरल प्रेम छलक रहा है।
इन बातों पर ध्यान न दें।

ab inconvinienti 12 दिसंबर 2009 को 8:30 pm

अनूप मंडल एक अन्धविश्वासी कम्युनिस्ट संप्रदाय है, जो जैनों को शोषक पूंजीपति बनिया वर्ग का मानता है जो सर्वहारा गरीब आदिवासी किसानों का शोषण करते हैं. यह संगठन जोर शोर से जैनों के खीलाफ़ अन्धविश्वासी बातें फ़ैलाने में लगा है, जैसे जैन राक्षस वंश के होते हैं, वे पैशाचिक शक्तियों की साधना करते हैं, तीर्थंकर काल्पनिक हैं, चौमासा में मुनि तंत्र साधना करते हैं जिससे फसल नष्ट हो जाती है और शोषक वर्ग को लाभ होता है.

महेन्द्र मिश्र 12 दिसंबर 2009 को 9:08 pm

आप अपना काम करिये न...

महफूज़ अली 12 दिसंबर 2009 को 10:49 pm

क्या टाइगर साहब,
जरा-जरा सी बात से घबराना ठीक नहीं...

राजीव तनेजा 12 दिसंबर 2009 को 11:23 pm

कुछ तो लोग कहेंगे...लोगों का काम है कहना...


लगे रहें...जमे रहें...डटे रहें....

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" 12 दिसंबर 2009 को 11:26 pm

हम तो बस इतना कहेंगें कि किसी के भी कहने सुनने की चिन्ता छोडिए ओर बस अपने ध्येय(ब्लाग लेखन) में लगे रहिए ।
हम अब आपकी आगामी पोस्ट की प्रतीक्षा कर रहे हैं....

अमित जैन (जोक्पीडिया ) 13 दिसंबर 2009 को 1:51 am

भाई इसी कारन से ही मैंने इन लोगो की किसी भी बात का जवाब देना बंद कर दिया था ,बाकि इस ब्लोगेर मीटिंग के लिए बधाई , जब मोका लगे आप डेल्ही में भी एक मीटिंग रखिये ,

Mired Mirage 13 दिसंबर 2009 को 2:34 am

जो अच्छा लगे वह पढ़िए। जो न लगे उसे मत पढ़िए। इतने सारे चिट्ठे हैं, चुनाव में कोई समस्या नहीं आनी चाहिए। आप अपना लिखिए। यह जाने की बात कुछ अधिक ही हो रही है।
घुघूती बासूती

रंजन 13 दिसंबर 2009 को 7:24 am

आपकी आज की पोस्ट "इतना प्यार आर्शीर्वाद-हिन्दी ब्लोग जगत में ही सम्भव है" नहीं देखी होती तो शायद इस पोस्ट पर और इससे जुड़ी दुसरी पोस्ट पर कभी नहीं जाता..

माहवीर, जी आप काहे इन छोटी छोटी बातें की चिंता करे है.. मुंबई ब्लोगर मीत के बारे में एक से बढ़ कर एक २० से ज्यादा पोस्ट लिखी होगी.. तो इस एक तो साइड किजिये.. अच्छे बुरे हर जगह होते है जी.. जाने दो!!

शुभकामनाऐं...

बी एस पाबला 13 दिसंबर 2009 को 8:35 am

धत्तेरे की!
अरे आपसे ऐसी उम्मीद न थी :-(
किसी एकाध ने अपनी भड़ास निकाल ली, तो क्या?
अब इतने साथियों का प्रेम देखिए

बी एस पाबला

अनोप मंडल 13 दिसंबर 2009 को 11:21 pm

अरे टाईगर जी क्या हुआ बस इतने में ही पोल खुलने पर भाग रहे हो क्योंकि अब आपका असल खूंख्वार रक्तपिपासु चेहरा हिंदी ब्लागरों के सामने आने लगा है?क्या विचार विमर्श का साहस नहीं रहा या ये पलायन भी किसी राक्षस नीति का हिस्सा है? डा.रूपेश श्रीवास्तव के सामने आकर सबसे बड़ी गलती करी। वो अवतार स्वरूप हैं अब कालेजादू का अंत सुनिश्चित है। तुम इस टिप्पणी को हटा भी दो तो कोई बात नहीं हमारी बात तो तुम तक पहुंच ही गयी है।
जय नकलंक देव

रजनीश के झा (Rajneesh K Jha) 14 दिसंबर 2009 को 11:25 am

मित्र महावीर सेमलानी जी,
जैसा की आप जानते हैं भडास एक मंच है अभिव्यक्ती की पूर्ण स्वतंत्रता का और हरेक को अधिकार है अपनी बात कहने का,सबके सामने रखने का सो इसमें भड़ास ने हमेशा अपनी अग्रणी भूमिका निभाई है.
रही बात आरोप और आक्षेप की तो कृपया इसका सामना करें, हमारी हिन्दी को ढेरो हिन्दी लेख और आलेख की जरुरत है जो वैश्विक स्तर पर हिन्दी की प्रतिष्ठा स्थापित करे.
भड़ास ना किसी की इज्जत लेता है ना देता बस सच कहने वालों के लिए एक मंच है और साथ ही सभी को बराबर का मौका भी देता है की अपने तथ्य को सामने रखें.
हम किसी पर व्यक्तिगत आरोप प्रत्यारोप से परहेज करते हैं और संग ही सामाजिक सरोकार से जुड़े मुद्दों पर आवाज उठाते हैं. अगर आप व्यक्तिगत आहत हैं तो हम क्षमाप्रार्थी हैं मगर मुद्दों काउ गौण कर व्यक्तिगत विषय से ऊपर उठ कर यदि सामजिक सहकारिता में भागीदार बने तो समाज कर्जदार रहे.
जय जय भड़ास

RAJ SINH 15 दिसंबर 2009 को 5:53 am

यार आप tiger हो .किन सियारों से घबरा rahe हो aur tiger भागते हैं ? दौडाते हैं . और मक्खियों को उड़ा देते हैं .
किसी ने बताया की रूपेश ने मेरे बारे में भी लिखा की मैंने ' द्विअर्थी ' गाना सुनाया , और मेरी उन्होंने टांग खिंचाई की मगर टांग मोटी निकली .( भाई बहुत कुछ मोटा है मुझमे ,और मजबूत भी ,उखाड़ पाना मुश्किल , निर्लज्जों के लिए )
और ' द्विअर्थी ' ? अर्थ समझना आये तो ? क्या कर लीजियेगा ? अरे भाई मैंने साफ़ कहा था की मेरी फिल्म पूर्ण यथार्थपरक है और ' पात्र ' हैं जो बोल रहे हैं .

और भड़ास की गंदगी के बारे में क्या कहें ?
भड़ास मन की निकले तो ' भड़ास ' . पर अब ' अपानवायु ' को भी ' भड़ास ' मनवाने पर उतारू लोगों से क्या संवाद ?
सिर्फ एक व्यक्ति द्वारा की गयी लीद उस स्नेह मिलन को दुर्गंधित तो कर रही है पर उनके ' पेशे ' की मजबूरियां समझें और निर्विकार रहें .
वक्त का तकाजा था वर्ना ऐसे लोगों के साथ फोटो खिंचवाना भी खुद को कलंकित करना ही था .पता नहीं कुछ लोग इस ' मसीहा ' के साथ कैसे गलबहियां डाले दिखे .
आप कायम रहें.हमारे ब्लोगीय वायुमंडल में इतनी छमता है की ऐसी अपान्वायी ' भ्डासें ' छनिक दुर्गन्ध मचा ,विलुप्त ही हो जाती हैं .और उधर का मुंह ही क्यों करते हैं आप की दुर्गन्ध से बच ही न पायें .

अब मूर्धन्य समीर लाल की तथा अन्य स्नेहियों की बात माने और नाक दबा दुर्गन्ध से दूर रहें .

मैं मानता हूँ की कोई संयुक्त ब्लॉग अंशतः सभी जुड़े लोगों की कुछ तो साझा जिम्मेदारी होती है .उस मंच में शामिल कई नाम बहुत ही अच्छा लिख रहे हैं ,जिन्हें मैं उनके ब्लोगों पर पढता हूँ . वे इस दुर्गन्ध में कैसे शामिल हैं ,समझ के परे है ,और हैं तो ऐसे लिखने का प्रतिकार क्यों नहीं करते ? इस संयुक्त जिम्मेदारी पर भी विमर्श हो , और कुछ तो निति निर्धारण हो !
एक बेहद अनौपचारिक स्नेह मय मिलन परिवेश को भी एकाध द्वारा दुर्गन्ध में तब्दील किया जा सकता है , समझ के परे है .
आपके सहयोग और स्नेहपूर्ण योगदान का मैं नमन करता हूँ ,shayad jiske bina yah sah milan sambhav hee na hota .

और आपके पलायन को ' बुजदिली ' से कम मैं कुछ नहीं मानूंगा .और वह भी tiger की .

RAJ SINH 16 दिसंबर 2009 को 10:33 pm

अच्छा किया मेरी प्रतिक्रिया नहीं दी . उचित किया .शायद सर्वोत्तम तरीका है ,ऐसी बातों में न उलझ आगे बढ़ जाना .आप भी आगे बढ़ें .
आपके धीरज की प्रशंसा ही होगी और हो रही है.
धन्यवाद.