इतना प्यार आर्शीर्वाद-हिन्दी ब्लोग जगत में ही सम्भव है.

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मेरा परिचय कोई खास नही है। हिन्दी हिन्दुस्थान को मै प्यार करता हू। मुझे लिखने का शोक है। किताबे पढने कि ललक हमेशा ही बनी रहती है। ज्यादा कुछ लिखना आता नही बस देसी दिमाग मे जो भी चलता है कलम के माध्यम से उडेलने का काम करता हू। कलम की स्याही सूखने का नाम नही लेती। विनोबा भावे के विचारो से प्रभावित हूआ तो समाज के लिऐ कुछ छोटे मोटे कार्य करने का प्रयास करता हू।जब तक लोग पसन्द करेगे मै उनके लिऐ लिखूगा, जब वो उब जाऐगे तब मै मेरे लिऐ लिखूगा।

प्यार को मै मानव कि सबसे बडी अभिव्यक्ती समझता हू जहॉ कभी कही सफल हुआ तो असफल भी रहा। गुस्से को मै जीवन का अभिन्न अंग मानता हू, मेरी सोच है की मर्यादित आक्रोस सफलता का कारण बनती है एवम अनुशासनहीन आक्रोस आदमी के जीवन को समाप्त कर देती है।

कर्म मै मेरा अटुट विश्वास है पर फल कि इच्छा भी रखता हू सयमित भाव से मेरे द्वारा लिखित -
"हे प्रभु यह तेरापंथ", "मुंबई टाइगर" , "ब्लोग चर्चा मुन्नाभाई की", "द फोटू गैलेरी" , "माई ब्लोग", "महाप्रेम" , "सलेक्शन एंड कलेकशना", हिन्दी चिठ्ठो के माध्यम से अपने विचारों को व्यक्त करता रहा हू - संजोता रहा हू।
इन्ह सभी चिठ्ठो पर समय समय पर टिप्पणियों द्वारा आपका स्नेह प्यार मिलता रहा है

मुझे लिखना अच्छा लगता है, तो लिखने के बाद आप लोगो की प्रसंसा भरी टिप्पणियों से मै उत्साहित होता हू. शायद यह मानवीय अवतरण की खूबी है या कमी मुझे नही पत्ता, पर यह सच्च है की टिप्पणियों ने ब्लोग लिखने के लिए मुझे प्रेरित भी किया या यु कहू तो कोई अतिशयोक्ति नही की टिप्पणियों ने मेरे लिखनेकी सक्रियता को लालस प्रदान किया।

हिन्दी चिठाकारी ने मुझे अपने आपको अभिव्यक्त करने का सुनहरा मोका प्रदान किया दूसरी और देश -विदेश में कई लोगो से परिचय कराया, नए मित्रो से मिलवाया एवं एक अटूट विशवास भरा सम्बन्ध बनवाने में हिन्दी ब्लोग जगत मेरा हमसफ़र बना।

कुछ अंतराल पूर्व कभी सोच भी नही पाता था की मै महावीर, हिन्दी भाषी व्यक्ति, अपनी बात अपने लहजे में , अपनी भाषा में , कलेजे से बहार निकाल सकूंगा। किंतु ब्लॉग ने यह सभी मुमकिन कर दिया। मेरे लिए ब्लॉग ने कई नए एवं अनूठे रास्तो को खोल दिया यह ब्लोगेर की दुनिया सपनों से कम नही थी मेरे लिए . बिना कोई खर्च किए अपने ढंग से साफ़ सुंदर अक्षरो की लिखावट बिना कोई सलवट सचित्र , कलरफुल अपने आप को संजोने का एवम व्यक्त करने का सहज सरल शुलभ अवसर हमे देती है। मुझे गर्व है की मै भी ब्लॉग संसार का हिस्सा हू.

आप सोच रहे होगे इतनी सारी अच्छाइयो के बाद बुराई कंहा है ?

बुराई ब्लोग संस्करण में या उसके फोर्मेट में कदापि नही है बुराई है कुछ लोगो की मानसिकता में उनकी सोच में
जो उभर कर यदाकदा बहार आती है और ब्लॉग जगत के वातावरण को दूषित करती रहती है। इसे लोगो की विचार धारा स्वच्छ अभिव्यक्ति की बजाय कुंठित मनोभावना से ओतप्रोत होती है। साफ़ शब्दों में कहू तो जलन -इर्छ्या उन्हें ऐसा करने के लिए उकसाती है। डाक्टरी भाषा में ऐसे व्यक्तियों को मनोरोगी भी कहा जाता है। इस तरह के मनोरोगी सिर्फ़ ब्लॉग जगत में ही है इसी बात नही है, ऐसे मनोरोगी बहार या घरेलु दुनिया मे भी है. जो खुले में भी सार्वजनिक स्थानों पर अच्छे लोगो की गरिमा को ठेस पहुचाने से नही चुकते है। कई मोको पर घर परिवार के सदस्यों के साथ भी वो ऐसा ही व्यवाहर करते है।

ऐसे लोगो के मन में बच्चपन से ही यह बात दिमाग में घरकर जाती है की वे दूसरो से सुपीरियर है, कोई उनका शानी नही है समय समय पर लोगोका ध्यान अपनी और आकर्षित करने के लिए बेतुका बवाल मचाने लग जाते है। जबकि वो लोग कार्य कुशल नही होते है इसलिए अपनेको असुरक्षत पाते हुए अपनी और अटेंशन पानेके लिए ऐसा करते है.

कल मैंने दुखी मन से एक पोस्ट लिखी मेरे असंतुलित मनको आप सभी ने पधारकर मुझे ढाढस बंधाया, मुझे हिम्मत दी की मै लिखता रहू दुःख में सात्वना - सुख में हिस्सेदारी, इतना प्यार आर्शीर्वादयह सभी हमारे हिन्दी ब्लोग जगत में ही सम्भव है। मै आप सभी का तेहदिल से शुक्रिया अदा करता हू की आपने मेरे विचारों को टूटने से बचाया। मै आप सभी को विशवास दिलाता हू की जीवन भर स्वस्थ, सयमित और अनुशासित ब्लोगरी करुगा। जिसमे किसी की भावानाए आहात नही होगी वैसी ही मर्यादित लेखनी का उपयोग करुगा। नमस्कार!

17 comments

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 13 दिसंबर 2009 को 6:44 am

बुराई ब्लोग संस्करण में या उसके फोर्मेट में कदापि नही है । बुराई है कुछ लोगो की मानसिकता में उनकी सोच में
जो उभर कर यदाकदा बहार आती है और ब्लॉग जगत के वातावरण को दूषित करती रहती है। इसे लोगो की विचार धारा स्वच्छ अभिव्यक्ति की बजाय कुंठित मनोभावना से ओतप्रोत होती है।

सत्य वचन महाराज!

Udan Tashtari 13 दिसंबर 2009 को 6:47 am

उचित निर्णय. अब नियमित लिखिये बिना किसी चिन्ता के. शुभकामनाएँ.

अविनाश वाचस्पति 13 दिसंबर 2009 को 6:50 am

वो पोस्‍ट मुझे भी भिजवायें
और न घबरायें प्‍यारे

टाईगर से तो बड़े बड़े

कांप जाते हैं खड़े बेखड़े

देखकर ही
होते हैं धराशायी।

रंजन 13 दिसंबर 2009 को 7:25 am

मस्त रहने का.. चाय पीने का और एक पोस्त ठेलने.. का..


टेशन नोट..

Vivek Rastogi 13 दिसंबर 2009 को 7:43 am

जय ब्लॉगर महाराज ...

बस लिखते रहिये और प्रेम बनाये रहिये।

RAJNISH PARIHAR 13 दिसंबर 2009 को 8:44 am

आप लिखिए ना..काहे ध्यान देते है..ऐसे लोगों पर....ये सब जगह होता है..

AlbelaKhatri.com 13 दिसंबर 2009 को 10:19 am

aapki peeda vaajib hai......

ap bahut achha likhte hain

likhte hi rahiye...

dhnyavad !

संजय बेंगाणी 13 दिसंबर 2009 को 10:54 am

ब्लॉगरी की भाषा में इसे टंकी से उतरना कहते है. अब आप लम्बी पारी खेलेंगे, क्योंकि पीछले अनुभव ऐसा संकेत देते हैं. :)

शुभकामनाएं.

वन्दना 13 दिसंबर 2009 को 11:49 am

kuch to log kahenge , logon ka kaam hai kehna
aap parvaah mat kijiye aur apna lekhan jari rakhiye.........hum kis kis ka moonh band kar sakte hain ..........sirf khud ko badal sakte hain aur uske liye sirf itna karna padega ki aise logon ko ignore kiya jaye aur zindagi ko aaram se jiya jaaye.

परमजीत बाली 13 दिसंबर 2009 को 12:41 pm

सदा इसी तरह लिखते रहें।शुभकामनाएँ.

निर्मला कपिला 13 दिसंबर 2009 को 1:07 pm

आप लिखते रहें । अपनी बात कहने का ढंग आता है आपको तो लिखने के लिये और क्या चाहिये। अच्छा बुरा जो भी हो रहा है उसे खुले दिल से सवीकार करें और खुद अच्छा लिख कर सब को राह दिखायें बहुत बहुत शुभकामनायें

ताऊ रामपुरिया 13 दिसंबर 2009 को 5:23 pm

महावीर जी आप कब टंकी पर चढे? कब उतरे? कुछ मजा नही आया.:) अगर चढ ही गये थे तो ४/५ दिन तो रहना था टंकी पर. कम से कम उतारने का मजा तो लेते.

आजकल कोई जल्दी से चढता भी नही है.:)

वैसे आपने बाते बिल्कुल खरी खरी लिखी हैं . यहा कुछ लोग टंकी पर चढवाने के तो माहिर हैं ही..फ़िर उतारने की बजाय उपर से धक्का देने मे माहिर हैं. सो आगे से सोच समझकर चढियेगा.

रामराम.

महेन्द्र मिश्र 13 दिसंबर 2009 को 5:50 pm

टाइगर जी
हर व्यक्ति का स्वभाव और सोच अलग अलग होती है ...... व्यक्ति को स्व विवेक के आधार पर अपनी दिशा स्वयं तय करनी चाहिए ..... जिस तरह शेर शान से चलता है तो गीदड़ो की परवाह नहीं करता उस तरह की राह चलना चलिए .. बस आप लिखते रहे और हमें पढ़ने मिलाता रहे यही क्या हमारे लिए कम होगा . आभार

cmpershad 13 दिसंबर 2009 को 7:56 pm

हंसी-ठिठोली, नोक-झोंक, वाह-वाहई के साथ टांग-खिचाई........ ये सब ब्लागर गेम हैं जिसे सीरियस्ली लेकर भावुक होना ठीक नहीं... लेखन बदस्तूर जारी रखें:)

रजनीश के झा (Rajneesh K Jha) 14 दिसंबर 2009 को 6:52 pm

शुभ संकेत,
शुभकामना,
लेखनी जारी रखिये, हिंद के लिए हिदी के लिए.
एक बार फिर से शुभकामना

'अदा' 17 दिसंबर 2009 को 4:50 am

अरे मुन्ना भाई..
किस पचड़े में आप पड़ गए....
एक कहावत सुनी तो है आपने...
हाथी चले बाज़ार कुत्ता भूंकें हज़ार...
अरे मिटटी डालिए ऐसी बातों पर.....हां नहीं तो

अल्पना वर्मा 2 जनवरी 2010 को 10:49 am

नियमित लिखिये....
[चिन्ता नोट]
हमारी ओर से नववर्ष की बधाई एवं शुभकामनाओं सहित.